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मेट्रो के लायक नहीं लखनऊ की तहजीब 

Updated: IST metro
एनपीए के डर ने वित्तीय संस्थाओं की बढ़ायी चिंता

प्रेम नारायण मिश्र
लखनऊ. मुख्यमंत्री अखिलेश यादव सरकार के ड्रीम प्रोजेक्ट लखनऊ मेट्रो को लेकर वित्त विशेषज्ञ शुरू से संशकित हैं। ज्यों-ज्यों इसके पूरे होने पर खर्च बढ़ रहा है उनकी चिंता बढ़ती जा रही है। उनकी चिंता है कि इस प्रोजेक्ट पर जितना खर्च हो रहा है उसका रिटर्न होगा या नहीं। इस प्रोजेक्ट में केन्द्र, राज्य सरकार के अलावा कई भारतीय व विदेशी वित्तीय संस्थाओं की पूंजी लगी हुई है।

जब इस प्रोजेक्ट का फाइनेंसियल क्लोजर तैयार किया जा रहा था तब फ्रांस की वित्तीय संस्थाओं ने सोशल वायबिलिटी के आधार पर अध्ययन पर जोर दिया था। जिसमें यह देखा जाता है कि मेट्रो को इस्तेमाल करने के लिए जनता कितना मानसिक रूप से तैयार है। उस दौरान तथा बाद में सार्वजनिक सम्पत्ति के इस्तेमाल के तौर तरीके तथा आंदोलन के दौरान उन्हें क्षति पहुंचाने की प्रवृत्ति उनकी सबसे बड़ी चिंता थी। दिल्ली व वाराणसी के बीच महामना एक्सप्रेस के शुरू होने के बाद उसे अगले दिन ही क्षतिग्रस्त किए जाने के चित्र वायरल होने के बाद से उनकी चिंता और बढ़ गयी है ।

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निवेशित धन की कैसे होगी वसूली

प्रदेश सरकार ने लखनऊ के अलावा कानपुर, वाराणसी सहित कई शहरों में मेट्रो शुरू करने की घोषणा की है लेकिन,जब तक लखनऊ मेट्रो के शुरू होने के बाद उसमें निवेशित धन की वसूली की संभावना नहीं होती तब तक किसी और मेट्रो प्रोजेक्ट के फाइनेंसियल क्लोजर का सवाल ही नहीं उठता है। लखनऊ मेट्रो को श्रीधरन की देखरेख में पूरा किया जा रहा है इसलिए प्रोजेक्ट की गुणवत्ता तथा समयावधि में पूरा होने के प्रति तो वित्तीय संस्थाएं आश्वस्त हैं किन्तु इनके सफल संचालन के प्रति सशंकित है। बुलंदशहर हाइवे पर सफर कर रहीं महिलाओं के साथ दुराचार घटित होने के बाद यह चिंता और बढ़ गयी है।

पूंजी निवेश के लिए लिटमस पेपर

वित्त विशेषज्ञ यह मानते हैं कि लखनऊ मेट्रो वस्तुत: यूपी में पूंजी निवेश के लिए लिटमस टेस्ट होगा जिसके आधार पर यहां पर भविष्य में निवेश करने वाले अपना निर्णय लेंगे। हालांकि लखनऊ मेट्रो से जुड़े अधिकारी इसके सफल होने के प्रति आशान्वित हैं लेकिन वे यह मानते हैं पहले चरण के सफल होने और उसके अनुभव के आधार पर लखनऊ मेट्रो के अन्य रूट पर काम आगे बढ़ेगा। सपा के मुखिया मुलायम सिंह यादव ने भी अपने पुत्र अखिलेश यादव के इस ड्रीम प्रोजेक्ट पर सवालिया निशान लगाया है उनका मानना है कि इससे कुछ बड़े लोगों को ही लाभ होगा आम जनता को इससे क्या लेना देना। उनके राजनीतिक विरोधी यह कहकर चुटकी लेते हैं कि अखिलेश यादव के इस ड्रीम प्रोजेक्ट को उनके पिता ही असफल करेंगे!

लखनऊ मेट्रो के प्रथम चरण के अंदर चारबाग से अमौसी के बीच मेट्रो सेवा अखिलेश यादव चुनाव के पहले जनता के लिए चालू होते देखना चाहते हैं किन्तु लखनऊ मेट्रो से जुड़े अधिकारी इसको लेकर सशंकित हैं उनका कहना है कि हमारी कोशिश है कि समय से इसका ट्रायल शुरू हो और तकनीकी रूप से सफल हो जाए उसके बाद संचालन व सफल होने की जिम्मेदारी उठाने वाले प्रबंधन, सरकारी तंत्र तथा जनता की परीक्षा शुरू होगी जिसके बारे में प्रदेश के लोग बेहतर जानते हैं । उसको लेकर शंका शुरू से रही है धीरे धीरे वह भी सामने आने वाला है ।

बाकी प्रोजेक्ट के लिए होगा मानक

एचडीएफसी बैंक के पूर्व अधिकारी टीएस सिंह का कहना है कि वित्तीय संस्थाओं की चिंता जायज है खासतौर पर जब से बैंकों व अन्य वित्तीय संस्थाओं का एनपीए बढ़ा और उसके बाद रिजर्व बैंक ने कड़ाई की उसके बाद से वित्तीय संस्थाओं की नीति में भी बदलाव आया है । उन्होंने कहा कि हमें वह युग भूल जाना होगा जब सरकार के इशारे पर किसी भी प्रोजेक्ट को शुरू कर दिया जाता था और जिस सरकार के इशारे पर प्रोजेक्ट शुरू होता था उसके हटते ही वह पूरी हो या न हो, चले या न चले इसकी चिंता किसी को भी नहीं थी सरकारी बैंकों को भी नहीं।

विदेशी व प्राइवेट वित्तीय संस्थाओं का नजरिया शुरू से प्रोफेशनल रहा है इसलिए लखनऊ मेट्रो प्रोजेक्ट पर सबकी नजर है। इसके प्रयोग के बाद ही यूपी में बड़े प्रोजेक्ट पर फैसला होगा। इसलिए यहां की सरकार व जनता को इसे हर हाल में सफल बनाने में मदद करना चाहिए। उनका कहना है कि यूपी बहुत बड़ा स्टेट है सैकड़ों सरकारी व गैर सरकारी कंपनियां काम कर रही हैं लेकिन यूपी के लोग बैंकों में जितना धन जमा करते हैं उसका अधिकांश भाग यहां लोन के रूप देने के बजाय दूसरे राज्यों में जाता है। इसका मतलब है कि बैंक व अन्य वित्तीय संस्थाएं यहां धन नहीं लगाना चाहती हैं इसीलिए क्योंकि यहां पर किसी प्रोजेक्ट के सफल होने की संभावना अन्य विकसित राज्यों की तुलना में कम है इसलिए उनको चिंता हो रही है।

(लेखक जनसत्ता एक्सप्रेस के पूर्व संपादक रहे हैं)

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