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Video Icon नोटबंदी के कारण मैनचेस्टर को लगा बड़ा झटका, लेदर व अन्य फैक्ट्रियों में काम ठप

Updated: IST Note ban new rules of withdrawl
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के पांच सौ और एक के नोटबंदी के फरमान के बाद मैनचेस्टर के छोटे कारखाने और बड़ी फैक्ट्रियों में ताला लटकने लगे हैं

कानपुर.प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के पांच सौ और एक के नोटबंदी के फरमान के बाद मैनचेस्टर के छोटे कारखाने और बड़ी फैक्ट्रियों में ताला लटकने लगे हैं। शहर नें 2 लाख 20 हजार मजदूर यहां पर काम कर अपना व अपने परिवार का पेट पाल रहे थे। बड़े नोट बंद होने के बाद मैनचेस्टर के उद्योग बड़े कैश क्रंच (नकदी संकट) की तरफ बढ़ रहे हैं। एक झटके में मार्केट का सारा पैसा बैंकों में जाने के बाद नकद पर आधारित कारोबार करीब-करीब ठप हो चुका है वहीं लघु और मध्यम उद्यम इकाइयां भी उत्पादन नहीं कर पा रही हैं।
उद्योग जगत के लोगों की माने तो बड़ी इकाइयों में उत्पादन जान बूझकर कम किया जा रहा है ताकि बैकअप की समस्या न हो वहीं छोटे उद्यमी एक-दो दिन तक ही उत्पादन कर पाएंगे। जो कारोबार बैंक पेमेंट पर आधारित हैं, उनके लेबर को पेमेंट न मिल पाने से करीब अस्सी फीसद काम प्रभावित हुआ है। कैश क्रंच के चलते कानपुर की मैन्यूफैक्चरिंग, होजरी, पान मसाला, टेक्सटाइल, इंजीनियरिंग कंपोनेंट, टेनरी आदि उद्योगों में काम प्रभावित हो रहा है, खासकर बड़े उद्योगों को छोटे सामान मुहैया कराने वाली सहायक इकाइयों में। कई टेनरी में कच्चा चमड़ा कैश खरीदा जाता है। शहर में करीब सात हजार छोटी बड़ी इकाइयां हैं और कुल टर्नओवर करीब आठ हजार करोड़ का होता था।

लेदर इंडस्ट्री का कारोबार चरमराया

बड़े नोटों पर पाबंदी के बाद इंडस्ट्रियल

सिटी कानपुर पर भी गहरा असर पड़ा है। शहर की रीढ़ लेदर इंडस्ट्री का हाल खराब है। टेनरियों में काम करने वाले काफी मजदूर पैसों की किल्लत के कारण गांव लौट गए हैं तो उत्पादन 50-80 प्रतिशत तक गिर गया है। बड़ी टेनरियां तो शायद संकट से निपट भी लें, लेकिन छोटी टेनरियां अगले कुछ महीनों में तालाबंदी की ओर जा सकती हैं। लेदर एक्सपोर्ट महमूद ने बताया कि गांवों से आने वाले मजदूर बैंकिंग से अनजान हैं। हर हफ्ते उन्हें मजदूरी कैश में ही दी जाती है। पिछले तीन हफ्ते से रुपये न मिलने के कारण पेमेंट रुका तो वे घर चले गए हैं।

इसके अलावा दूसरा बड़ा फैक्टर रॉ हाइड (कच्ची खाल) का है। स्लॉटर हाउसों में काम तकरीबन बंद हो चुका है। यहां किसान जानवर लेकर आते हैं। खाल के एवज में उन्हें कैश पेमेंट किया जाता है। पुराने नोटों का चलन बंद हो चुका है और नए नोटों की जबरदस्त कमी है। तैयार माल के खरीदार भी नहीं हैं। ऐसे में उत्पादन 50 पर्सेंट तक गिर गया है। अगर यह हाल एक हफ्ते और बरकरार रह गया तो मांग और कच्चे माल की कमी से बड़ी टेनरियों पर ताले लगना तय है।

एक माह से मजदूरों का वेतन रुका

छोटी टेनरियों का हाल तो ज्यादा खराब है। स्मॉल टेनर्स एसोसिएशन के जनरल सेक्रटरी नैयर जमाल के मुताबिक, 22 नवंबर को छोटी टेनरियों में वेतन दिया जाना था, लेकिन नोट किसी के पास नहीं थे। अचानक मांग 10-20 पर्सेंट रह गई तो तुरंत उत्पादन रोकना पड़ा। कच्ची खाल के दामों में 40 पर्सेंट तक तेजी आ गई है और डिमांड 75 पर्सेंट गिर गई। ऐसे में मजदूरों को कुछ दिन बाद आने को कहा गया है। कुछ टेनरियों में शनिवार को मजदूरी दी जाती है। बैंकों में ही नोट नहीं हैं तो हम क्या करें। बुधवार को भी कानपुर के कई बैंकों में बिल्कुल कैश नहीं था। लोग मैनेजमेंट को गालियां दे रहे थे।

कुछ इस तरह बोले कानपुर के उद्यमी

मोहम्मद इफ्तेखार, रीजनल चेयरमैन, सीएलई ने कहा कि सरकार का कदम बेहतरीन है लेकिन कम धन निकासी के चलते कर्मचारियों को वेतन देने में दिक्कत आ रही है। जिन्हें वेतन मिला है, उन्हें बड़े नोट मिले है। वह वापस करने की मांग कर रहे हैं या फिर बैंकों में लाइन लगा रहे हैं। लेदर उद्योग से जुड़ी इकाइयों में दो दिनों में करीब बीस फीसद लेबर नहीं आई। इससे उत्पादन प्रभावित हो रहा है। वहीं अनिल पांडेय, अध्यक्ष आईआईए ने कहा कि अभी तो उद्योगों के लिए परेशानी है लेकिन दूरगामी परिणाम बहुत अच्छे हैं। कारोबार पर करीब एक महीने असर पड़ेगा।

सबसे अधिक मार छोटे उद्यमियों पर पड़ी है। उनके यहां उत्पादन ठप हो गया। लेबर को बैठाकर तनख्वाह दी जा रही है। सरकार को कैश निकासी की सीमा बढ़ानी चाहिए। ज्वेलर्स कारोबारी कमलेश गर्ग ने कहा कि नकली करेंसी और कालाधन के खिलाफ कदम अच्छा है लेकिन थोड़ा समय देना चाहिए था। इतनी जल्दी-जल्दी कठोर कदम उठाना एक तरह का अघोषित आपातकाल है। पहले टैक्सेशन की मार बढ़ी और सुनवाई नहीं हुई। अब नोट बंद कर दिया। कारोबार पूरी तरह ठप हो
गया। लोग मनमाने भाव बोल रहे हैं। लेनदेन नहीं हो रहा है। सहालग के समय यह स्थिति कारोबारियों को सड़क पर ला
रही है।

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