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Photo Icon हिंदू धर्म में एक ऐसा समुदाय जिसमें वर पक्ष निभाता है वधू पक्ष की ये रस्म

Updated: IST kanpur
इस देश में भांति-भांति के धर्म व वर्ग निवास करते है। जिनकी अपनी-अपनी परम्पराएं है। सारे पर्व रीति रिवाज व अपने अनुसार मनाते है

अरविन्द वर्मा
कानपुर देहात.इस देश में भांति-भांति के धर्म व वर्ग निवास करते है। जिनकी अपनी-अपनी परम्पराएं है। सारे पर्व रीति रिवाज व अपने अनुसार मनाते है। लेकिन हिंदू धर्म का एक ऐसा भी समुदाय है जो घुमंतू समुदाय में आते है। जिन्हे वीर योद्धा महाराणा प्रताप के वंशज भी कहा जाता है। कुछ लोग इन्हे 'भडगडा' भी कहते है। इस समुदाय के लोग शादी विवाह हिंदू धर्म के अनुसार ही करते है लेकिन दान दहेज के मामले में लड़का पक्ष के लोग रस्म निभाते है। अक्सर ये लोग किसी भी शहर, गांव में सड़क किनारे निवास करते हुये देखे जाते है।

जो लोहे को पीटकर उनसे बनने वाले घरेलू उत्पाद को बेचकर अपना गुजर बसर करते है। लेकिन स्वाभिमान क्षत्रियों के समान ही देखने को मिलता है। ये लोग अपनी लकड़ी की एक गाड़ी के नीचे पूरा जीवन गुजारते है। गर्मी, सर्दी, बरसात तीनों मौसम में इनका समूचा परिवार उस गाड़ी के नीचे अपनी शान और शौकत से रहते है। आज भी ये लोग रात्रि बेला में अपने आवास में रौशनी के लिये दीपक नहीं जलाते है। दूसरे घरों की रौशनी या स्ट्रीट लाइट के सहारे रात गुजारते है। धन्य है महाराणा प्रताप और उनके ये वंशज, जो आज भी अपनी परम्पराओं को बखूबी निभा रहे है।

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वर पक्ष तलाशते है रिश्ते के लिये वधू

मंगलपुर मुख्य मार्ग किनारे रहने वाले रामसिंह पुत्र पर्वत सिंह बताते है कि ये उनकी चौथी पीढ़ी है उनके समुदाय में पहले लड़का पक्ष लड़की को तलाश करते है फिर पूरे परिवार की पंचायत होती है। जिसमें लेनदेन की बात होती है। जिसके बाद हिंदू धर्म के अनुसार बारात खाना-पीना रात्रि बेला में भांवर कलेवा और अंत में विदाई कार्यक्रम होता है। रात्रि बेला में चढ़ाव के समय अगर लड़का पक्ष जेवरात लेकर नहीं आता है तो पंचायत उसके बदले में उसकी धनराशि निश्चित करते है जो लड़का पक्ष को देना होता है। जिसके बाद पूरे वैवाहिक जीवन में वधू कामकाज में वर से ज्यादा मेहनत करके अपना परिवार चलाती है।

विवाह के बाद माता पिता लड़के को अलग कर देते है

इस समुदाय में एक भिन्न परम्परा है कि शादी विवाह होने के बाद माता-पिता लड़के व बहू को अपने घर से अलग कर देते है। और जो गाड़ी उन्हे दहेज के रूप में मिलती है फिर वह उसी गाड़ी के नीचे अपना आवास बनाकर गुजर बसर करने लगते है। ये भी कह सकते है कि एक छोटी सी गाड़ी के नीचे एक साथ कई परिवार गुजारा नहीं कर सकते है रामसिंह बताते है कि रमेश सुरेश सुल्तान एवं मिथुन आदि उनके चार पुत्र है। जिनकी शादी के बाद उन्हे अलग कर दिया गया अब वो अपनी परम्परा को निभाते हुए अपना परिवार चला रहे है।

इस समुदाय के लोग रोशनी के लिये दीपक नहीं जलाते है

इस समुदाय के लोगों को महाराणा प्रताप के वंशज कहा जाता है। मान्यता है कि महाराणा प्रताप के इंतकाल के बाद से इस वंशज ने अपने आशियाने में दीपक जलाना छोड़ दिया था तब से ये लोग रौशनी के लिये दीपक या लैम्प नहीं जलाते है। दूसरे के घरों के उजाले से अपना गुजारा करते है या सड़क किनारे जलने वाली स्ट्रीट लाइट की रौशनी में खुशहाल रहते है रामसिंह का कहना है कि वे अपने पूर्वजों की परम्पराओं को निभा रहे है उनके पद्चिन्हों पर चल रहे है, अपनी जी तोड़ मेहनत से कमाते है और उसी से अपना जीवन व्यतीत करते है।

अब हो गया कुछ रिवाजों में परिवर्तन

रामसिंह की पत्नी कमला का कहना है कि पहले हमारे समुदाय में लड़कियां या महिलाएं चोली व घाघरा पहनती थी जो उनकी परम्परा में समाहित था। लेकिन धीरे-धीरे समय गुजरने पर अब कुछ लोग सलवार कुर्ता व महिलाएं साड़ियां भी पहनने लगी है। वहीं पुरुष वर्ग भी अब लुंगी कुर्ता के अतिरिक्त पयजामा कुर्ता व पैंट शर्ट भी पहनने लगे है। हाथों में पहनने वाले खडुओं में रिवाज में भी बदलाव आ गया है। अब महिलाएं चूडियां पहनकर बीसवीं शताब्दी में सम्मिलित हो गयी है।

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