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Patrika Exclusive: योगी सरकार का चिकित्सकों को तोहफा, डेढ़ गुना तक बढ़ेगा मेडिकल शिक्षकों का वेतन

Updated: IST medical
मेडिकल कालेजों में शिक्षकों की कमी से मान्यता का संकट, बचाव के लिए चिकित्सा शिक्षा विभाग का प्रस्ताव

डॉ. संजीव

लखनऊ. उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार चिकित्सकों को बड़ा तोहफा देने जा रही है। जल्द ही मेडिकल कालेजों के शिक्षकों का वेतन डेढ़ गुना तक बढ़ाया जाएगा। दरअसल मेडिकल कालेजों में शिक्षकों की जबर्दस्त कमी से मौजूदा मेडिकल कालेजों की मान्यता पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। योगी सरकार को अपने कल्याण संकल्प पत्र पर अमल के लिए 25 नए मेडिकल कालेज खोलने हैं। ऐसे में पुराने कालेजों की मान्यता बचाने और नए खोलने का पथ प्रशस्त करने के लिए चिकित्सा शिक्षा विभाग ने वेतन वृद्धि का प्रस्ताव किया है।

प्रदेश के मेडिकल कालेजों में शिक्षकों की कमी दूर करने के लिए संविदा पर शिक्षक रखने की पहल की गयी थी। दुर्भाग्यपूर्ण पहलू यह रहा कि अब संविदा के चिकित्सा शिक्षक भी यहां रुकने को तैयार नहीं हैं। इसके पीछे प्रदेश के चिकित्सा शिक्षकों को मिलने वाला कम वेतन मूल वजह माना जा रहा है। यहां संविदा पर तैनात प्रोफेसर को 90 हजार रुपये मिलते हैं, वहीं उत्तराखंड में 1 लाख 95 हजार रुपये महीने तक मिलते हैं। इसी तरह एसोसिएट प्रोफेसर को उत्तर प्रदेश में 80 हजार वहीं उत्तराखंड में 1 लाख 66 हजार रुपये तक मिलते हैं। कमोवेश इसी तरह का वेतन ढांचा देश के अन्य प्रदेशों में है। इस बीच प्राइवेट प्रैक्टिस पर सख्ती के बाद क्लीनिकल विशिष्टताओं में तो शिक्षकों की बेहद कमी पड़ गयी है। प्रदेश सरकार नए कालेज चलाने का वादा कर रही है, यहां पुरानों की मान्यता खतरे में है। इससे बचने के लिए ही चिकित्सा शिक्षा विभाग ने प्रदेश में भी वेतन ढांचे में बदलाव का प्रस्ताव किया है। इसमें संविदा पर तैनाती की स्थिति में वेतन मौजूदा की तुलना में डेढ़ गुना तक करने की बात कही गयी है। शासन स्तर पर इस मामले में सहमति बन गयी है और जल्द ही इस पर अमल हो जाएगा। विभाागीय अधिकारियों को उम्मीद है कि इस फैसले के बाद चिकित्सकों को मेडिकल कालेजों में रोकना संभव होगा और नए मेडिकल कालेज खोलने की राह भी आसान हो जाएगी। चिकित्सा शिक्षा महानिदेशक डॉ.वीएन त्रिपाठी भी शिक्षकों की कमी को स्वीकारते हैं। उनका कहना है कि शासन इस दिशा में सकारात्मक ढंग से सोच रहा है। शिक्षकों के अभाव में भारतीय चिकित्सा परिषद (एमसीआई) के मानकों के अनुरूप मेडिकल कालेजों का संचालन कठिन हो जाता है। इसीलिए देश के प्रमुख राज्यों में शिक्षकों को मिलने वाले वेतन का आंकलन कर तदनुरूप वेतन वृद्धि का प्रस्ताव किया गया है।

14 सरकारी मेडिकल कालेज

प्रदेश में इस समय दो चिकित्सा विश्वविद्यालयों सहित 14 सरकारी मेडिकल कालेज संचालित हो रहे हैं। वर्ष 1911 में खुला लखनऊ का किंग जार्ज मेडिकल कालेज सरकारी क्षेत्र का पहला मेडिकल कालेज था तो 1947 में आगरा, 1956 में कानपुर, 1961 में इलाहाबाद, 1966 में मेरठ, 1968 में झांसी और 1972 में गोरखपुर के बाद 2006 में सैफई के ग्रामीण आयुर्विज्ञान संस्थान के रूप में मेडिकल कालेज की शुरुआत हुई थी। इसके बाद 2011 में अंबेडकर नगर, 2012 में कन्नौज, 2013 में जालौन व आजमगढ़, 2015 में सहारनपुर और 2016 में बांदा में 14वां मेडिकल कालेज खुला। इनमें से किंग जार्ज मेडिकल कालेज व सैफई के ग्रामीण आयुर्विज्ञान संस्थान को चिकित्सा विश्वविद्यालय का दर्जा दिया जा चुका है।

दस नए कालेजों पर काम

प्रदेश में इस समय दस नए सरकारी मेडिकल कालेज खोले जाने की प्रक्रिया विभिन्न स्तरों पर लंबित है। बदायूं, जौनपुर व चंदौली में निर्माण कार्य की शुरुआत पिछली सरकार के कार्यकाल में हुई थी। फैजाबाद, बस्ती, शाहजहांपुर, फीरोजाबाद व बहराइच में केंद्र सरकार की मदद से मेडिकल कालेज शुरू करने के प्रस्तावों को मंजूरी मिल चुकी है। अब केंद्र व राज्य में भाजपा की ही सरकार होने से इनका काम तेज होने की उम्मीद है। इनके अलावा नोएडा के बाल चिकित्सालय को मेडिकल कालेज में बदलने व राजधानी लखनऊ के राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान को पूर्ण मेडिकल कालेज के रूप में शुरू करने की तैयारी है। इन दस मेडिकल कालेजों के मूर्त रूप लेने से प्रदेश में सरकारी मेडिकल कालेजों की संख्या 24 हो जाएगी।

25 मेडिकल कालेजों का वादा

प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बन गयी है। चुनाव से पहले जारी कल्याण संकल्प पत्र में भाजपा ने 25 नए मेडिकल कालेज खोलने का वादा किया था। चुनाव जीतने के बाद पार्टी के सामने संकल्प पत्र में किये वादे पूरे करने की चुनौती है। स्वयं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने चिकित्सा शिक्षा मंत्री आशुतोष टंडन को नए कालेज खोलने की मॉनीटरिंग करने को कहा है। इन कालेजों के साथ सुपर स्पेशलिटी अस्पताल खोलने का वादा भी किया गया है। इन्हें खोलने के लिए भी चिकित्सा शिक्षकों की जरूरत पड़ेगी। ऐसे में मौजूदा कालेजों में ही शिक्षकों की कमी देखते हुए नए कालेज खोलने में समस्या आ सकती है। इससे बचने के लिए ही चिकित्सा शिक्षा विभाग ने वेतन वृद्धि का प्रस्ताव किया है।

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