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सिनेमा हॉल में आखिर कैसे अमल में लाया जाएगा सुप्रीम कोर्ट का आदेश ?

Updated: IST National Anthem Cinema
क्या वाकई संभव हो पाएगा मनोरंजन के साथ राष्ट्रगान? क्या कहता है मुस्लिम मन?

मधुकर मिश्र.
लखनऊ. राष्ट्रगान के सम्मान को लेकर पहली बार मुद्दा तब गरमाया था जब मुंबई के एक सिनेमा हॉल में मुस्लिम परिवार राष्ट्रगान के दौरान उसके सम्मान में नहीं खड़ा हुआ और वहां पर मौजूद लोगों ने उनके इस व्यवहार का विरोध करते हुए उन्हें सिनेमा हाल से बाहर निकलने के लिए मजबूर कर दिया था। कुछ ऐसा ही वाकया भोजपुरी फिल्म की एक नायिका के साथ हुआ था। अब जबकि सुप्रीमकोर्ट ने इस बाबत अहम फैसला सुनाते हुए देश के सभी सिनेमाघर में फिल्म शुरू होने से पहले राष्ट्रगान बजाए जाने और उसके सम्मान में सभी लोगों को खड़े होने का नियम बना तो दिया है, लेकिन विभिन्न वर्गों और समुदायों से अलग-अलग प्रतिक्रिया देखने को मिल रही हैं। कुछ इसमें तकनीकी कमियों को लेकर तो कुछ इसे सिर्फ सिनेमा हॉल में ही लागू किए जाने को लेकर सवाल उठा रहे हैं। एमआईएम के मुखिया असदुद्दीन ओवैसी अदालती आदेश का तो स्वागत कर रहे हैं, लेकिन इसके जरिए लोगों में राष्ट्रभक्ति बढ़ेगी, इस बात को लेकर उन्हेंसंशय है। वहीं भाजपा नेता इसे ऐतिहासिक फैसला बताते हुए भरोसा जता रहे हैं कि इसके सकारात्मक परिणाम सामने आएंगे।

भाजपा के मंसूबों पर क्यों उठे सवाल

महिला अधिकारों को लेकर लड़ाई लड़ने वाली ऐक्टविस्ट नाइस हसन को सुप्रीम कोर्ट द्वारा सिनेमा हॉल में किसी फिल्म के पहले राष्ट्रगान चलाए जाने और उसके सम्मान में खड़े होने की बात कतई रास नहीं आई। नाइस के मुताबिक जिस देश में महिलाओं के अधिकार और उनके सम्मान सिर्फ कागजी बातें हों और आज भी जब महिलाएं अपनी आजादी के लिए संघर्ष कर रही हों वहां इस तरह के आदेश से क्या होगा। साथ ही वह सवाल उठाती हैं कि ऐसा आदेश सिर्फ सिनेमा हॉल के लिए ही क्यों दिया गया, क्या अन्य स्थानों पर राष्ट्रगान के सम्मान की जरूरत नहीं है? नाईस के मुताबिक भाजपा सरकार बार-बार हमसे राष्ट्रप्रेम को लेकर सबूत मांग रही है और वहीं सुप्रीम कोर्ट उस पर अपनी मुहर लगा रहा है। उन्हें वह अदालती आदेश भी नागवार गुजरता है, जिसमें हिंदुत्व को धर्म नहीं बल्कि जीवनशैली बताया गया है।

इन्हें रास आया फैसला-

नाइस हसन के विचारों के विपरीत इस फैसले पर खुशी जताने वालो की भी कमी नहीं है। लखनऊ के नॉवेल्टी सिनेमा हाल में अपने परिवार संग फिल्म का आनंद लेने पहुंची तंजीम को सुप्रीम कोर्ट के आदेश में कोई बुराई नजर नहीं आती। तंजीम के मुताबिक जब हम ढाई घंटे की मूवी देख सकते हैं तो उससे पहले अपने देश के प्रति प्रेम प्रकट करने के लिए दो मिनट सावधान की मुद्रा में क्यों नहीं खड़े हो सकते हैं? कुछ ऐसा ही मानना है सेंट जोसेफ कैथेड्रल के प्रीस्ट इलियास रोड्रिग्स का भी। प्रीस्ट सुप्रीम कोर्ट के फैसले को सही दिशा में उठाया गया कदम बताते हैं। उनके अनुसार स्कूल में तो हम पहले से ही राष्ट्रगान के जरिए बच्चों को राष्ट्रभक्ति का पाठ पढ़ाते रहे हैं। बच्चे असेंबली के अंत में इसका गान आज भी करते हैं। अब सिनेमा हॉल में भी जब बच्चा अपने अभिभावकों के साथ फिल्म शुरू होने से पहले सम्मानपूर्वक इसे गाएगा तो निश्चित रूप से उसे देशभक्ति का भान होगा। वह अपने देश के प्रति और उन शहीदों के प्रति आदर व्यक्त करेगा जिनके जरिए हमें आजादी मिली। प्रीस्ट इलियास के मुताबिक इस नियम को न सिर्फ सिनेमा हॉल में बल्कि दूसरे संस्थानों में भी लागू करवाया जाना चाहिए।

10 दिनों के भीतर आदेश होना है लागू

अदालत के इस आदेश को देश के सभी सिनेमा हॉल में 10 दिन के भीतर लागू किया जाना है। खबर लिखे जाने तक लखनऊ के तमाम सिनेमा हॉलों में यह नियम लागू नहीं हो पाया था। लखनऊ सिनेमा मैनेजर एसोसिएशन के अध्यक्ष राजेश टंडन के मुताबिक यह कोई पहली बार नहीं है जब सिनेमा हॉल में राष्ट्रगान होगा। तकरीबन 30 साल पहले भी सिनेमा हॉल में राष्ट्रगान बजाया जाता था। उस समय राष्ट्रगान फिल्म शुरू होने से पहले नहीं बल्कि फिल्म खत्म होने के बाद बजता था। जिसमें अक्सर कुछ लोग उसके सम्मान में खड़े नहीं होते थे तो कुछ आधे में ही छोड़कर बाहर निकल जाते थे। नतीजतन, यह परम्परा कायम नहीं रह पाई और इसे बंद कर दिया गया। राजेश टंडन के मुताबिक अब चूंकि सिनेमा जगत भी डिजिटल हो गया है ऐसे में राष्ट्रगान का नियम लागू करने से पहले हमें कुछ तकनीकी पहलुओं पर ध्यान देना होगा। मसलन सैटेलाइट के जरिए डाउनलोड होने वाली फिल्म की क्वालिटी बहुत ज्यादा अच्छी नहीं होती है। ऐसे में हम उसे हार्डडिस्क में लोड करके प्रोजेक्टर के जरिए चलाते हैं। जैसे ही हमें राष्ट्रगान उपलब्ध हो जाएगा, हम इस आदेश को अमल में ला देंगे। राजेश टंडन सिनेमा हॉल में आने वाले सभीदर्शकों से भी इस नियम को सफल बनाने की अपील करते हैं।

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