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Ground Report : कराहते शहर में मोदी के नाम पर किला फतह की मशक्कत

Updated: IST kanpur
कानपुर में नए समीकरणों संग सपा-कांग्रेस व बसपा ने भी झोंकी ताकत

डॉ.संजीव

कानपुर. यह मजदूरों का शहर है। यह उद्योगों का भी शहर है। पर अब यहां बस कराहते मजदूर बचे हैं। उद्योग लगातार कम हुए और सरकारों ने कोई परवाह भी नहीं की। इस कराहते शहर की टीस यह है कि पहले विकास की गंगा कानपुर होकर बहती थी, पर पिछले कुछ वर्षों से विकास राजधानी लखनऊ और मुख्यमंत्रियों के गृह जनपदों तक सिमट कर रह गया। उन्हें लगता है कि चुनाव में भी कानपुर किसी की प्राथमिकताओं का हिस्सा नहीं है।भाजपा यहां मोदी के नाम पर किला फतह की मशक्कत में जुटी है, तो सपा-कांग्रेस और बसपा ने नए समीकरणों के साथ ताकत झोंक दी है।

कानपुर की बंद एलगिन मिल के बाहर मिले ज्ञान बाबू दोस्तों के साथ चुनावी चर्चा में मशगूल थे। वे बोले, कानपुर की जनता को लगातार छला जा रहा है। शहर की सबसे बड़ी समस्या बंद मिलें और बेरोजगार मजदूर हैं किन्तु इस ओर किसी का ध्यान ही नहीं जा रहा। कानपुर को सबने नजरअंदाज किया है। किसी भी पार्टी के घोषणापत्र में कानपुर की बंद मिलें नहीं है। यह स्थिति दुर्भाग्यपूर्ण है। लाल इमली चौराहे पर मिले परमट निवासी मनोज त्रिपाठी कहते हैं कि कानपुर के साथ लखऩऊ-दिल्ली में बैठे लोग सौतेला व्यवहार कर रहे हैं। दरअसल किसी की प्राथमिकता में अब कानपुर है ही नहीं। वे बताते हैं कि प्रदेश में मेट्रो की पहली परियोजना रिपोर्ट कानपुर के लिए बनी थी, किन्तु धरातल पर पहले उतरी लखनऊ मेट्रो। पहले यहां दर्जनों विभागों के राज्य स्तरीय मुख्यालय थे और उनके मुखिया आईएएस अफसर यहां बैठते थे। अफसरशाही ने मनमानी की और सभी दफ्तर एक-एक कर लखनऊ शिफ्ट हो गये। चुनाव में क्या होगा, पूछने पर दोनों लोग कहते हैं, जनता साइलेंट है पर जवाब जरूर देगी।

इस बार तोड़ना है रेकार्ड

कानपुर में दस विधानसभा सीटें हैं। कानपुर को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ व भाजपा का गढ़ भी माना जाता है। इसके बावजूद आज तक भाजपा सभी सीटें जीतने में सफल नहीं हो सकी है। बिल्हौर व घाटमपुर सीटें तो ऐसी हैं, जो भाजपा कभी नहीं जीती है। इस बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम के सहारे भाजपा यह किला फतह करना चाहती है। इसके साथ ही दूसरे दलों से लोगों को लाकर टिकट देने में भी संकोच नहीं किया गया है। बिल्हौर में बसपा से आए भगवती प्रसाद सागर को टिकट मिला है, तो बिठूर में कांग्रेस से आए अभिजीत सांगा को टिकट दिया गया है। पिछली बार बहुत कम अंतर से हारी किदवई नगर सीट भी बाहरी महेश त्रिवेदी को दे दी गयी। इससे पुराने कार्यकर्ता नाराज हैं और भाजपा को इसका खामियाजा भी भुगतना पड़ रहा है। इसके बावजूद भाजपाई उत्साहित हैं। उनका कहना है कि 2012 में भाजपा के पास चार सीटें थीं, जो इस बार हर हाल में बढ़ेंगी। वे सभी दस सीटें जीतने का दावा तो करते हैं और इसके लिए अलग-अलग तर्क भी गिनाते हैं। उनका कहना है कि लोकसभा चुनावों में सभी सीटों पर भाजपा आगे थी और यह ट्रेंड विधानसभा चुनावों में भी बरकरार रहेगा।

सपा-कांग्रेस ने बदले समीकरण

पिछले विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने कानपुर की दस में से पांच सीटें जीती थीं। कांग्रेस के पास सिर्फ एक सीट थी। इस बार सपा-कांग्रेस गठबंधन को समीकरण बदलने की उम्मीद है। कानपुर में भाजपा के साथ कांग्रेस की भूमिका भी जबर्दस्त रही थी। यहां से श्रीप्रकाश जायसवाल लगातार सांसद रहे हैं। जब कांग्रेस सब जगह हार रही थी, तब भी कानपुर से दो विधायक तो जीत ही रहे थे। पिछली बार सपा ने तेज छलांग लगाई थी और इस बार कांग्रेस के साथ मिलकर सीटें बढ़ाने की उम्मीद लगाए है। वैसे दोनों पार्टियों के बीच खींचतान भी साफ दिख रही है। गोविंद नगर सीट पर पिछली बार दूसरे स्थान पर रहे प्रत्याशी का टिकट काट दिया गया और कांग्रेस अपने उस नेता को अब तक चुनाव में सक्रिय नहीं कर पाई है। महाराजपुर सीट पर कांग्रेस ने प्रदेश उपाध्यक्ष राजाराम पाल को टिकट दिया तो सपा ने राजाराम पाल के प्रतिद्वंद्वी माने जाने वाले लाल सिंह तोमर की पत्नी अरुणा तोमर को टिकट दिया। दोनों के मैदान में आने से स्थितियां बिगड़ीं तो सपा ने अरुणा तोमर का टिकट वापस लेने का एलान कर दिया। अब अरुणा अपना नाम ही वापस नहीं ले रही हैं।

बसपा को वापसी की उम्मीद

कानपुर का शहरी अंचल भाजपा के प्रभाव में रहा है तो ग्रामीण अंचल में बसपा का दबदबा रहा है। पिछले विधानसभा चुनाव में एक भी सीट न जीत सकी बसपा इस बार वापसी की उम्मीद लगाए है। बसपा ने पिछले चुनाव में घाटमपुर, बिल्हौर व बिठूर सीटें बहुत कम अंतर से गंवाई थीं। इस बार बसपा इन तीनों सीटों के साथ शहर की कुछ सीटों पर भी कब्जे की रणनीति बनाकर काम कर रही है। बसपा की पूरी कोशिश सपा-कांग्रेस के बीच घमासान के चलते भाजपा से सीधी लड़ाई में रहने की है। बसपा नेताओं को लगता है कि इससे मुसलमान वोट बसपा की ओर मुड़ जाएंगे। कुछ सीटों पर ऐसा होता दिख भी रहा है। बसपा नेता दावा कर रहे हैं कि हम दस में से पांच सीटें जरूर जीतेंगे। उनका यह दावा कितना खरा उतरता है, यह तो 11 मार्च को पता चलेगा, किन्तु इतना तय है कि बसपा टिकट वितरण में जातीय समीकरणों को आधार बनाने के साथ प्रत्याशियों को ज्यादा समय देकर मजबूती से चुनौती तो दे ही रही है। कुछ सीटों पर उसे भाजपा व सपा-कांग्रेस की अंतर्कलह का लाभ भी मिल रहा है।

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