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७० फीसदी महिलाएं एनीमिक पेशेंट, जा रही जच्चे- बच्चे की जान

Updated: IST 70 percent of women Animic patient, causing death
गर्भवती होने के बाद महिलाएं आज भी शासन की दर्जनों योजनाओं ने बेखबर हैं। सरकार उनके पेट में पल रहे बच्चे को ९ महीने तक तंदरूस्त रखने हर तरह की कवायद कर रही

जांजगीर-चांपा. गर्भवती होने के बाद महिलाएं आज भी शासन की दर्जनों योजनाओं ने बेखबर हैं। सरकार उनके पेट में पल रहे बच्चे को ९ महीने तक तंदरूस्त रखने हर तरह की कवायद कर रही,

लेकिन माताएं लापरवाही से बाज नहीं आ रही। नतीजतन जचकी के दौरान जच्चे बच्चे को बचा पाना डॉक्टरों के लिए खतरे का खेल साबित हो रहा है। बीते दो माह के आंकड़े यह बयां कर रही है।

गर्भवती होने के शुरूआती महीने से सरकार जच्चे एवं बच्चे की देखरेख के लिए गंभीर हो जाती है। मितानिन, महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता,

आंगनबाड़ी कार्यकर्ता सहित स्वास्थ्य विभाग के तमाम कर्मचारी माताओं को हर तरह की सुविधाएं पूरी ताकत झोंक देती है, लेकिन माताएं इन तमाम व्यवस्थाओं के हल्के में ले लेतीं हैं।

न तो गोली दवा का सेवन कर रहीं, न तो किसी तरह की टीका लगवा रहीं। जबकि प्रत्येक गर्भवती महिलाओं को शुरूआती माह से ही हर रोज आयरन व फोलिक एसिड के टेबलेट का सेवन करना चाहिए।

इसके अलावा फलों का सेवन व पौष्टिक भोजन करना चाहिए। इससे शरीर में हीमोग्लोबीन की मात्रा मेंटेन रहता है। साथ ही पेट में पल रहा बच्चा का स्वस्थ्य रहता है।

जबकि जचकी का समय जब अंतिम स्टेज पर पहुंच जाता है तो वह किसी अच्छे डॉक्टर के पास जाने के बजाए गांव के झोला छाप डॉक्टर के पास चली जाती है।

झोलाछाप डॉक्टर प्रसूता को सीधे दर्द का इंजेक्शन लगा देता है। समस्या जब गहरा जाती है तो काफी देर हो चुका होता है। आखिरकार सरकारी अस्पताल के डॉक्टर जैसे तैसे प्रसव कराने जी जान लगा देते हैं।

प्रसव सुरक्षित हो गया तो ठीक नहीं तो परिजन स्वास्थ्य अमले पर टूट पड़ते हैं। बीते एक माह के भीतर इसी तरह की दो मामले सामने आ चुके।

जिसमें न तो जच्चा बच पाया और न ही बच्चा। डिलवरी फेल होने का ठीकरा स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारियों पर फूट पड़ा।

१० प्रतिशत शिशु कुपोषित

जिला अस्पताल में सालाना ६०० संस्थागत प्रशव का केश दर्ज किया जाता है। जिसमें १० प्रतिशत यानी ६० केस ऐसे सामने आते हैं जिसमें शिशु का वजन केवल २ किलो ग्राम के इर्द गिर्द रहता है।

जबकि एक स्वस्थ्य शिशु का वजन २ किलो ८०० ग्राम से उपर होना चाहिए। इतने वजन के शिशु के लिए माताओं को नियमित आयरन की गोली सहित पौष्टिक भोजन की खुराक मिलनी चाहिए, लेकिन दिया नहीं जाता। इसके कारण शिशु कुपोषित जन्म लेते हैं।

सोनोग्राफी नहीं होना भी कारण

गरीब वर्ग के मरीज रुपए के अभाव में सोनोग्राफी नहीं करा पाते। इसके कारण गर्भ में पल रही शिशु की वास्तविक स्थिति की जांच नहीं हो पाती। सोनोग्राफी ही एक ऐसा यंत्र है

जिसके माध्यम से गर्भ में पल रहे शिशु के बारे में जानकारी ली जा सकती है, लेकिन यह जांच जिले के सरकारी अस्पतालों में नहीं होने से गरीब वर्ग के माताएं निजी क्लीनिक में नहीं पहुंच पाती। पीएचसी, सीएचसी यहां तक जिला अस्पताल जैसे अस्पताल में इसका अभाव है।

यह करें उपाय

>गर्भ की भनक लगते ही डॉक्टरों से सलाह लें

>> हर माह स्त्री रोग विशेषज्ञ से चेक कराएं

>> आयरन की गोली नियमित खाएं

>> हर तीन माह में सोनोग्राफी कराएं

>> झोलाछाप डॉक्टरों की चपेट में न आएं

>> मौसमी फल का नियमित सेवन करें

>> तीन बार पेशाब की जांच

>> नियमित टीका लगवाएं

>> सतत मितानिनों के संपर्क में रहें

>> गर्भवती का ब्लड प्रेशर चेकअप

>> हीमोग्लोबिन की चार बार जांच कराएं

>> गर्भवती माता का वजन परीक्षण

क्या होता है नतीजा

>> ब्रेन डेवलप नहीं होता

>> कम वजन के शिशु जन्म लेते हैं

>> शिशु विकलांग हो जाते हैं

>> ट्यूमर निकलने की स्थिति निर्मित

>> हाथ पैर टेढ़े मेढ़े होते हैं

>> हड्डी विकसित नहीं हो पाती

मैदानी अमले को अलर्ट होना होगा

गर्भवती माताओं की जांच नियमित करानी चाहिए। इससे प्रसव में दिक्कतें नहीं होगी। नियमित जांच नहीं कराने से ५० प्रतिशत शिशुओं का जन्म औसत कम रहता है।

इसके लिए गर्भवती माताओं को पौष्टिक भोजन करने के अलावा नियमित जांच करानी चाहिए।

-डॉ. बीएस चंदेल सिविल सर्जन जिला अस्पताल

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