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पहाडग़ढ़ के जंगलों में हैं ऐसे भित्तिचित्र जिन्हें देखकर आप रह जाएंगे दंग

Updated: IST Scrivener
आदि मानवों ने बनाए भित्तिचित्र, अब तक सलामतपहाडग़ढ़ के घने जंगल में आसन नदी के किनारे प्राकृतिक कंदराओं में हैं गेरू व खडिय़ा के मिश्रण के दुर्लभ चित्र

रवींद्र सिंह कुशवाह

मुरैना. पुरा संपदा के मामले में समृद्ध जिले में आदिमानवीय सभ्यता के प्रमाण भी मौजूद हैं। गेरू व खडिय़ा के समिश्रण से आदि मानवों द्वारा बनाए गए भित्तिचित्र हजारों साल बाद भी अपनी कहानी खुद कह रहे हैं। लिखीछाज के यह दुर्लभ भित्तिचित्र आर्कियोलॉजीकल सर्वे ऑफ इंडिया के अध्ययन में 10 हजार साल पुराने बताए गए हैं। एक मान्यता इनके २५ हजार साल पुराने होने की भी है। इनका अस्तित्व बचाए रखने के लिए पुरातत्व विभाग इंटेक (इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज) की मदद लेने की कोशिश कर रहा है।

पहाडग़ढ़ के दुर्गम जंगल में आसन नदी के तेज बहाव में पत्थरों के कटने से बनी कंदराओं में गेरू व खडिय़ा के मिश्रण से आदि मानवों द्वारा ऐसे भित्तिचित्र बनाए गए कि 10 हजार साल बाद भी वे वैसे ही बने हुए हैं। लोग इन्हें देखना चाहते हैं, लेकिन वहां तक पहुंचने के लिए सुगम रास्ता न होने से सैलानी उनका दीदार करने नहीं पहुंच पा रहे हैं। जिला मुख्यालय से 80 किमी दूर पहाडग़ढ़ के जंगलों में स्थित यह दुर्लभ भित्तिचित्र भीम बैठका के समकालीन माने जाते हैं। इन भित्तिचित्रों के पुरातात्विक महत्व से अनजान चरवाहे नुकसान पहुंचा रहे हैं। पुरातात्विक महत्व के लिखीछाज तक पर्यटकों की पहुंच आसान करने के लिए यहां सड़क निर्माण का मुद्दा 29 जनवरी को सीएम के समक्ष उठ चुका है। इसके बाद प्रशासन ने सड़क निर्माण की कवायद प्रारंभ कर दी है।

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इंटेक सहेजगा दुर्लभ चित्रकला को

पुरातत्व विभाग इन भित्तिचित्रों के वास्तविक स्वरूप पर रंग को सहेजने के लिए इंटेक (इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज) मदद लेगा। इसके लिए प्रस्ताव इंटेक को भेजा जा चुका है। हालांकि वहां से अब तक कोई जवाब नहीं आया है।

सब कुछ प्राकृतिक है लिखीछाज में

लिखीछाज का नामकरण उसके शाब्दिक अर्थ से ही माना जाता है। नदी के बहाव से पत्थर की चट्टानें कटने से कंदरा बन गई है। उसके अंदर ही आदि मानवों ने भित्तिचित्रों की रचना की है। १० हजार साल बाद भी यह भित्तिचित्र बचे हुए हैं।

कथन

लिखीछाज के भित्तिचित्रों को आदिकालीन माना जाता है। अध्ययन में यह प्रारंभिक तौर पर 10 हजार साल पुरानेे माने जा रहे हैं। रास्ता न होने से उचित संरक्षण में दिक्कत आ रही है। इनका मूल स्वरूप बनाए रखने के लिए इंटेक को पत्र भेजा जा चुका है।

अशोक शर्मा, जिला पुरातत्व अधिकारी

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