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पत्रिका विशेषः ररौख-परौंख से रायसीना हिल्स तक की यात्रा में राम संग चले रामनाथ

Updated: IST ramnath kovind
सरकारी स्कूलों में पढ़े कोविंद हार गए थे पहला चुनाव, अब आखिरी चुनाव जीतने की उम्मीद लगाए हैं गांव-घर वाले

डॉ.संजीव

कानपुर. कानपुर देहात के झींझक कस्बे से मंगलपुर की ओर चलने पर जुड़वां गांव पड़ते हैं ररौख-परौख। इन दोनों गांवों के लोग सोमवार को अचानक आह्लाद से भर उठे। जैसे ही उन्हें पता चला कि उनके गांव का लाड़ला रामनाथ अब देश की सबसे बड़ी कुर्सी की ओर बढ़ चला है। रनौख-परौंख से रायसीना हिल्स तक की इस यात्रा में रामनाथ कोविंद ने राम का साथ कभी नहीं छोड़ा। उनके निकटस्थ लोग मानते हैं कि राम की कृपा से रामनाथ आज देश की सबसे ऊंची कुर्सी पर बैठने जा रहे हैं।

रामनाथ कोविंद अपने दोस्तों के बीच पुरानी स्मृतियों के लिए जाने जाते हैं। उनके बेहद करीबी भाजपा नेता राजेंद्र सिंह चौहान बताते हैं कि राज्यसभा सदस्य से लेकर राज्यपाल बनने तक उनके व्यवहार में कोई बदलाव नहीं आया है। उम्मीद जताई कि जमीन से निकले कोविंद राष्ट्रपति बनेंगे तो देश को सकारात्मक दिशा ही मिलेगी। वे बताते हैं कि बीच-बीच में कई बार वे स्वयं फोन कर लेते थे। रामनाथ कोविंद बचपन से ही ईश्वर के प्रति बेहद आस्थावान थे। रामभक्ति उनमें कूट-कूट कर भरी थी। अपनी पूरी जीवन यात्रा में वे राम के साथ चले और उम्मीद है आगे भी चलेंगे। कोविंद के गांव के पास ही स्थित गांव मनेथू के रहने वाले पत्रकार शिवचरण चौहान कहते हैं कि यदि कोबिद राष्ट्रपति बने तो रायसीना हिल्स पर एक दलित किसान का बेटा विराजेगा। उनके पिता किसान होने के साथ बच्चों की पढ़ाई के प्रति बेहद गंभीर थे। कोविंद ने भी कभी किसी को खाली नहीं लौटाया। दलित होने के साथ सभी जातियों से उनके समान रिश्ते हैं। उनका गांव ब्राह्मण-ठाकुर बहुलता वाला होने के बावजूद कभी विवाद नहीं हुआ और सबसे उनके रिश्ते मधुर रहे।

गांव का घर किया दान

रामनाथ कोविंद पांच भाइयों व चार बहनों में सबसे छोटे हैं। दो भाइयों व चारो बहनों का निधन हो चुका है। एक भाई मध्य प्रदेश के गुना व दूसरे आज भी गांव में रहते हैं। वे स्वयं भी नियमित गांव से जुड़े रहते हैं। उन्होंने कानपुर के दयानंद विहार में अपना घर भी बनवा लिया, फिर भी वे गांव लगातार जाते रहे। गांव वालों की परेशानियों से जुड़ते हुए उन्होंने अपना गांव वाला घर बारातशाला के लिए दान कर दिया है। य लगातार जुड़े रहे। गांव में उनके परिजन आज भी जमीन से जुड़े हैं। उन्हें बचपन में स्वयं कई किलोमीटर दूर पैदल चल कर स्कूल जाना पड़ता था, इसलिए स्वयं मजबूत होने पर उन्होंने गांव में प्राइमरी स्कूल खुलवाया। अब गांव के बच्चे वहीं पढ़ते हैं।

सिविल सर्विसेज में पाई सफलता

परौख गांव में 1945 में जन्मे रामनाथ कोविंद की पढ़ाई की शुरुआत कानपुर देहात के संदलपुर ब्लाक के खानपुर प्राइमरी स्कूल में हुई। रामनाथ ने नौवीं में कानपुर नगर के बीएनएसडी इंटर कालेज में प्रवेश लिया तो वहीं से 12वीं पास कर बीकॉम की पढ़ाई डीएवी कालेज से की। डीएवी लॉ कालेज से एलएलबी कर वे आईएएस की तैयारी करने दिल्ली चले गए। सिविल सर्विसेज की परीक्षा में वे सफल भी हुए किन्तु आईएएस कॉडर न मिलने के कारण उन्होंने सिविल सर्विसेज में न जाने का फैसला किया और दिल्ली हाई कोर्ट में वकालत करने लगे। हाई कोर्ट व सुप्रीम कोर्ट में वकालत के बाद वे देश के चर्चित वकीलों में शुमार हुए।

मोरारजी के साथ हुई शुरुआत

आपातकाल के बाद जनता पार्टी की सरकार बनी तो कोविंद तत्कालीन वित्तमंत्री मोरारजी देसाई के संपर्क में आए। वे उनके निजी सचिव बने। इसके साथ ही वे भाजपा नेतृत्व के संपर्क में आए तो धीरे-धीरे भाजपा की दलित राजनीति के चेहरे बन गए। पार्टी ने 1990 में कोबिद को घाटमपुर लोकसभा सीट से टिकट दिया, किन्तु वे चुनाव हार गए। इसके बाद 1993 व 1999 में पार्टी ने उन्हें राज्य सभा भेजा। इस दौरान वे भाजपा अनुसूचित मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी बने। वर्ष 2007 में वे भोगनीपुर विधानसभा सीट से चुनाव लड़े किन्तु फिर नहीं जीत सके। इसके बाद उन्हें उत्तर प्रदेश भाजपा संगठन में सक्रिय कर प्रदेश का महामंत्री बनाया गया। पिछले वर्ष अगस्त में उन्हें बिहार का राज्यपाल बनाया गया था। अब जैसे ही उनके राष्ट्रपति का प्रत्याशी बनाए जाने की बात सामने आई, उनके संगी-साथी खुशी से झूम उठे। उनके गांव-घर वाले भी मानते हैं कि कोविंद पहला चुनाव भले ही नहीं जीत सके, किन्तु उम्मीद है कि यह आखिरी चुनाव जरूर जीतेंगे।

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