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UP Election 2017

दांव को नहीं भांप पाए 'सुल्तान', यूपी के 'सुपर पावर' बने रामगोपाल

Updated: IST akhilesh
रामगोपालअपने इस एक दांव में नेता जी, शिवपाल और अमर सिंह को चारों खाने चित कर यूपी के सुपर पॉवर बन गए।

कानपुर। सपा परिवार में पिछले दो माह से जबरदस्त घमासान चल रहा है। बेशक पार्टी व परिवार की इस लड़ाई में आपको दो चेहरे शिवपाल यादव और अखिलेश यादव नजर आ रहे हों, लेकिन हकीकत में इस लड़ाई में पर्दे के पीछे से प्रोफेसर रामगोपाल यादव का दिमाग चल रहा है। सैफई परिवार के करीबी पंकज श्रीवास्तव ने बताया कि आज यादव परिवार में जो कलह चल रही है, इसके पीछे सीधे प्रोफेसर रामगोपाल का हाथ है। यूपी में पांच साल से सपा की सरकार है, लेकिन शिवपाल यादव के चलते रामगोपाल की नहीं चली और उन्हें राजनीति के हासिए पर रखा गया। इसी के चलते उन्होंने अपने एक दांव में नेता जी, शिवपाल और अमर सिंह को चारों खाने चित कर यूपी के सुपर पॉवर बन गए।

2010 में शुरू हो गई थी परिवार की रार

यादव परिवार में जंग की अधारशिला 2010 में रख दी गई थी। मुलायम सिंह बेटे अखिलेश को राजनीति में आगे बढ़ाने के लिए अमर सिंह को जिम्मेदारी दी हुई थी। इसके चलते प्रोफेसर अमर सिंह से बेहद खफा था। 2010 से पहले शिवपाल और रामगोपाल एक हुआ करते थे। श्रीवास्तव ने बताया कि सपा में एकक्षत्र राज अमर सिंह का हुआ करता था। नेता जी हर बड़े फैसले उन्हीं से पूछकर लिया करते थे। इसी के चलते दोनों भाई अमर सिंह से खफा थे और नेता जी को अपने पाले में कर अमर सिंह को पार्टी से बाहर करवा दिया।

प्रोफेसर के चलते सीएम नहीं बन पाए शिवगोपाल

2012 विधानसभा चुनाव में सपा की जीत के बाद सीएम के नाम पर नेता जी ने बैठक बुलाई। इसी दौरान अधिकतर लोगों ने शिवपाल के नाम पर सहमति दी। लेकिन प्रोफेसर ने ऐन वक्त अखिलेश का नाम आगे कर शिवपाल यादव के सपनों में पानी फेर दिया और यहीं से दोनों के बीच रार की शुरूआत हो गई थी। प्रोफेसर रामगोपाल अखिलेश यादव को सीएम बनवाने के बाद लखनऊ से दिल्ली के लिए निकल गए। लेकिन शिवपाल अंदरखाने उनसे खुन्नस करने लगे। पांच साल शिवपाल ने रामगोपाल को यूपी की सत्ता से दूर रखा, लेकिन वह सीएम के टच में रहते थे। एक साल से अखिलेश यादव चाचा और अंकल के खिलाफ हो गए।

कांग्रेस से गठबंधन के सूत्रधार प्रोफेसर साहब

पंकज श्रीवास्तव ने बताया कि अखिलेश यादव और चाचा रामगोपाल के बीच अंदरखाने काफी अच्छी मित्रता थी। लेकिन इसकी जानकारी न तो मुलायम सिंह को थी ओर न ही शिवगोपाल को। रामगोपाल ने सीएम को भरोसे में लेकर 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी और पीके से मिलकर गठबंधन कीद नींव रख दी थी। इसकी जानकारी नेता जी को हुई तो उन्होंने रामगोपाल को जमकर लताड़ लगाई और सीएम से पूरे प्रकरण पर बात की। लेकिन अखिलेश यादव ने गठबंधन और रामगोपाल का साथ नहीं छोड़ने की बात अपने पिता से दो टूक से कह दी।
प्रोफेसर को मिल सकती है साइकिल

रामगोपाल यादव को काफी पहले ही पार्टी के टूटने का अंदाजा हो गया था और इसलिए वे एक जनवरी को सपा का राष्ट्रीय अधिवेशन बुलाया और मुलायम सिंह को अध्यक्ष पद से हटाते हुए अखिलेश यादव को समाजवादी पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनवा दिया। जानकारों की मानें सपा का संविधान लिखने वाले प्रोफेसर साहब ने सब कुछ नियमों के तहत ही किया है।
सपा के संविधान में लिखा है कि अगर पार्टी के 40 फीसदी निर्वाचित पदाधिकारी राष्ट्रीय अधिवेशन की मांग करते हैं तो पार्टी महासचिव राष्ट्रीय अधिवेशन बुला सकता है। साथ ही इस अधिवेशन को जायज ठहराने के लिए रामगोपाल ने पार्टी उपाध्यक्ष किरणमय नंदा से इस अधिवेशन की अध्यक्षता कराई। बताया जाता है कि सपा के संविधान में यह भी लिखा है कि किसी भी अधिवेशन में अगर राष्ट्रीय अध्यक्ष शामिल नहीं होता है तो उसमें उपाध्यक्ष का शामिल होना अनिवार्य है। इसके अलावा सबसे बड़ी बात यह है कि पार्टी अध्यक्ष को हटाने की प्रक्रिया या उस पर महाभियोग चलाने के बारे में पार्टी संविधान में कुछ भी नहीं कहा गया है जिसका फायदा उठाते हुए रामगोपाल यादव ने अखिलेश यादव के हाथों में पार्टी की बागडौर सौंप दी।

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