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यूपी के मतदाता खामोश, राजनीतिक पार्टियां बेचैन

Updated: IST all political parties leaders from uttar pradesh
बहुजन समाज पार्टी जाति, धर्म और क्षेत्रीयता का मुद्दा उठाकर मतदाताओं को रिझाने में जुटी है। लेकिन, मायावती को मुस्लिम और दलित के गठजोड़ का कोई सकारात्मक असर अभी देखने को नहीं मिल रहा।

महेंद्र प्रताप सिंह
लखनऊ. उत्तर प्रदेश विधान सभा के चुनाव नजदीक हैं। सभी पार्टियों को इंतजार है चुनाव आयोग की तिथियों की घोषणा का। लेकिन, अभी तक मतदाताओं का रुख भांप पाने में सभी पार्टियां विफल रही हैं। किस दल के पक्ष में माहौल बन रहा है, इसका भी अंदाजा लगाना टेढ़ी खीर हैं। ऐसा पहली बार है कि मतदाता खामोश हैं। उनकी चुप्पी पार्टियों को बेचैन किए है। पिछले पांच सालों का आंकड़ा बताता है कि देश के विभिन्न राज्यों में मतदाताओं ने किसी एक पार्टी को ही सरकार बनाने का मौका दिया है। या फिर चुनाव पूर्व हुए गठबंधन को जनादेश मिला है। यानी मतदाता तो यह चाहता है कि किसी एक विचाराधारा या पार्टी को स्पष्ट जनादेश मिले। ताकि विकास कार्य हो सकें। लेकिन उत्तर प्रदेश में क्या होगा इसकी भनक तक नहीं लग पा रही।

पिछले एक दो माह से देश के सबसे बड़े राजनीतिक घराने यानी मुलायम सिंह यादव के कुनबे में छिड़ी विरासत की जंग को लेकर देशभर में चर्चा थी। लग रहा था, परिवार की लड़ाई उस मोड़ पर पहुंच गई है जहां से अखिलेश और शिवपाल के रास्ते अलग हो जाएंगे। लेकिन, ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। पारिवारिक क्लेश की वजह से पार्टी का ख़ात्मा मान रहे लोगों और पार्टियों को निराश होना पड़ा। अब फिर सपा अपने जनाधार को मजबूत करने में जुट गई है। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव विकास कार्यों का खाका खींच रहे हैं। बहुजन समाज पार्टी जाति, धर्म और क्षेत्रीयता का मुद्दा उठाकर मतदाताओं को रिझाने में जुटी है। लेकिन, मायावती को मुस्लिम और दलित के गठजोड़ का कोई सकारात्मक असर अभी देखने को नहीं मिल रहा। मायावती के परंपरागत वोटर भले ही बसपा के साथ हों, लेकिन मुसलमानों का मानस बसपा के साथ जाने के लिए तैयार हो गया है इसका कहीं से कोई संकेत देखने को नहीं मिल रहा। सतीश मिश्रा का सवर्ण जोड़ो अभियान इस बार क्या रंग दिखाएगा इसकी भी कोई खास चर्चा नहीं हो रही।

भारतीय जनता पार्टी पाकिस्तान के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक और अब नोट बंदी के मुद्दे को छेंडक़र मतदाताओं को रिझाने की कोशिश में हैं। लेकिन, बैंकों में लगने वाली लंबी लाइनों ने मतदाताओं को खुश करने के बजाय नाराज कर दिया है। उधर, कांग्रेस की यात्राओं का जोश भी ठंडा पड़ गया है। कुल मिलाकर मतदाताओं का मूड भांपना अभी आसान नहीं है।

खंडित जनादेश का अंदेशा कम
अभी कुछ माह पहले तक यूपी का राजनीतिक माहौल ऐसा बना था कि लोग कहने लगे थे कि कहीं जनता खंडित जनादेश न दे। राहुल की किसान यात्रा, मायावती की धुंंवाधार रैली और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के तूफानी दौरों ने राजनीतिक माहौल बना दिया था। अखिलेश यादव की विकास पुरूष की छवि इन सब पर भारी पड़ रही थी। कुल मिलाकर तीनों पार्टिंयां मजबूती से चुनावी दंगल में दमखम के साथ खड़ी थीं। तब ऐसा लग रहा था कि कहीं ऐसा न हो कि तीनों दलों को बराबर मत मिलें। लेकिन अब माहौल बदल चुका है।मतदाताओं की खामोशी बता रही है कि चुनाव के नज़दीक आते ही ये किसी पार्टी को बहुमत के करीब ले जाएगी। इसलिए अब खंडित जनादेश का भ्रम भी टूटता नजर आ रहा है।

अभी नहीं मिला मुद्दा
यूपी का संग्राम इसलिए भी बहुत कठिन है कि अभी तक मतदाता यह तय नहीं कर पा रहा है कि वह किस मुद्दे पर पार्टियों के पक्ष में लामबंद हो। भाजपा, बसपा और कांग्रेस अभी तक कोई ठोस मुद्दा पेश नहीं कर पाए हैं। रही बात समाजवादी पार्टी की तो वह जातिगत, धर्मगत और क्षेत्रवाद के नाम पर वोट मांगने के बजाय इस बार विकास को अपना मुद्दा बनाए है। लेकिन चीजें इतनी जटिल हैं कि वोटर भ्रमित है। भाजपा की सर्जिकल स्ट्राइक और नोटबंदी के मुद्दे भी कुछ खास नहीं कर पा रहे। मायावती की जातीय राजनीति भी कोई असर नहीं दिखा पा रही।

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