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गोरखालैंड आन्दोलन:पत्थरबाजों से पुलिसकर्मी मुश्किल में

Updated: IST kolkata news
कश्मीर घाटी की तरह दार्जिलिंग की वादियों में पत्थरबाज सुरक्षा बलों के रास्ते में मुश्किलें खड़ी कर रहे हैं। पहाड़ पर सुरक्षाकर्मी जब कभी भी कानून तोडऩे वालों के खिलाफ कार्रवाई

दार्जिलिंग. कश्मीर घाटी की तरह दार्जिलिंग की वादियों में पत्थरबाज सुरक्षा बलों के रास्ते में मुश्किलें खड़ी कर रहे हैं। पहाड़ पर सुरक्षाकर्मी जब कभी भी कानून तोडऩे वालों के खिलाफ कार्रवाई कर रहे हैं तो उद्वेलित युवा अपने मुंह पर काले कपड़े लगा कर उन पर पत्थर और बोतलें फेंकने लगते हैं। वे तेजी से जगह बदल रहे हैं। इससे पुलिसकर्मियों को कानून-व्यवस्था को बनाए रखने में परेशानी हो रही है।

गोरखालैण्ड अलग राज्य के समर्थन में सुरक्षा बलों पर पत्थर फेंकने वाले अधिकतर युवक शिक्षित हैं और अच्छे परिवारों से हैं। लेकिन कश्मीर की तरह वे खुद को भारतीय होने से इनकार नहीं कर रहे हैं। वे खुद को भारतीय कह रहे हैं और अपनी लड़ाई को अपने हक, पहचान और भविष्य की लड़ाई करार दे रहे हैं।

लड़ रहे अपने हक की लड़ाई

कलकत्ता विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में मास्टर्स करने वाले 25 वर्षीय विनय तमांग ने कहा कि वे कोई गुंडा या सड़क छाप लड़का नहीं हैं, जिसे पुलिस जब चाहे पीट देगी। वे अपने अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं।

उनके परिवार के कई सदस्य सेना में रह चुके हैं और उन्होंने देश की सेवा की है। वे राष्ट्र विरोधी नहीं हैं। वे तो बस इतना चाहते हैं कि कि उनका अपना एक राज्य हो। दार्जिलिंग के एक मशहूर कॉलेज के एक छात्र ने कहा कि अगर राज्य सरकार ने नोटिस जारी कर पहाड़ी क्षेत्र में बांग्ला नहीं थोपे जाने की घोषणा की होती तो हालात इतना हिंसक नहीं होते।

नहीं बैठेंगे चुप

सरकारी स्कूलों में बांग्ला भाषा अनिवार्य करने पर आठ जून को पहली बार गोजमुमो के उग्र विरोध के बाद से बारहवीं कक्षा के छात्र पवन लांबा नियमित पत्थरबाज बन चुके हैं। उन्होंने कहा कि वे बंगाली नहीं हैं। वे गोरखा हैं। अपनी पहचान बचाने के लिए अलग गोरखालैंड राज्य की मांग कर रहे हैं और यह लड़ाई उनकी भविष्य की लड़ाई है। यह उनका अधिकार है, जिसे वे लेकर रहेंगे।

लांबा उन हजारों युवाओं में से एक हैं जो गोरखालैंड के समर्थन में खुलकर सामने आए हैं और लाठीचार्ज होने पर उन्होंने सुरक्षा बलों को चुनौती दी है। अपने चेहरे को काले कपड़े से ढके हुए तृतीय वर्ष के एक छात्र ने कहा कि कि भारत एक लोकतंत्र देश है और लोकतंत्र में सभी को शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने का अधिकार है। प्रदर्शन करने से हमें कोई कैसे रोक सकता है। पहले हमने हिंसा नहीं की थी, लेकिन अगर हमें पीटा जाएगा तो हम हाथ पर हाथ रखकर नहीं बैठेंगे। पुलिस को उसी की भाषा में जवाब देंगे।

सेना पर नहीं करते पत्थरबाजी

पुलिस पर पत्थरबाजी करने वाले दार्जिलिंग के पत्थरबाज युवक सेना पर पत्थर नहीं फेंक रहे हैं। सेना के प्रति उनके दिलों में खास जगह है और दार्जिलिंग में लगभग 90 फीसदी परिवारों में कोई ना कोई सेवारत या सेवानिवृत्त सैन्यकर्मी है। बीस वर्षीय एक युवक ने कहा कि भारतीय सेना के लिए हमारे दिलों में खास जगह है। पहाड़ों में आपको एक भी ऐसा परिवार नहीं मिलेगा, जिसमें कोई सेवारत या सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी या कर्मी ना हो।

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