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एक संत की वाणी का ऐसा जुनून कि 250 गांव के ढाई लाख लोगों ने  छोड़ दी  शराब

Updated: IST morena
नशे के साथ कारोबार से भी बनाई दूरी, ठेकेदारों को दुकान भी नहीं दे रहे किराए पर

मुरैना. दो माह से कम समय में 250 गांव के ढाई लाख से ज्यादा लोग शराबबंदी का निर्णय ले चुके हैं। 300 के करीब गांवों के लोगों ने भी शराबंदी के लिए मन बना लिया है। पंचायतों और महापंचायतों के माध्यम से शुरू हुआ संकल्प का यह सिलसिला अब पूरी तरह से जन आंदोलन में परिवर्तित हो चुका है। यह आंदोलन मप्र के अलावा राजस्थान एवं उत्तरप्रदेश में भी अपनी जड़ें जमा चुका है। चंबल तट पर घास-फूस की झोंपड़ी मेें रहकर भक्ति में लीन रहने वाले संत हरिगिरि की प्रेरणा से चार मार्च 2017 को जिले के 11 पढ़े-लिखे युवाओं ने इसकी पहल की थी। त्रेतायुगीन शनि मंदिर से शुरू हुई यह यात्रा दो दिन में तकरीबन 80 किमी का सफर तय कर बाबा के आश्रम पर संपन्न हुई। इसमें संत समाज ने भी बढ़-चढ़कर मार्गदर्शन किया। यहां के बाद छोटी-छोटी पंचायतों से माहौल तैयार किए गए।

सहमति और विरोध के मिले-जुले प्रयासों में शराबबंदी के प्रयासों को बड़ी सफलता 25 मार्च को सिद्ध स्थल जोधाबाबा सरकार मंदिर पर हुई महापंचायत से मिली। यहां आधा सैकड़ा से अधिक गांवों के लोगों ने महापंचायत में सामूहिक रूप से शराब के नशे और कारोबार से तौबा करने का संकल्प लिया। इसे बाद 15 अप्रैल को करहधाम और 20 अप्रैल को ग्वालियर के गिरगांव महादेव मंदिर पर हजारों की संख्या में लोग सामूहिक संकल्प ले चुके हैं।

उत्तरप्रदेश, मप्र एवं राजस्थान से रोज बड़ी संख्या में लोग शराबबंदी की पंचायत एवं महापंचायत के लिए संत हरिगिरि के आश्रम में पहुंच रहे हैं। बाबा हरिगिरि कहते हैं कि इस अभियान का कुछ राजनीतिक लोग श्रेय लूटने का प्रयास कर रहे हैं। एक सप्ताह पूर्व करह आश्रम पर हुई महापंचायत वाले दिन वे इसे लेकर अपनी नाराजी खुलकर जाहिर कर चुके हैं। लेकिन अब लोग ऐसे प्रयासों में से बाज नहीं आ रहे हैं।

आधा दर्जन दुकानों को नहीं मिली जगह

शराब कारोबार के नए ठेके एक अप्रैल से प्रभावी हो चुके हैं। लेकिन शराबबंदी अभियान का ही यह परिणाम है कि सरायछौला, नूराबाद में शराब दुकानों को जगह नहीं मिल रही है। इनसे अटैच दुकानों को भी जगह नहीं मिल रही है। सरायछौला के अलावा नहर के पास भी एक दुकान का संचालन होता था।

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