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'पथ का ध्येय' में झलकती है प्रबल भारतीयता की भावना, पढ़िए पुस्तक समीक्षा

Updated: IST path ka dheya
कवियत्री निर्मला सिंह ने अपने काव्य संग्रह में इसी तथ्य का ध्यान रखा है। भारतीयता के प्रति उनका प्रबल आग्रह दिखाई देता है। यह पुस्तक के शीर्षक-पथ का ध्येय से ही स्पष्ट है।

लखनऊ। काव्य के माध्यम से राष्ट्रीय व समाजिक समस्याओं पर विमर्श की परंपरा पुरानी है। इसे टुकड़े में विभाजित नहीं होना चाहिए। कवि जब भारतीय दृष्टि का चितंन करता है, तो समग्रता स्वाभाविक रुप से आ जाती है। इसके विपरीत अभारतीय मान्यता विभाजित करती है। उसका लक्ष्य दूसरा होता है।

कवियत्री निर्मला सिंह ने अपने काव्य संग्रह में इसी तथ्य का ध्यान रखा है। भारतीयता के प्रति उनका प्रबल आग्रह दिखाई देता है। यह पुस्तक के शीर्षक-पथ का ध्येय से ही स्पष्ट है। अच्छा सहित्य वही होता, जिसका ध्येय अच्छा हो तथा जिससे समाज को उचित पथ पर चलने की प्रेरणा मिले।

निर्मला सिंह संस्कृति पर जोर देती है। उनके अनुसार किसी देश के अस्तित्व की धमनियों में वहां की संस्कृति होती है। लोगों द्वारा चारितार्थ जीवन पद्धति देश अमूर्तता को मूर्तिरुप देती है। वैश्वीकरण के इस दौर में अपनी संस्कृति को संजोकर रखना, उसपर गर्व साथ अमल करने की अवश्यकता है। पाश्चात्य संस्कृति हमारे परिवेश के प्रतिकूल है। इसके प्रभाव से बचना होगा।

भूमण्डलीयकरण, बाजारवाद, आधुनिकीकरण का यह तात्पर्य नही है कि अपनी पहचान ही मिटा दे। एकल परिवार, बुजुर्गों की उपेक्षा, तकनीक को वरीयता निजी संबंधों की अवहेलना, खान-पान की पश्चिमी शैली आदि के दुष्परिणाम दिखाई देने लगे है। एक समय था जब हमारा देश विश्वगुरू था, इसे सोने की चिड़िया कहा जाता था। लोग यहां ज्ञान प्राप्त करने आते थे। आज हम पाश्चात्य संस्कृति के पीछे चले यह अनुचित है। सहित्यकारों,कलाकरों का यह कर्तव्य है कि भारतीय संस्कृति की प्रतिष्ठा बनाए रखने में कार्य करें।

पथ का ध्येय में कवियत्री पहले वन्दना करती है। यह वन्दना भारतीय संस्कृति के अनुरूप है। क्योंकि इसमें सबके कल्याण की भावना है। पर्यावरण से लेकर विश्वशांति की कामना है।
स्तुति करूं प्रकृति पर्यावरण की।
स्तुति करूं विश्वशांति की।
वन्दना करूं शारदा सरस्वती की।
वीर बालक में देशभक्ति का जज्बा है, गुदड़ी के लाल में मानवीय संवदेना है। अग्रज और अनुज में पारिवारिक रिश्तों की मर्यादा का सन्देश है।
अग्रज राम अनुज लक्ष्मण होते।
तभी संसार समर में विजयी होते

इक्कीसवी सदी में विश्वगुरू होने का भाव है। इसी क्रम में कभी न थकने का संदेश भी है। भारतीय काल गणना की वैज्ञानिकता दुर्लभ है। इस पर हमको गर्व होना चाहिए। उत्सव की भांति इसे मनाना चाहिए। कवियत्री ने नवसंवत्सर पर प्रकृति के सुन्दर दृश्य का चित्रण किया है।

देश के समक्ष आज जो समस्याऐं हैं। उन भर भी निर्मला सिंह ने लिखा है। वह आतंकवाद को वसुधैव कुटुम्बकम के विचार से समझाने का प्रयास करती है। स्वर्णकाल में वह माता-पिता के संरक्षण का स्मरण करती है।बेटा शीर्षक से तीन कविताओं में वह भारतीय संस्कृति के अनुरुप मर्यादा की प्रेरणा देती है।

सोनें की चिड़िया भारत था

प्रेरणाश्रोत गीता, रामायण
कर्म योग का नारा था

सेवा त्याग तपस्या सबकुछ।

छू मन्तर हो चला सभीकुछ।
वैश्वीकरण की आंधी में।
चिराग हो तुम स्वदेश के।

इसी के साथ कवियत्री राष्ट्रीय गौरव का भाव जगाती हैं :
भूल गए क्यों गौरव अपना।
भूल गये क्यों गाथा।
वह पर्यावरण के प्रति भी संवेदनशील है।
प्रकृति है आधार प्राणि मात्र का ।
प्रकृति परायण होइए।
प्रकृति कृति परमात्म की।

चांद और बादल में भी वह बच्चों को प्रकृति के करीब लाना चाहती है। सत्य के प्रति आग्रह व्यक्त करी है :

असत्य का सामना शक्ति से करो।
सत्य ही शास्वत है।
सत्य पर जियो।
आंसू कविता में संवेदना है विवशत बन बहत आंसू।
वह समय का महत्व समझाती है।
समय नहीं रूकता कभी।
समय को पहचानों बच्चां।

मुखौटा में दोहरे जीवन पर व्यंग है। इंसानियत की शिक्षा देती है। राखी के त्यौहार का व्यापक सामाजिक सन्दर्भ है। मन में चलने वाले द्वन्द का चित्रण मन्थन कविता में है:

आसुरी तत्व से लड़ पाये।

देवतुल्य बन जाओगो।
चाहत को भी मर्यादित रखने की सलाह देती है।
स्वनिर्मित पथ चाह हमारी।
प्र काश, मुझे कुछ चाह न होती।
मन के भटकने से रोकना चाहती है।
एक ह्दय में कितना मन है।
समझ नहीं पाती हूं।

पुरूष, नारी, व्यक्तित्व, देश, भारत मां के पत्र,दधीच से महान वृक्ष, सरदार भगत सिंह,महानता, समय का हस्तक्षेप कविताऐं प्रेरणादायक है। आत्मबल, प्रसन्नता, मेराहावी,तराजू,क्षमा मूल्यांकन, प्रभु,पथ का ध्येय,दूर का ढोल, चित्त, अन्न, कविताओं में आन्तरिक चिंतन की श्रेष्ठता का विचार है। अन्त में अपने को पहचानने का सन्देश देती है।

परमात्मा के अंश हो तुम ।

खुद को पहचानो।
इस प्रकार व्यक्ति से लेकर समाज, राष्ट्र व मानवता सभी विषयों को बखूबी समेटा गया है।

( इस लेख के माध्यम से जाने-माने समीक्षक दिलीप अग्निहोत्री ने कवियत्री निर्मला सिंह की किताब 'पथ का ध्येय' की समीक्षा की है )

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