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सपा संग्राम : कार्यकर्ता असमंजस में और मतदाता कन्फ्यूज

Updated: IST samajwadi party
वर्चस्व की जंग में थमा सपा का चुनाव प्रचार, मुलायम-अखिलेश के पास सिर्फ दो विकल्प...

हरिओम द्विवेदी
लखनऊ. उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव की तारीखों का एलान हो चुका है। उंगलियों पर गिनने को दिन बचे हैं। सभी पार्टियां तैयार हैं, लेकिन सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी परिवार की लड़ाई में उलझी है। सपा का चुनाव प्रचार ठप है। कार्यकर्ता असमंजस में हैं और मतदाता कन्फ्यूज। न पार्टी का नाम क्लियर है और न चुनाव चिह्न। आखिर किसके नाम पर और किस चुनाव निशान पर वोट मांगें।

इस खींचतान में सपा का चुनाव प्रचार कार्यक्रम लगभग बंद है। कार्यकर्ता खुद को समाजवादी तो कह रहे हैं पर कौन से गुट से हैं और क्या चुनाव निशान है, जनता के इस सवाल पर वह मौन हो जाते हैं। बालागंज, लखनऊ के रहने वाले सुरेश यादव समाजवादी पार्टी के सक्रिय कार्यकर्ता हैं। लेकिन इन दिनों थोड़ा बेबस दिखते हैं। उन्होंने कहा कि चुनाव चिह्न मिलते ही वह वह पूरे दम खम से चुनाव प्रचार करेंगे।

हरदोई के सभासद रह चुके अमित त्रिवेदी यह जरूर मानते हैं कि चुनाव चिह्न न मिलने से थोड़ी दिक्कत तो है। लेकिन चुनाव प्रचार थमा है, ऐसा वह कतई नहीं मानते। उन्होंने कहा कि चुनाव चिह्न मिलते ही इसे चौबीस घंटों में वायरल कर देंगे। कैसे? पूछने पर उन्होंने कहा कि हमारी पूरी टीम सोशल मीडिया पर सक्रिय है, जिसकी सहायता से अपने मतदाताओं तक तुरंत पहुंच जाएंगे।

समाजवादी पार्टी अखिलेश और मुलायम खेमे में बंटती दिख रही है। इस स्थिति में मतदाताओं से अभी क्या कह रहे हैं? इस सवाल पर उन्होंने कहा कि हमारे लिए चुनाव निशान नहीं, हमारे नेता का नाम ही काफी है। उन्होंने कहा कि हम अखिलेश यादव और नरेश अग्रवाल के काम के आधार पर ही वोट मांग रहे हैं।

ये हरदोई शहर की बात है, लेकिन जिन विधानसभा क्षेत्रों में ज्यादातर गांव हैं, वहां स्थिति कुछ और है। हरदोई की बेनीगंज विधानसभा क्षेत्र के सपा कार्यकर्ता रमन कुमार कहते हैं कि अगर चुनाव चिह्न साइकिल न मिला तो गांव-गांव मतदाताओं तक चुनाव चिह्न पहुंचाना बड़ा टास्क होगा। लेकिन कर लेंगे।

अखिलेश-मुलायम के पास दो विकल्प
मामला चुनाव आयोग में पहुंचने के बाद अब दोनों खेमों के पास सिर्फ दो ही विकल्प हैं। पहला विकल्प है कि दोनों में कोई एक गुट दूसरे का समर्थन करे और चुनाव चिह्न पर दावेदारी छोड़ दें। ऐसे में एक गुट को साइकिल सिंबल मिल सकता है। दूसरा विकल्प है कि साइकिल चुनाव चिह्न फ्रीज हो जाए। ऐसी स्थिति में चुनाव आयोग दोनों गुटों को नया चुनाव चिह्न लेने को कहे।

अब अखिलेश क्या करेंगे
अगर मुलायम सिंह यादव का समाजवादी पार्टी और चुनाव चिह्न पर दावा सही साबित हो जाता है तो ये मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के बड़ा झटका होगा। ऐसे में मुख्यमंत्री अखिलेश के पास भी दो ही विकल्प होंगे। या तो वे अपने पिता और चाचा की सहमति से सही उम्मीदवारों का चयन करें या फिर अलग पार्टी बनाएं। हालात जैसे हैं माना जा रहा है कि अखिलेश अलग पार्टी वाला ही रास्ता चुनेंगे।

...तो खत्म हो जाएगा मुलायम का करियर
चुनाव आयोग अगर सपा के चुनाव चिह्न और पार्टी पर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का दावा मान लेता है तो मुलायम के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं होगा। इस फैसले के बाद अखिलेश सबसे बड़े नेता बनकर उभरेंगे और मुलायम को संरक्षरक बनाया जाएगा। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस स्थिति में यह मान लिया जाना चाहिए कि मुलायम का राजनीति कर करियर पर विराम लग गया।

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