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UP Election 2017

सपा-बसपा प्रत्‍याशी पहुंचा सकते हैंं भाजपा को फायदा  

Updated: IST UP election 2017 date
ग्राउंड रिपोर्ट- शुरू से ही विवादों से घिरा रहा है सपा विधायक का कार्यकाल

जय प्रकाश, मुरादाबाद। दुनिया में पीतल नगरी के नाम से मशहूर मुरादाबाद जनपद का अपना राजनीतिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्त्व रहा है। कारोबार के जरिये दुनिया में अपने हुनर का डंका बजाने वाले इस शहर को आज भी सोने की चमक लिए पीतल की वजह से जाना जाता है। मशहूर शायर जिगर मुरादाबादी से लेकर आजादी की लड़ाई लड़ने वाले मज्जू खां हो या फिर सूफी अम्बा प्रसाद से लेकर वर्तमान में अंतरराष्‍ट्रीय क्रिकेट में धाक जमाने वाले पीयूष चावला, हर किसी को इस शहर की जमींं ने भरपूर प्यार दिया है। मुगल सम्राट शाहजहांं के बेटे मुराद के नाम पर रामगंगा नदी किनारे बसाए इस शहर को रामगंगा नदी की रेत ने वो कारोबारी नुख्सा दिया, जिसके चलते शहर अपना रास्ता बनाता चला गया।

विधानसभा चुनाव के रण के लिए पीतल नगरी एक बार फिर तैयार होने लगी है। वर्तमान में छ विधानसभा सीटेंं जनपद के खाते में हैंं। 2012 के विधानसभा चुनाव में मुरादाबाद की छ में से चार सीटों पर सपा ने कब्जा जमाया था, जबकि भाजपा और पीस पार्टी के खाते में एक-एक सीट आई थी। बदलते हालातोंं के बाद ठाकुरद्वारा सीट भी सपा के खाते में जुड़ गई और पीस पार्टी के विजयी विधायक अब 2017 के लिए सपा के उम्मीदवार घोषित हो चुके हैंं। आइये सबसे पहले आपका परिचय कराते है मुरादाबाद शहर विधानसभा सीट से-

नहीं दिखता कोई विकास

2012 में सपा के टिकट पर चुनाव जीतने वाले हाजी यूूसुुफ अंसारी विकास के बड़े-बड़े दावे करते हैंं लेकिन हकीकत इसके एकदम उलट नजर आती है। विधायक हाजी युसूफ अंसारी का कार्यकाल शुरू से ही विवादों से भरा रहा है। विधायक के विकास कार्योंं से ज्यादा चर्चा उन पर लगने वाले आरोपोंं की होती है। जमीन कब्जाने मदरसे की जमीन को फर्जी तरीके से बेचने, राशन डीलरो से अवैध वसूली करने और अपराधियो को राजनीतिक संरक्षण देने के आरोप विधायक पर लगते रहेे हैंं। विधायक रहते हुए हाजी यूूसुुफ पर जहां राशन डीलरोंं से वसूली का आरोप लगा है, वहींं उनके भाई के खिलाफ वसूली करने के तहत मुकदमा भी दर्ज किया गया। एक मदरसे की जमीन को बेचने के आरोप के बाद लोगोंं ने कुछ महीने पहले उनके कार्यालय में जमकर तोड़फोड़ भी की थी। मुरादाबाद नगर विधानसभा सीट की जनता विधायक हाजी युसूफ को लेकर ज्यादा उत्साहित नहींं है।

बसपा से भी मुस्‍लिम प्रत्‍याशी
वहीं, बसपा से अतीक सैफी चेहरा हैंं। जबकि सपा में टकराव के बाद मौजूदा विधायक हाजी युसूफ अंसारी और पूर्व मेयर हुमायूंं कदीर ताल ठोंक रहे हैं, जबकि भाजपा से किसी वैश्य कैंडिडेट को टिकट मिलने की सम्भावना है। उधर, कांग्रेस भी गठबंधन में उलझी है। जल्द ही सभी पार्टियों के चेहरे आने के बाद शहर में चुनावी संग्राम तेज हो जाएगा।

शाहजहां के बेटे के नाम पर बसा मुरादाबाद
रामगंगा नदी के किनारे मुगल सम्राट शाहजहांं के बेटे मुराद के नाम पर बसाए गए मुरादाबाद शहर का लंंबा अतीत रहा है। सांंप्रदायिकता के लिहाज से अत्यंत सवेदनशील जनपदों में एक मुरादाबाद जनपद ने समय-समय पर गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल भी पेश की है। रामगंगा के किनारे की रेत ने मुरादाबाद को पीतल का हस्तशिल्प तोहफे में दिया तो रातो रात इस शहर की तकदीर बदल गई। देखते ही देखते हर साल 5500 करोड़ोंं से ज्यादा का विदेशी व्यापर इस शहर से दुनिया में होने लगा। बदलते वक्त के साथ राजनीतिक और सामाजिक उपेक्षा के चलते लाखों कारीगर इस उद्योग को छोड़ गए और बद से बदतर होते कारोबार को अब अपना अस्तित्व बचाने के लिए जूझना पड़ रहा है। बिजली की समस्या ने जहां हस्तशिल्प उद्योग की कमर तोड़ दी, वहींं पीतल की सिल्‍लियोंं की कीमतों ने भी जमकर कारीगरों पर कहर बरपाया है। एक तरफ घरेलू मोर्चे पर मुसीबत दूसरी तरफ दुनिया के बाजारों में मिलती प्रतिस्पर्धा ने इसकी जड़ेंं हिला दी। उद्योग को छोड़ने का दर्द आज भी कारीगरों की आंंखेंं नम कर जाता है, लेकिन उससे ज्यादा दर्द उस बेवफाई का है, जो राजनीतिक दलोंं के सियासी महारथियों ने अपने दावों में दिया है।

इतिहास
मुरादाबाद विधानसभा सीट 1957 में अस्तित्व में आई और उसके बाद इस सीट पर कभी भी किसी दल का एकाधिकार कभी नहींं रहा। अस्तित्व में आने के बाद से कांग्रेस इस सीट पर अन्य दलोंं को टक्कर देती रही लेकिन 1989 और 1991 के विधानसभा चुनाव में जनता दल ने इस सीट पर कब्जा जमा लिया। अयोध्या में विवादित ढांचा विध्वंस के बाद तेजी से बदले राजनीतिक समीकरणों ने 1993 में ये सीट भाजपा के हवाले कर दी और पार्टी के विधायक सन्दीप अग्रवाल 1996 और 2002 में भी विधानसभा पहुंचे। 2007 के विधानसभा चुनाव आने तक इस सीट को अपनी मजबूत सीट बताने वाली भाजपा को जनता के बजाय सन्दीप अग्रवाल से ही झटका मिला और संंदीप पार्टी का साथ छोड़कर सपा के टिकट पर चुनाव लड़ने मैदान में उतरे। 2007 में संदीप साइकिल पर सवार होकर विधानसभा पहुंचेे। सपा की सरकार रहते हुए सन्दीप अग्रवाल भी 2012 आते-आते पार्टी को विदा कहकर अमर सिंह और जयाप्रदा द्वारा बनाए गए दल में शामिल हो गए। 2012 के चुनाव में जनता ने संंदीप अग्रवाल की नाराजगी को दरकिनार करते हुए सीट लगातार दूसरी दफा सपा के खाते में डाल दी। इस दफा सपा के टिकट पर चुनाव मैदान में उतरे हाजी युसूफ अंसारी ने बाजी मारी।

मतदाता
वर्तमान में लगभग साढ़े चार लाख मतदाताओं वाली इस विधानसभा सीट पर हिन्दू-मुस्लिम आबादी समान है। कुल मतदाताओं में 34 अन्य मतदाता भी शामिल हैंं। पिछले परिसीमन के अनुसार शहर का कांठ रोड से लगा हिस्सा देहात विधानसभा सीट का हिस्सा बन गया, जिसके बाद मुस्लिम मतदाताओंं की तादाद इस सीट पर बढ़ी है। मुस्लिम आबादी के साथ ही राजनीतिक दलोंं की नजर इस सीट पर मौजूद 80 हजार से ज्यादा अनुसूचित जाति के मतदाताओं पर भी है। लिहाजा सपा और बसपा मुस्लिम-दलित गठजोड़ कर सीट अपनी झोली में डालना चाहते हैंं, वहींं भाजपा ज्यादा मुस्लिम उम्मीदवारों के मैदान में होकर आपस में लड़ने और वोटों के बंटवारे पर नजरें टिकाए हुए है।
मुद्दे
- पीतल मजदूरों की बदहाली
- शहर में लगने वाला भयंकर जाम
- गोविंदनगर ओवरब्रिज
- बिजली की अघोषित कटौती
- पीतल की भट्टियों से निकलता धुआंं और उससे होने वाली बीमारियोंं से भी दस्तकार जूझ रहा है
- बरसात के मौसम में जलभराव
- खराब सड़कें
- सरकारी अस्पतालों की दुर्दशा
- छात्र-छात्राओ के लिए सरकारी विश्वविद्यालय का ना होना

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