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इस मंदिर में अदभुत शक्ति, तीन दफा रंग बदलती है शिवलिंग

Updated: IST Sawan Month second Somvar Lord Krishna Bileshwar M
श्रवण मास चल रहा है और देश भर के शिव मंदिरों में बम-बम भोले के जयकारे लग रहे हैं।

कानपुर। श्रवण मास चल रहा है और देश भर के शिव मंदिरों में बम-बम भोले के जयकारे लग रहे हैं। भक्त भगवान शंकर के दरबार पर आकर माथा टेकते हैं और दुख-दर्द के साथ अमन-चैन की दुआ मांगते हैं। एक ऐसा ही एतिहासिक मंदिर है, जो कानपुर के गंगा के किनारे पर स्थित है, जिसे भक्त जागेश्वर धाम के नाम से पुकारते हैं। मान्यता है कि मंदिर परिसर पर विराजी शिवलिंग दिन में तीन बार रंग बदती है। जागेश्वर मंदिर प्रबंधक महासभा के मंत्री प्राण श्रीवास्तव के मुताबिक शिवलिंग सुबह के वक्त भूरे, दोपहर में ग्रे और रात में काले रंग में तब्दील हो जाता है। प्राण कहते हैं कि जरगेश्वर महादेव अपने भक्तों को इन्हीं रूपों में दर्शन और आर्शीवाद देते हैं।

ये है मंदिर का इतिहास

मंदिर के पुजारी कैलाशनाथ शुक्ल ने बताया कि सैकड़ों साल पहले यहां भीषण जंगल हुआ करता था और गांववाले अपने मवेशी चराने के लिए आया करते थे। सिंहपुर कछार निवासी जग्गा किसान के पास कई दर्जन गायें थीं। वो उन्हें चराने के लिए इसी टीले पर लाया करता था। जग्गा के पास एक दुधारू गाय थी, जो शाम को घर पहुंचने पर दूध नहीं देती। जग्गा ने इसकी पड़ताल की तो उसके पैरों के तले से जमीन खिसक गई। गाय टीले पर आकर दूध गिरा रही थी। जग्गा ने ये जानकारी गांववालों को दी और लोगों ने खुदाई शुरू की तो एक शिवलिंग मिला। गांववालों ने विधि-विधान से पूजा-पाठ के बाद उसे यहीं पर स्थापित कर किसान के नाम से मंदिर का नाम जागेश्वर रख दिया।

तो उसकी भाग्य के दरबाजे खुले

मंदिर के पुजारी की माने तो जो भक्त श्रवण मास के शुभ अवसर पर जागेश्वर महादेव के दर्शन करता है,उसके पास दुख-दर्द नहीं भटकता। पुजारी ने बताया कि शिवलिंग के तीनों स्वरूपों के दर्शन के लिए भक्त को पूरे दिन मंदिर परिसर पर गुजारना होता है। जिसने भी भगवान जागेश्वर के तीनों रूपों के दर्शन एकबार कर लिए धन-धान के साथ ही मरते हुए इंसान के प्राण वापस आ जाते हैं। पुजारी बताते हैं कि जागेश्वर के दर्शन के लिए नानराव पेशवा और लक्ष्मी बाई के साथ मैना मंदिर, परिसर से कुछ दूरी पर एक सुरंग थी, इसी के जरिए भी आया करती थीं। सावन के आखरी सोमवार को मंदिर के अखाड़े में कुश्ती होती है, इसमें लक्ष्मी बाई बड़े-बड़ों को पटखनी देकर पुरूस्कार ले जाया करती थीं।
इसलिए लगता है नागों का मेला

कानपुर का एकलौता मंदिर है, यहां पर सैकड़ों साल से नगापंचमी पर्व पर सांपों का मेला लगता है। मंदिर के पुजारी कहते हैं, इसके पीछे भी एक रहस्य छिपा है। बताते हैं, यहां नाग और नागिन को जोड़ा कई सालों से रह रहा है और मंदिर के पट खुलने से पहले वो पूजा-अर्चना करने के बाद विलुप्त हो जाते हैं। पुजारी कहते हैं कि 25 साल पहले हमने नाग-नागिन के जोड़े को देखने के लिए रात से मंदिर के बाहर बैठ गए। भारे पहर करीब 4 बजे दो नाग दिखे और मंदिर की सीढ़ी चढ़ते हुए शिविंलग के पास जाकर परिक्रमा करने के बाद चुपचाप निकल गए। मंदिर के कर्मचारियों ने दोनों को कईबार देखा है, लेकिन उन्होंने किसी को अ ाज तक हानि नहीं पहुंचाई। वो जागेश्वर की रखवाली करते हैं।

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