Patrika Hindi News
Bhoot desktop

भगत सिंह ने सादगी से मनाई थी लोहड़ी, गंगा में डुबकी लगाकर साथियों संग खाई खिचड़ी

Updated: IST BHAGAT
भगत सिंह, चन्द्रशेखर, विद्यार्थी जी और अशफाक उल्लाह खां ने बिठूर स्थित ब्रम्हावर्त घाट में जाकर गंगा में भारत की आजादी के लिए डुबकी लगाई और फिर गांववालों की मदद से सीता रसोईया परिसर में खिचड़ी पकाई।

कानपुर। बिठूर क्रांतिकारियों का गढ़ रहा, यहीं से अंग्रेजों के खिलाफ बिगुल बजा था। इसी के चलते हर क्रांतिकारी यहां आकर रुकते और शहीद साथियों के किस्से सुना करते थे। इन्हीं में थे शहीदे आजम भगत सिंह जो 1925 में दिल्ली के रास्ते कानपुर पहुंचे। वे यहां पर नाम बदलकर रुके और प्रताप प्रेस में ढाई साल तक नौकरी की। इस दौरान विद्यार्थी जी ने उनकी मुलाकात पंडित चन्द्रशेखर आजाद से करवाई और दोनों गहरे मित्र हो गए। भगत सिंह, चन्द्रशेखर, विद्यार्थी जी और अशफाक उल्लाह खां ने बिठूर स्थित ब्रम्हावर्त घाट में जाकर गंगा में भारत की आजादी के लिए डुबकी लगाई और फिर गांववालों की मदद से सीता रसोईया परिसर में खिचड़ी पकाई। पहले मौजूद ग्रामीणों को फिर खुद खिचड़ी खाकर मकर संक्रांति का पर्व मनाया था। भगत सिंह ने पांच मुठ्ठी चावल और दाल शहीदों के नाम अर्पण किए थे। आजाद हर रविवार को भगत सिंह को लेकर बिठूर जाया करते और कई कई घंटे बैठकर दोनों अंग्रेजों को खत्म करने की रणनीति बनाया करते।

भारत को आजाद कराने की खाई कसमें

ब्रम्हावर्त घाट निवासी रवीन्द्र सिंह मल्लाह ने बताया कि उनके पिता जी इसी घाट पर रहते और गंगा में डूबने वालों को बचाया करते थे। रवीन्द्र के मुताबिक उनके पिता अक्सर पंडित जी और सरदार भगत सिंह के बारे में हम लोगों को बताया करते थे। रवीन्द्र ने बताया कि 1926 का साल था और सर्दी अपने सबाब पर थी। सुबह का वक्त था, पंडित जी आगे आगे चल रहे थे और उनके पीछे भगत सिंह, विद्यार्थी जी और अशफाक उल्लाह खां पीछे -पीछे चल रहे थे। उन्होंने हमारे पिता जी से नाम पूछा और गंगा की गहराई पूछी। विद्यार्थी जी को छोड़कर तीनों ने गंगा में छलांग लगाकर जमकर तैराकी की। इसके बाद चारों ने आजादी के नाम पर डुबकी लगाई और मकर संक्रांति के पर्व पर अंग्रेजों से भारत को आजाद कराने की कसमें भी खाईं थीं। इसके साथ ही घाट स्थित शिवलिंग की पूजा अर्चना के बाद बिठूर स्थित सीता रसोईया के पास खिचड़ी पकाई और खुद और वहां मौजूद ग्रामीणों को खिलाई थी।

मल्लाह के घर से आई थी दाल और चावल

रनीन्द्र के मुताबिक हैं कि उनके पिता जी ने बताया कि पंडित जी लौटते समय उन्हें भी मुसाथ चलने को कहा और वह उनके साथ चल दिया। पिता जी और चारो क्रांतिकारी सीता रसोइया के पास बैठ गए। भगत सिंह ने कहा भाई आज मकर संक्रांति है खिचड़ी की व्यवस्था नहीं करोगे। पिता जी घर आए और पांच किलो चावल व दो किलो दाल लेकर पहुंच गए। पंडित जी, अशफाक उल्लाह खां खेत में लगी मटर तोड़कर लाए। बिठूर निवासी राजू साहू ने तेल मिर्च और देशी घी लेकर आए थे। खिचड़ी पकने की जानकारी ग्रामीणों को हुई तो वह भी पहुंच गए। क्रांतिकारी और ग्रामीण बैठकर मंकर संक्रंति पर खिचड़ी खाई। पंडित जी ने सभी से अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने की कसमें भी खिलवाईं और जाते-जाते यह कह गए कि सर बरस यह पर्व आएगा। दिल खोलकर मनाते रहना, पर दो मुठ्ठी चावल और दाल शहीदों के नाम करते रहिएगा।

प्रेस में भी बनाई गई थी मकर संक्रांति

फीलखाना स्थित प्रताप प्रेस की भारत की आजादी के लिए हुए आंदोलनों में अहम भूमिका रही है। स्थानीय निवासी भी बताते हैं कि भगत सिंह मकर संक्रांति की पर्व गंगा स्नान के बाद यहीं मनाते थे और उनका साथ क्रांतिकारी और पत्रकार विद्यार्थी देते थे। गणेश शंकर विद्यार्थी ने प्रताप प्रेस की नींव रखी थी। प्रताप प्रेस भारत की आजादी के लिए तत्पर चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह, अशफाक उल्लाह खां समेत कई क्रांतिवीरों की कर्मस्थली भी रहा है। चंद्रशेखर आजाद अपने हाथों से यहां पर प्रिंटिंग करते थे। आजादी की जंग लड़ने की सभी रणनीति प्रताप प्रेस के भवन में ही तैयार की जाती थी। समय- समय पर क्रांतिकारियों की मीटिंग आयोजित की जाती थी, जिसमें देश के अलग-अलग हिस्सों में सक्रिय क्रांतिकारी कानपुर स्थित प्रताप प्रेस में एकत्र होते थे।

यह भी पढ़े :
अपने विवाह के सपने को भारत मैट्रीमोनी पर साकार करे।- निःशुल्क रजिस्ट्रेशन करे!
LIVE CRICKET SCORE
Patrika.com

लेटेस्ट ख़बरें ई-मेल पर पाने के लिए सब्सक्राइब करें

Dus ka Dum
Ad Block is Banned Click here to refresh the page

???? ??????? ?? ??? ???? ????? ???