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Video Icon चंदन के लिए खतरा बनते जा रहे खीरी के 'वीरप्पन'

Updated: IST DN chaudhary
2005 में डीएम कार्यालय से हुई थी शुरुआत, हर साल हजारों प्रतिबंधित पेड़ों का हो जाता है सफाया.

लखीमपुर-खीरी. लखीमपुर-खीरी जिला यानी लक्ष्मी की कृपा और खैर की बाहुल्यता का मेल। यहां देश-विदेश में विख्यात अंर्तराष्ट्रीय दुधवा पार्क स्थित है। लेकिन इस सौभाग्य के साथ-साथ कुछ दुर्भाग्य भी जुड़े हुए हैं। वह हैं माफिया और तस्कर। जानवरों की खाल, उनके अंगों व मांस के लिए यहां वन्य जीवों का शिकार किया जाता है तो वहीं नीम, चंदन जैसी बेशकीमती व प्रतिबंधित प्रजाति को भी काटने से तस्कर नहीं चूक रहे। लेकिन चंदन धीरे-धीरे तस्करों की पहली पसंद बनता जा रहा है। खीरी में कई 'वीरप्पन' पनप चुके हैं जो चंदन को कहीं से भी काट ले जाने से गुरेज नहीं करते। फिर चाहे वह जिलाधिकारी का आवास ही क्यों न हो।

वर्ष 2005-06 में चंदन के दो पेड़ जिला मुख्यालय से काटे गए थे। वह भी जिलाधिकारी के आवास से। उस समय तत्कालीन डीएम एसके त्रिपाठी के निर्देश पर मुकदमा भी दर्ज हुआ था लेकिन आज तक लकड़ी काटने वालों का पता नहीं चला। चंदन के मामले में भले ही यह एक बड़ी घटना हो मगर पेड़ कटाने के मामले में यह पहली घटना नहीं थे। हर साल लकड़कट्टे हजारों पेड़ों का सफाया कर देते हैं। पूरी-पूरी बागें उजाड़ दी जाती हैं। इस अंधाधुंध कटान ने पीपल जैसी प्रजाति का तो जैसे सफाया ही कर दिया है। 22 नवम्बर को लकड़ कट्टों ने ओयल कस्बे के मोहल्ला शिवाला से चार चंदन के पेड़ काट लिए थे। वहीं सीएमओ आवास से भी दो पेड़ चंदन तस्कर काट ले गए थे। इन मामलों की भी रिपोर्ट दर्ज की जा चुकी है मगर नतीजा कुछ भी हासिल नहीं हुआ। पिछले साल से अब तक की बात करें तो अकेले ओयल चौकी क्षेत्र में ही 29 दिसम्बर 2015 को लाल सिंह तथा स्वीकुमार शर्मा के यहां से 18 पेड़, 13 जनवरी को शिव नरेश सिंह के तीन पेड़, 23 अप्रैल को वाईडी कालेज में दो पेड़ व 4 मई को देवी मंदिर में दो पेड़ काटे गए थे। इन सभी मामलों में पुलिस को कुछ भी हाथ नहीं लगा।

कहां किसका अधिक कटान-
नीम - नीमगांव, कस्ता, सिकंद्राबाद, बेहजम
खैर - निघासन, पलिया, सिंगाही, खैरीगढ़,
आम - धौरहरा, ईसानगर, खमरिया, मोहम्मदी

अवैध कटाने के लिए उद्यान व वन विभाग भी दोषी
जिले में हो रहे अवैध कटान के उद्यान विभाग व वन विभाग भी दोषी है। कई बार लोग पैसे के लालच में लकड़कट्टों से बाग का सौदा कर देते हैं। लेकिन बिना उद्यान विभाग व वन विभाग के परमिट जारी किए यह संभव नहीं होता। लेकिन चढ़ावा चढ़ाकर यह लोग कम पेड़ों का परमिट बनवा देते हैं। जब कटान शुरू होता है तो पूरी की पूरी बागें उजाड़ दी जाती हैं। जागरुक लोग शिकायत करते हैं तो न वन विभाग के लोग पहुंचते हैं और न ही पुलिस।

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