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बाहर गए 80 फीसदी ग्रामीण, वीरान हो रहा उसलापुर

Updated: IST 80 per cent of the rural out, are deserted Uslapur
बलौदा विकासखंड के खोहा आश्रित गांव उसलापुर के 80 फीसदी ग्रामीण पेट की आग बुझाने के दूसरे राज्यों में पलायन कर गए हैं।

डॉ. संदीप उपाध्याय/जांजगीर-चांपा. बलौदा विकासखंड के खोहा आश्रित गांव उसलापुर के 80 फीसदी ग्रामीण पेट की आग बुझाने के दूसरे राज्यों में पलायन कर गए हैं।

इससे अब यह छोटा सा गांव बीरान नजर आने लगा है। यहां पहुंचने पर कुछ बुजुर्ग व बच्चे व महिलाएं ही देखने को मिलती हैं। पलायन करने से स्कूलों में बच्चों की संख्या कम हो गई है।

यह गांव केंद्र व राज्य सरकार की योजनाओं से महरुम है। पिछले कई सालों से यहां के लोग कोलकाता और भोपाल जैसे शहर में रोजी मजदूरी की तलाश में जा रहे हैं।

जिला मुख्यालय से मात्र 15 किलोमीटर दूर उसलापुर गांव में अब एक तिहाई से भी कम आबादी बची है। यहां कई ऐसे घर हैं

जहां ताला लगा है तो कई में सिर्फ बूढ़े मां-बाप अपने बच्चों के आने की राह ताक रहे हैं। अब तो इन बुजुर्गों के कानों में मुहल्ले के बच्चों की किलकारी भी आना बंद हो चुकी है।

पिछले दो माह में इस गांव के 80 फीसदी ग्रामीण अपने घरों में ताला जड़ या फिर घर के बाहर कांटों का ठेर लागकर परदेश चले गए हैं।

इस गांव में शिक्षा और रोजगार की बात की जाए तो यहां एक भी युव शिक्षित नहीं है और सबसे बड़ी बात शासकीय नौकरी तो यहां के लिए सपना जैसा है।

अधिया खेती से नहीं पलता परिवार

गांव के राम बहादुर खैरवार (45) का कहना है उसलापुर के लोगों के पास पुस्तैनी जमीन नहीं है। ज्यादातर खेतिहर भूमि गौटिया घरानों के पास है, जो दूसरे क्षेत्रों में रहते हैं।

वह अपनी जमीन को ठेका व अधिया में देते हैं। अकेले अधिया या ठेका पर खेती से मिलने वाले अनाज से पूरे परिवार का पालन-पोषण संभव नहीं होता, जिससे उन्हें दूसरे शहर जाना पड़ रहा है।

राशन के लिए जाना पड़ता है 5 किलोमीटर दूर

शासन ग्रामीणों के लिए कई योजनाएं चला रहा है, लेकिन इन योजनाओं का एक भी लाभ उसलापुर निवासियों को नही मिल रहा है।

अब तक यहां शासकीय उचित रेट की दुकान तक नहीं खुल पाई है। लोगों को राशन लेने के लिए 5 किलोमीटर दूर खोहा गांव तक पैदल जाना पड़ता है।

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