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अधीर मन अधीरता ही देकर जाता है

Updated: IST happy kids
भोर, सांझ, बारिश, बादल, हवा सीधे दिल पर दस्तक देते हैं ठीक उसी तरह जो सीधे दिल से निकलता है

- डॉ. विमलेश शर्मा

भोर, सांझ, बारिश, बादल, हवा सीधे दिल पर दस्तक देते हैं ठीक उसी तरह जो सीधे दिल से निकलता है, अभिव्यक्त होता है, दिल तक पहुँचता भी है। वहाँ किसी कलाबाजी, गणित, सिद्धांत और प्रमेय की आवश्यकता नहीं होती.. सीधी सी बात है जी! जो सहज है वही हिट है.. यह नियम लागू कल भी था, आज भी है और कल भी रहेगा...

आत्मा निर्मोही है इसलिए बनावट को आत्मसात नहीं करती। सो दूरी बना लेना ज़रूरी होता है ऐसे वाकयों से, ऐसे व्यक्तित्व से, ऐसे लिखे से, ऐसा लिखने से और ऐसा जीने से। वस्तुतः सहजता को स्वीकार कर ही जीवन की तमाम बेतरतीबियों के बीच भी सलीके से जिया जा सकता है।

गर कोई साथी मुसलसल बँध कर चलने की बात कहे तो मान लेनी चाहिए। अधीर मन अधीरता ही देकर जाता है। तय उद्देश्य से बँधकर ही जीवन की ज्यादतियों से बचा जा सकता है। कोई आपके शब्दों को आपके कहने से पहले ही वाक्यों में बदल दे तो चीन्ह लेना चाहिए कि, किसी ने आपकी आत्मा में घुसपैठ की है।

स्मृतियों के समन्दर खारे होते हैं, उनसे जीवन की प्यास नहीं बुझती। हम स्मृतियों की उन बेलों से बचने के लिए गतिशील हो जाते हैं। लोक उसे गुण मान लेता है पर कोई सच्चा साथी, आत्मा के ही रंग का, आपको आकर कहता है कि गहरा बनने के लिए कुछ देर ठहरना होता है। जीवन से प्रेम दौड़ कर नहीं किया जा सकता। उसका रस लेने के लिए कुछ सुस्ताना होता है। कभी-कभी बहने देना होता है उस खारे समंदर को अपने भीतर से, जो स्मृतियों की रस्सी के सहारे जाने कब दबे पाँव आ बैठता है। जीवन भर स्मृतियाँ, स्मृतियों को मिटाती है। एक पल, पल में, बीते को स्मृति बना देता है। ठीक वैसे जैसे चैत्र ने इठलाए फागुन के ज्वार को उतार दिया है।

लगातार जीने को भी कुछ देर ठहरकर देखना होता है कि, दिशाएं कहीं प्रतिरोध तो नहीं कर रहीं, कि लगातार चलने से छाले तो नहीं उग आए, कि चलने में हम कुछ पीछे तो नहीं छोड़ आए।

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