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Photo Icon रामनाथ कोविंद के रायसीना हिल्स पहुंचने पर मझावन गांव में बजेगी शहनाई

Updated: IST Sahnai
रामनाथ कोविंद के रायसीना हिल्सपहुंचने पर मझावन गांव में बजेगी शहनाई

कानपुर.एनडीए की तरफ से राष्ट्रपति पद के लिए बिहार के राज्यपाल रामनाथ कोविंद के नाम पर मुहर लगने से कानपुर से थोड़ी दूरी पर स्थित मझावन गांव के लोगों को खासी उम्मीदें हैं। इस गांव की पहचान शहनाई की सुरीली तान है जो मौजूदा वक्त में प्रोत्साहन के आभाव में दम तोड़ चुकी है। ऐसे में शहनाई वादन से जुड़े लोगों को उम्मीद है कि स्वभाव बेहद सरल व जमीन से जुड़े कोविंद जब रायसीना हिल्स में पहुंचेंगे तो उनके लिए जरूर कुछ करेंगे।

शहनाई की मधुर तान है मंझावान की पहचान

कानपुर के मझावन गांव की गलियों में आप घूम रहे हैं तो आपके कानों में शहनाई के सुरीले स्वर सुनाई पड़ेंगे, लेकिन आपको इसके लिए एक जगह खड़े होकर शहनाई वादन सुनने की आवश्यकता नहीं हैं। आप चलते रहिए, हर घर से आपको एक ही राग सुनायी पड़ेगा। ऐसा इसलिए हैं कि इस गांव में लगभग सभी लोग शहनाई वादक हैं। दूसरी बात ये हर सुर समय के हिसाब से बजाते हैं। मतलब समय के प्रहर के हिसाब से राग तय है। दूसरा राग बजाना गलत समझा जाता है क्योंकि यहां इनकी भाषा में सोते हुए राग को जगाना गलत होता है।

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दस पीढ़ियों से बज रही 'शहनाई'

शहनाई का नाम आते ही लोगों के जुबान पर सिर्फ उस्ताद बिस्मिल्लाह खान का नाम आता है लेकिन कानपुर से २७ किलोमीटर की दूरी पर मझावन गांव में लोग दस पीढियों से शहनाई वादक रह रहे हैं। यहां हर घर में शहनाई वादक है। खास बात ये हैं कि अगर किसी के घर शहनाई वादक नहीं हैं तो समझिए उसने तंगहाली में शहनाई उठा कर रख दी है।

200-250 सालों से बजा रहे शहनाई

वैसे तो गिने-चुने देशों में ही संगीत की इतनी पुरानी एवं इतनी समृद्ध परम्परा पायी जाती है। माना जाता है कि संगीत का प्रारम्भ सिंधु घाटी की सभ्यता के काल में हुआ हालांकि इस दावे के एकमात्र साक्ष्य हैं। देखा जाए तो भारत में शहनाई वादन का इतिहास बहुत पुराना है।गांव के निवासी जलील के कहते हैं कि पिछली 8-10 पीढियों से शहनाई बचा रहे हैं। यानी 200-250 साल से। हम लोगों ने ये कला अपने नाना गुलाम हुसैन से सीखी जो रीवा के राजदरबार में शहनाई बजाते थे और ये खानदानी परंपरा चली आ रही है। जलील मास्टर, जो अब भी 65 साल की उम्र में शहनाई बजाते हैं।

रामनाथ कोविंद से जगी उम्मीद

बिहार के राज्यपाल रामनाथ कोविंद के नाम पर मुहर लगने से जहां विपक्षी दलों की नींद उड़ गई है वहीं कानपुर वासियों के लिए मोदी का पैंतरा किसी उम्मीद से कम नहीं है। कानपुर देहात के डेरापुर के परौंख गांव में जन्मे कोविंद से कानपुर के मझावन गांव को खासी उम्मीदें हैं। इस गांव की पहचान शहनाई की सुरीली तान है जो मौजूदा वक्त में प्रोत्साहन के आभाव में दम तोड़ चुकी है। बदलते जमाने में शहनाई से परिवार चलाना मुश्किल हो चला है। बदलते परिवेश में अब लोग शहनाई की मोहक स्वर ध्वनि पर ध्यान नहीं देते हैं। संगीत अब तेज हो चला है ऐसे में शहनाई पिछड़ गयी है। मझावन के कुछ शहनाई वादक भी अनपढ़ रह गए और नए बोल नहीं सीख पाए। वैसे इनके पास काफी पुरानी किताबें हैं जिनमे सुर लिखे हुए हैं। नए किसी भी बोल का इस सुर की किताब से मिलान ज़रूरी होता है। मझावन के ही शहनाई वादक निकल कर दिल्ली, वाराणसी, लखनऊ, महोबा, रीवा और ग्वालियर तक फैल गए हैं। इन सबके बाद इस गांव को रामनाथ कोविंद से उम्मीद जगी है।

नहीं हो रही अच्छी आमदनी

शकील के मुताबिक इसका नुकसान इन लोगों को बहुत होता है। ज्यादातर बुकिंग शादी विवाह में बजने वाले बैंड बजाने वालों के जरिये होती है। वो लोगों से बनारस के शहनाई वादक के नाम पर ज्यादा पैसा लेते हैं और केवल 4-5 हजार में मंझावान से लोगो को बुला लेते हैं। औसत में एक सहालग में 15-20 प्रोग्राम एक परिवार को मिल जाते हैं. एक का पेमेंट करीब 4-10 हजार तक होता है. लेकिन इसमें से ढोलक, मंजीरावाला, बोलवाला को भी देना पड़ता है।

7-10 लग जाते है सीखने में

शहनाई सीखने में 7-10 साल लग जाते हैं। जलील मास्टर के अनुसार उन्होंने 15 साल रियाज किया तब पारंगत हुए। जैसे जैसे मांग कम हो रही है वैसे ही शहनाई भी छोटी होती जा रही है। पहले 22 इंच लम्बी शहनाई होती थी और 16 इंच वाली रह गयी है. सुरों के लिए शहनाई में छेद होते हैं जिन्हें उंगलियों से कंट्रोल किया जाता है। अब नए लड़के छोटी शहनाई बजा रहे हैं क्योंकि अगर सुर दूर हुए तो मेहनत ज्यादा लगेगी।

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