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पिता-पुत्र में से किसे मिलेगी साइकिल, आयोग आज सुना सकता है अपना फैसला

Updated: IST akhilesh mulayam
खबरों के मुताबिक चुनाव आयोग ने मान लिया है कि समाजवादी पार्टी टूट चुकी है।

लखनऊ. समाजवादी पार्टी के साइकिल चुनाव चिन्ह को लेकर आज चुनाव आयोग फैसला दे सकता है। फैसले से ये तय हो जाएगा कि इस बार मतदाताओं को यूपी चुनाव में साइकिल पर बटन दबाने का मौका मिलेगा या नहीं। आपको बता दें कि शुक्रवार को निर्वाचन आयोग ने दोनों गुटों की सुनवाई करने के बाद साइकिल पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। वहीं सूत्रों के मुताबिक जो खबर आ रही है उसके मुताबिक साइकिल सिंबल न तो मुलायम गुट को ही मिलेगा न ही अखिलेश गुट के हिस्से में आएगा। खबरों के मुताबिक चुनाव आयोग ने मान लिया है कि समाजवादी पार्टी टूट चुकी है और उसने साइकिल सिंबल जब्त करने की तैयारी कर ली है।

ये हैं संभावनाएं

सपा और साइकिल पर अगर आयोग अगर अखिलेश खेमे का दावा मान लेता है तो मुलायम सिंह यादव के राजनीतिक जीवन के लिए ये बड़ा झटका होगा। वहीं अखिलेश यादव समाजवादी पार्टी के सबसे बड़े नेता बनकर उभरेंगे और मुलायम सिंह महज संरक्षक की भूमिका में आ जाएंगे। चुनाव में टिकट भी अखिलेश की मर्जी से दिये जाएंगे और शिवपाल यादव की पार्टी संगठन से पकड़ खत्म हो जाएगी। वहीं अगर आयोग से मुलायम को जीत मिलती है तो ये अखिलेश यादव के लिए बड़ा झटका होगा। उसके बाद उन्हें या तो वही उम्मीदवारों की पुरानी लिस्ट माननी होगी या बागी होकर अपनी अलग पार्टी और निशान के साथ चुनाव मैदान में उतरना होगा। वहीं अगर चुनाव आयोग साइकिल सिंबल को फ्रीज कर देता है तो ऐसे में अखिलेश और मुलायम दोनों खेमा अलग-अलग चुनाव चिन्ह के साथ मैदान में उतरेगा।

दोनों के दावे

आपको बता दें कि साइकिल सिंबल के लिए दोनो खेमों ने अपना-अपना दावा चुनाव आयोग में ठोंका था। मुलायाम ने साइकिल पर दावा करते हुए कहा था कि पार्टी उन्होंने बनाई है इसलिए पहला हक उनका है। वहीं अखिलेश खेमे के रामगोपाल यादव ने 6 जनवरी को सीएम अखिलेश के समर्थक नेताओं की सूची सौंपी थी। उन्होंने बताया था कि 229 में से 212 विधायकों, 68 में से 56 विधान परिषद सदस्यों और 24 में से 15 सांसदों ने अखिलेश को समर्थन देने वाले शपथ पत्र पर हस्ताक्षर किए हैं। रामगोपाल ने कहा था कि अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली पार्टी ही असली समाजवादी पार्टी है। चुनाव चिह्न साइकिल इसी खेमे को मिलनी चाहिए।

दे बार चुनाव चिन्ह हो चुके हैं फ्रीज

भारत के इतिहास में ऐसा दो बार हुआ है जब चुनाव चिन्ह पर दो गुटों में जंग हुई हो। पहला मामला 1969 का है जब कांग्रेस के चुनाव चिन्ह दो बैलों की जोड़ी पर कब्जे को लेकर इंदिरा गांधी गुट और कामराज गुट टकराया था। जिसपर चुनाव आयोग ने दो बैलों की जोड़ी चुनाव चिन्ह को जब्त कर लिया था। वहीं दूसरा मामला 1999 का है, जिसमें जनता दल के चुनाव चिन्ह चक्र पर कब्ज़े को लेकर शरद यादव और एच डी देवगौड़ा गुट टकराया था। जिसपर चुनाव आयोग ने चक्र चुनाव चिन्ह जब्त कर लिया था। ऐसा माना जा रहा है कि अगर चुनाव आयोग इस बार भी कुछ ऐसा ही फैसला सुनाता है तो साइकिल चुनाव चिन्ह भी जब्त हो जाएगा और चुनाव में मुलायम और अखिलेश दोनों खेमा नए चुनाव निशान से मैदान में उतरेंगे।अगर ऐसा हुआ तो यूपी चुनाव में मुख्य मुकाबला सपा-बसपा या सपा-भाजपा के बीच नहीं बल्कि मुलायम-अखिलेश के बीच नजर आएगा। जिसका नुकसान सपा और उसके नेताओं को उठाना पड़ सकता है।

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