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Video Icon आदर्श गांव में बने शौचालयों का हैरान करने वाला सच आया सामने

Updated: IST Tiolet
पड़ताल में नजर आई स्वच्छ भारतमिशन के घोटाले की तस्वीर.

महोबा.महोबा का सांसद आदर्श गांव पिपरामाफ यूँ तो तमाम मुलभूत सुविधाओं से अछूता है, मगर यहाँ भारत स्वच्छता मिशन के तहत बनाये गए शौचालय विकास में घोटाले की इबारत लिख रहे हैं। गांव में बने अधिकतर शौचालय अधूरे बने हुए है और जो बन चुके हैं वो अभी से टूटने भी लगे हैं। जिस गांव में विकास के मानक पर अधिकारियों की निगाहे होनी चाहिए जब वहां ऐसा हाल है तो फिर जनपद के अन्य गांवों में बने शौचालय की तस्वीर का आप आसानी से आंकलन कर सकते हैं।

बुंदेलखंड की अपनी बदकिस्मती है कि सरकार किसी की भी हो, यहाँ सिर्फ खाना पूर्ति ही होती है। खासकर महोबा जनपद जहाँ विकास के नाम पर भ्रष्टाचार चरम पर है। खैर हम बात कर रहे है महोबा के उस गांव की जिसे आदर्श गांव कहा जाता है।बीजेपी सांसद पुष्पेंद्र सिंह चंदेल ने इस गांव को गोद लिया मगर इसकी बदहाल तस्वीर नहीं बदली। यहाँ आने वाली योजनाएं कागजों पर पूरी हो रही है और जमीनी हकीकत अधूरी है। गांव में भारत स्वच्छता मिशन के तहत लगभग 547 शौचालय स्वीकृत हुए थे। एक शौचालय की कीमत 12 हजार रुपये है। लाखों रुपये की लागत से गांव में शौचालय कागजों में बनकर तैयार है। मगर जब इस गांव का हमने जायजा लिया तो अधिकतर शौचालय न केवल अधूरे मिले बल्कि मानक के विपरीत बने शौचालय अभी से टूटने भी लगे।

आदर्श गांव बनने के बाद से अधिकारीयों की निगाहे इस गांव में जरूर पड़ी तो वहीँ शासन ने भी गांव में विकास कार्य कराये जाने के आदेश दिए मगर जिम्मेदारों की लापरवाही विकास में रोड़ा बन गई है। ऐसे तो पिपरामाफ गांव में खास विकास नहीं हुआ है और जो हुआ है वो आधे अधूरे हैं। गांव में अधबने शौचालय ग्रामीणों के जख्मों पर नमक छिड़कने का काम कर रहे हैं।वृद्ध हो चुकी गुलाब रानी की माने तो उसके घर पर भी सरकारी शौचालय बनाया गया था। मगर इस शौचालय में चार दीवार उठा दी गई। एक पतली सी लोहे की चादर लगा दी गई, लेकिन उसमें लेटरिंग सीट तक नहीं लगाई। वहीँ जो गड्ढा किया गया उसका भी सही निर्माण नहीं कराया गया जिससे आये दिन उसे पालतू जानवर गिरकर घायल हो रहे थे। कई बार ग्राम प्रधान से कहा मगर उसने काम कराने से ही मना कर दिया। वो खेतों में शौच के लिए जाती है तो दबंग उसके साथ बदसलूकी करते हैं।

अधूरे बने शौचालय को ग्रामीण स्टोररूम के तरह इस्तेमाल कर रहे है। कही ईंधन तो कही घरेलु सामान इन शौचालय में रखा हुआ है। गांव में रहने वाले RTI कार्यकर्त्ता जनक सिंह परिहार बताते है कि उनके गांव के साथ सौतेला व्यवहार हो रहा। हमारा गांव आदर्श गांव है, मगर हमें इसका लाभ नहीं मिल रहा। गांव में 547 शौचालय कागजों में बन चुके है जबकि सिर्फ पचास फीसदी ही शौचालय बने है उनमे भी आधे अधूरे पड़े हुए हैं। सरकार प्रचार प्रसार में लाखों रुपये खर्च कर रही है, लेकिन जमीनी काम नहीं हो रहे। ये सांसद आदर्श गांव नहीं बल्कि अभिशाप आदर्श गांव है !

पढ़ने वाली छात्राएं हो या गांव की बहुये हो, इन्हें शौचालयें में हुई गड़बड़ी रास नहीं आ रही है। जागरूक हो चुकी महिलाये सरकार से शौचलय निर्माण को पूरा करने की मांग कर रही है। वो कहती है कि उन्हें घर से बाहर शौच जाने में बड़ी शर्मिदगी उठानी पड़ती है। वहीँ हमेशा डर भी बना रहता है।

ग्रामीणों ने कई बार जिम्मेदार अधिकारीयों को लिखित शिकायत दी, मगर जब हमाम में सब नंगे हो तो फिर कौन जाँच करे और कार्यवाही किस पर हो ये बड़ा सवाल है।

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