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रामपुर की सियासी लड़ाई में नवाबी खानदान भी कूदा, आ रही है नई पीढ़ी

Updated: IST AZAm khan and abdullah
सियासी लड़ाई से ज्यादा चर्चित है नवाबी नेताओं की लड़ाई

जय प्रकाश, रामपुर। उत्तर प्रदेश में चुनाव का बिगुल बजने के साथ ही सियासी दल जहां एक ओर प्रत्याशी घोषित कर जीत की रणनीति बनाने में जुटे हैं। वहीं इस बार वेस्ट यूपी के सबसे महत्वपूर्ण जिले रामपुर में इस बार चुनाव कुछ अलग होने जा रहा है। दरअसल पांच विधानसभाओं वाले इस जिले में इस बार कद्दावर मुस्लिम नेता और कैबिनेट मंत्री आजम खान की प्रतिष्ठा दांव पर लग गयी है। क्योंकि इस बार उनका बेटा अब्दुल्ला आजम भी स्वार विधानसभा से अपना सियासी सफर शुरू करने जा रहा है। उसके बाद मुकाबला नवाब खानदान के नवाब काजिम अली खान उर्फ नावेद मियां मैदान में हैं। जो पिछले बीस साल से इस सीट पर काबिज हैं। इसलिए सियासी दलों से ज्यादा रामपुर की जनता इन दो परिवारों के भविष्य का फैसला भी करने जा रही है।

रामपुर में नगर विधानसभा के साथ ही बिलासपुर, चमरौया, मिलक और स्वारटांडा शामिल है। वेस्ट यूपी के अन्य इलाकों की तरह ही यहां भी लगभग मुस्लिम सभी सीटों पर निर्णयाक भूमिका में हैं। दलित गठजोड़ से बसपा से उम्मीद बनती है। वहीं भाजपा ने अभी अपने उम्मीदवार नहीं उतारे हैं। इसलिए 2017 के नए चेहरे कौन कौन होंगे, ये कहना जल्दबाजी होगा। फिर सपा में हुई फूट का असर आजम खान पर भी पड़ा है और इसे वो जाहिर कर चुके हैं। सबसे ज्यादा चुनौती उन्हें अपने बेटे को जिताने की है। वहीं फिजा कोई ओर बहे लेकिन आजम खान को शहर विधानसभा से कोई नहीं डिगा पाया और वे पिछले सात बार से एमएलए हैं।

अगर पिछले चुनाव की बात की जाए तो 2012 में सपा और कांग्रेस को दो-दो सीटें मिली थी। जबकि बसपा को एक, वहीं इस बार कांग्रेस से विधायक नावेद मियां भी इस बार बसपा से किस्मत आजमा रहे हैं। तो कांग्रेस पर एक ही विधायक संजय कपूर बिलासपुर से बचे हैं। जबकि भाजपा अपना खाता नहीं खोल पायी थी।

2012 के मुकाबले परिस्थितियां बदल चुकी हैं। इलाके की सुगबुगाहट के साथ ही बदलाव के संकेत जताए जा रहे हैं। इस बार कम से कम दो सीटों पर भाजपा की जीत की बात कही जा रही है। रामपुर की पहचान की बात की जाए तो ये किसी की मोहताज नहीं है। अपनी सांस्कृतिक विरासत के साथ ही एशिया की सबसे बड़ी लाइब्रेरी रजा लाइब्रेरी, सबसे पुराना आकाशवाणी रेडियो स्टेशन समेत कई प्रकार के छोटे बड़े उद्योग धंधे इसकी प्रमुख पहचान है।

फिलहाल सपा की कलह की आंच से आजम खान अपने और अपने परिवार को कैसे बचाएंगे। ये देखना दिलचस्प होगा, साथ ही 2014 से भाजपा लगातार आक्रामक प्रचार में जुटी है और इस बार भले ही उसके प्रत्याशी सामने नहीं आए लेकिन लड़ाई में वो भी कम नहीं है। अब देखना होगा की रामपुर की जनता अपनी परम्परा को कायम रखती है या फिर बदलाव स्वीकार करती हैं।

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