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कभी इन पार्टियों में भी था बल, पिछले दो चुनाव से गयी फ़िज़ा बदल

Updated: IST CPI
जब नहीं खुला खाता, तो 'एक' हुईं ये छह पार्टियां

लखनऊ। एक समय था जब वाम दलों की तूती बोलती थी लेकिन आज उनके हाल बेहाल है। वो दौर था जब यूपी में वाम दल तीसरी सबसे बड़ी ताकत थी और आज चुनाव में खाता खोलने में इनके पसीने छूट रहे हैं। पिछले दो विधानसभा चुनाव देखें तो भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) एक भी सीट अपने नाम नहीं कर पायी है। बहरहाल एक बार फिर लेफ्ट पार्टियों ने मोर्चा खोलते हुए 403 में से 140 सीटों पर मोर्चा खोला है। इसके साथ ही उन्हें ये भी उम्मीद हैं कि उस चुनाव के अन्य पार्टियां भी उन्हें एक बार फिर अपने बड़े विरोधियों के तर्ज पर आंकेगी।

इन पार्टियों के अर्श से फर्श तक के सफर में खुद पार्टियों का दोष भी कम नहीं है। राजनीतिक पंडितों का मानना है कि नब्बे की दशक में वाम दलों की जड़ें कमज़ोर हुईं। उस दौरान वाराणसी की जानी-मानी साहूपुरी फर्टिलाइजर्स और बरेली की रबर फैक्ट्री समेत प्रदेश में कई छोटी और बड़ी फैक्ट्रियां पर ताला लटक गया है। ट्रेड यूनियन आंदोलन के दौरान, प्रदेश के बड़े वाम नेता अन्य कोई कारगर मुद्दा नहीं पकड़ सके। जो इक्के दुक्के मुद्दे पकड़े भी वे जनमानस को नहीं छू सके। वहीं से वाम दलों ने राजनीति में अपना प्रभाव खोना शुरू कर दिया। उसके बाद से ये सिलसिला लगातार बना रहा है।

वहीं दोनों ही पार्टियों के वरिष्ठ नेता अपनी कमियों को छुपाते हुए ये दोष अन्य पार्टियों पर डालते हैं। कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के प्रदेश सचिव हीरालाल यादव और भाकपा के राज्य सचिव गिरीश शर्मा ने उम्मीदवारों की घोषणा के दौरान इसका जिक्र करते हुए कहा था कि जातिगत और सांप्रदायिक राजनीति ने उन्हें पीछे धकेल दिया है।

अपने खोये वजूद और प्रतिष्ठा को तालाशते हुए इस चुनाव में प्रदेश के छह वामदलों ने हाथ मिलाकर एक साथ लड़ने का फैसला किया है।

आंकड़ें - सीपीआई और सीपीएम को कब कितनी मिलीं सीटें

1957 में 9

1962 में14

1967 में14

1969 में 81

1974 में 18

1977 में 10

1980 में 7

1985 में 8

1989 में 8

1991 में 5

1993 में 4

1996 में 5

2002 में 2

2007 और 2012 में 0

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