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बसपा-सपा के लिए निकाय चुनाव भी विधानसभा चुनाव से कम नहीं

Updated: IST akhilesh mayawati
वोट की खातिर निकाय चुनाव में दौड़ेगा 'हाथी' और चलेगी 'साइकिल'

लखनऊ। 2017 के विधानसभा चुनाव के नतीजों ने अब सपा और बसपा की ज़मीन हिला दी है। निकाय चुनावों को नज़रअंदाज़ करते हुए चुनाव चिन्ह पर प्रत्याशियों को लड़ाने से बचने वाली ये दोनों ही पार्टियां अपना मन बदल चुकी हैं। सपा और बसपा पहली बार यूपी में शहरी निकाय चुनावों में सियासी पारियां खलेंगी। मकसद साफ़ है, अपने बचे जनाधार को खिसकने से रोकना। यूं कहें तो सभी बड़े राजनीतिक दल इस निकाय चुनाव में होंगे वो भी अपने चुनाव निशान के साथ। इससे ये निकाय चुनाव भी किसी विधानसभा चुनाव से कम नहीं होगा।

सपा इससे पहले निकाय चुनाव साइकिल सिंबल पर लड़ चुकी है। बसपा पहली बार आधिकारिक तौर पर निकाय चुनाव में अपने सिंबल पर प्रत्याशी उतरेगी। सपा ने 2007 निकाय चुनाव सिंबल पर लड़ा लेकिन 2012 में पूर्ण बहुमत से सत्ता में आने के बाद सपा ने निकाय चुनाव सिंबल पर नहीं लड़ा। अच्छे प्रदर्शन के बाद भी निकाय चुनाव में साइकिल के न उतरने से सपा समर्थकों में नाराज़गी भी देखने को मिली थी।

मौजूदा समय में 12 नगर निगमों में 10 पर भाजपा का कब्ज़ा है। 2007 में बसपा भी पूर्ण बहुमत से सत्ता में आई लेकिन निकाय चुनाव में निराशा ही हाथ लगी। अब विधानसभा चुनाव में सपा और बसपा की स्थिति पहले के मुकाबले काफी कमज़ोर दिखी। दोनों के पाले में ऐतिहासिक हार दिखी, खासकर बसपा। बसपा एक एमएलसी तक सदन में चुनकर भेजने की स्थिति में नहीं है।

भाजपा ने पहुंचाया था नुकसान

भाजपा ने बसपा के दलित वोटों में जमकर सेंध लगाई है। साथ ही सपा के फ्लोटिंग वोट भी भाजपा के पाले में गिरे। बीएसपी ने 22.2% और सपा ने 21.8% वोट शेयर हासिल किया। पिछले 15 साल से यूपी में सत्ता से बाहर रहने के बाद भी शहरी निकाय में भाजपा का बोल बाला कम नहीं हुआ था। नगर निगमों में भाजपा का लगातार दबदबा बना रहा। पिछली बार पार्टी ने पंचायत चुनाव भी सक्रियता से लड़ा था।

जबकि बसपा और सपा के सामने इस बार सिंबल पर प्रत्याशियों को उतारना ज़रूरी था। भाजपा और कांग्रेस दोनों ही पार्टियों ने अपने प्रत्याशी सिम्बोल पर उतारे थे और इस बार अगर बसपा सपा प्रत्याशी न उतारते तो दोनों ही पार्टियों के बचे वोटरों को बाँध के रखने मुश्किल हो जाता। दोनों ही पार्टियों की चिंता पार्टी के साथ मजबूती से खड़े रहे इन वोटरों को जोड़े रखने की है।

ये चुनाव सपा और बसपा के लिए करने या मरने जैसा भी है क्यूंकि अगर फ्लोटिंग वोट का रुख भाजपा और कांग्रेस की ओर जाता तो आगामी 2019 लोकसभा चुनावों में खामियाज़ा उठाना पड़ता।

समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष नरेश उत्तम ने कहा की पदाधिकारियों की बैठक के बाद राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के निर्देश पर सिंबल पर चुनाव लड़ने का फैसला ले लिया गया है।

जबकि बसपा राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने कहा की शहरी निकायों का चुनाव भी पार्टी लड़ेगी और जनता के सहयोग से अच्छा रिजल्ट दिखाएगी।

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