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UP Election 2017

बहुगुणा परिवार के खून में है 'दगाबाजी', कांग्रेस को देते रहे हैं झटके पर झटका !

Updated: IST rita bahuguna
उत्तर प्रदेश और उत्तराखडं की सियासत में बहुगुणा परिवार की मजबूत दखलंदाजी रही है लेकिन समय-समय पर इस परिवार का कांग्रेस से मोहभंग भी हुआ है।

लखनऊ। यूपी विधानसभा 2017 से पहले कांग्रेस नेता रीता बहुगुणा के भाजपा में जाने को लेकर सियासी बाजार गर्म है। हालांकि इस बात को लेकर अभी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है लेकिन कही न कही अंदरखाने ऐसे आसार नजर आ रहे हैं।

ये कोई नई बात नहीं है जब बहुगुणा परिवार कांग्रेस से बगावत करने की तैयारी में है। इतिहास के पन्नों को पलटकर देखें तो ये साफ़ तौर पर समझ में आता है कि इस परिवार ने कई बार कांग्रेस से बगावत की है।

या यूं कहें कि कांग्रेस से बगावत बहुगुणा परिवार की फितरत में रहा है।

उत्तर प्रदेश और उत्तराखडं की सियासत में बहुगुणा परिवार की मजबूत दखलंदाजी रही है लेकिन समय-समय पर इस परिवार का कांग्रेस से मोहभंग भी हुआ है। कांग्रेस आलाकमान को झटका देने की जो परंपरा हेमवती नंदन बहुगुणा ने अपने समय से शुरू की थी। उनके बेटे और बेटी उसी राह पर चलते दिखाई दे रहे हैं। उत्तराखडं की सीएम की कुर्सी से हटाये जाने के बाद विजय बहुगुणा ने बगावती तेवर दिखाते हुए इसी साल भाजपा का दामन थाम लिया। वही रीता बहुगुणा के भी भाई के नक्शेकदम पर जाने की चर्चाएं हैं।

आपातकाल के दौरान छोड़ा था कांग्रेस का साथ

हेमवती नंदन बहुगुणा ने अपने राजनीतिक जीवन में दो बार कांग्रेस छोड़ी। हालांकि वह फिर लौटकर कांग्रेस में आ गए। आपातकाल के दौरान 1977 में हेमवती नंदन ने जगजीवन राम के साथ कांग्रेस के विरोध में एक मोर्चा बनाया जिसे कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी का नाम दिया। यह मोर्चा बहुत दिनों तक नहीं चला तो उन्होंने मोरार जी देसाई के साथ दलित किसान मजदूर संघ बनाकर राजनीति की।

वर्ष 1980 में हेमवती पौढ़ी गढ़वाल से चुनाव जीत गए थे लेकिन इंद्रा से विवाद होने पर न सिर्फ सांसदी बल्कि पार्टी भी छोड़ दी। 82 में उपचुनाव हुए तो इसी सीट पर फिर जीतकर अपनी धाक दिखाई। हेमवती की इंदिरा गाँधी ही नहीं राजीव से भी नहीं बनी।

1984 में राजीव ने इलाहाबाद से बहुगुणा के मुकाबले अमिताभ बच्चन को चुनाव लड़ाया। जिसमें हेमवती को करीब 2 लाख वोटों से हार का सामना करना पड़ा। इस हार ने उन्हें बुरी तरह तोड़ दिया। इस सदमे से वह फिर उबार नहीं पाए।

पिता के नक़्शे कदम पर विजय बहुगुणा

हेमवती बहुगुणा के पुत्र विजय बहुगुणा ने सीएम की कुर्सी जाने के बाद उत्तराखण्ड में हरीश रावत सरकार से टकराव के चलते मई 2016 में कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए। हेमवती व् उनके बेटे विजय की बगावत में बुनियादी फर्क ये है कि हेमवती ने जब-जब कांग्रेस छोड़ी उनके साथ जनसमर्थन था जो विजय बहुगुणा के कांग्रेस छोड़ते वक्त नजर नहीं आया।

अब बेटी भी भाई की राह पर

बहुगुणा परिवार की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने वाली रीता जोशी भी भाई की राह पर जाती दिख रही हैं। हालांकि रीता ने कांग्रेस छोड़ने का औपचारिक तौर पर एलान नहीं किया है लेकिन उनके भाजपा में जाने की चर्चाएं जोरों पर हैं। रीता बहुगुणा यूपी में शीला दीक्षित को सीएम पद का उम्मीदवार बनाये जाने से नाराज हैं।

सपा से लोकसभा चुनाव लड़ चुकी हैं रीता

इलाहाबाद विश्वविद्यालय में इतिहास की प्रोफ़ेसर रही डॉ. रीता बहुगुणा जोशी ने अपनी राजनीतिक पारी संयुक्त मोर्चे के झंडे तले शुरू की और इलाहाबाद की मेयर बनी। इसके बाद उन्होंने सामाजवादी पार्टी ज्वाइन कर ली। रीता ने 1991 में सुल्तानपुर लोकसभा से चुनाव लड़ा लेकिन जीत नहीं सकी .उसके बाद वह सपा छोड़ कांग्रेस में शामिल हो गयी। रीता ने इलाहाबाद से डॉ. मुरली मनोहर जोशी के खिलाफ भी चुनाव लड़ा लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा। 2007 में उन्होंने इलाहाबाद पश्चिमी क्षेत्र से विधानसभा का चुनाव लड़ा जिसमें बसपा के नन्द गोपाल नंदी से हार गयी। इसके बाद उन्होंने लखनऊ को चुनावी राजनीति का केंद्र बनाया और 2012 विधानसभा चुनाव में लखनऊ की कैंट विधानसभा क्षेत्र से विधायक चुनी गयी।

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