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आधे चुनाव के बीच उठ रहे सवाल, किस तरफ जा रहा उत्तर प्रदेश

Updated: IST election 2017
यूपी की राजनीति पर एक नजर...

अमित शर्मा, नई दिल्ली/नोएडा। यूपी में अब तक हुए दोनों चरणों में अपेक्षाकृत तेज मतदान दर्ज किया गया है. पहले चरण में 64.22 फीसदी और दूसरे चरण में 65.5 फीसदी मतदान यूपी के चुनावी इतिहास के लिहाज से बहुत बेहतर कहा जा रहा है. लेकिन यह किसके पक्ष में जा रहा है, यह बता पाने की स्थिति में कोई नहीं है.

सामान्य रूप से किसी भी चुनाव में अपेक्षाकृत तेज मतदान को एंटी इनकमबेंसी से जोड़कर देखा जाता रहा है. माना जाता है कि सरकार और सत्ताधारी पार्टी से नाराज जनता सरकार के खिलाफ अपना गुस्सा तेज मतदान के रूप में निकालती है. लेकिन इसे किसी सामान्य सिद्धांत की तरह नहीं देखा जा सकता. भारत में अनेक ऐसे अवसर आए हैं जब जनता ने सत्ताधारी पार्टी को ही और अधिक तेज मतों से विजयी बनाया है. इसका उदाहरण गुजरात, मध्यप्रदेश से लेकर तमिलनाडु तक कहीं भी देखा जा सकता है. लेकिन यूपी के सन्दर्भ में ये तेज मतदान किस रुख को दिखता है, इस पर अभी भी स्थिति साफ नहीं हुई है.

इस समय यूपी के तीनों दावेदार लगभग एक जैसी स्थिति में बताए जा रहे हैं. कोई भी चुनावी पण्डित अभी भी किसी पार्टी को एक तरफा जीत या हार की स्थिति में बता पाने की स्थिति में नहीं है. सत्ताधारी दल समाजवादी पार्टी की स्थिति बिलकुल यु-टर्न लेने वाली रही है. बदायूं रेप और हत्याकांड, बुलन्दशहर सामूहिक दुष्कर्म काण्ड, मुजफ्फरनगर सांप्रदायिक दंगे, जगेंद्र सिंह पत्रकार को जलाकर मार देने की वीभत्स घटना और जवाहर बाग में शिवपाल के संरक्षण में एक अपराधी के द्वारा पार्क को कब्जा कराना और उसे मुक्त कराने में लगभग तीस लोगों की मौत के मामलों से सपा सरकार पूरी तरह बैकफुट पर थी.

माना जा रहा था कि सपा यह चुनाव भारी अंतर से हारेगी. लेकिन मुलायम सिंह, अखिलेश और शिवपाल के बीच उत्पन्न हुए घटनाक्रम ने अखिलेश को एक नई ऊंचाई दी. भाजपा और बसपा के इन आरोपों के बावजूद कि 'यह मुलायम परिवार का अंदरूनी नाटक है जिसका उद्देश्य अखिलेश की छवि चमकाना था', सच्चाई यह है कि इस घटनाक्रम के बाद अखिलेश की छवि में सुधार हुआ है. उनके साथ कांग्रेस के आ जाने के बाद सपा की स्थिति और मजबूत हुई है. इतना ही नहीं, चुनाव प्रचार के दौरान अखिलेश और राहुल की रैलियों को जनता की तरफ से जबरदस्त रेस्पॉन्स मिला है. दोनों युवा नेताओं ने मोदी को भाषण कला में भी तगड़ा मुकाबला दिया है. राहुल-अखिलेश यह सन्देश देने में कामयाब हुए हैं कि वे एक विश्वसनीय चेहरे के रूप में सामने हैं. मतों के रूप में यह जनसमर्थन कितना जमीनी हकीकत में तब्दील हो पाती है, यह बात तो चुनाव परिणाम ही बताएंगे, लेकिन फिलहाल की स्थिति में एक बात तो साफ हुई है कि अखिलेश के खिलाफ एंटी इनकमबेंसी का फैक्टर बहुत ज्यादा दिखाई नहीं पड़ता.

भाजपा इस मोर्चे पर सबसे आगे दिखाई दे रही थी, सर्जिकल स्ट्राइक के बाद तो बीजेपी की स्थिति अजेय सी बन गयी थी और यह माना जा रहा था कि यूपी में इस बार बीजेपी का वनवास खत्म हो जाएगा. लेकिन नोटबन्दी के बाद उसकी स्थिति में जबरदस्त सेंध लगी है. आज उसे सरकार बनाने तो छोड़िये, पहले स्थान पर रहने वाली पार्टी के रूप में बताने वालों की भी कमी है. मोदी जैसा स्टार प्रचारक होने के बावजूद बहुत मजबूती के साथ कोई यह कह पाने की स्थिति में नहीं है कि जनता इस बार जो तेज मतदान कर रही है, वह मोदी के पक्ष में जा रहा है.

2012 के विधानसभा चुनाव में लगभग 15 प्रतिशत वोट पाने वाली भाजपा लोकसभा चुनाव में 42 प्रतिशत से भी अधिक वोट शेयर पाने में कामयाब रही थी. सीधे रूप से इसका सेहरा मोदी के सर बन्धा था. लेकिन अब जब कि विधानसभा चुनाव में भी मतदान में तेजी देखि जा रही है, खुद भाजपा भी इसे बहुत मजबूती से अपने पक्ष में बताने की स्थिति में नहीं है. अमित शाह पहले के दो चरणों में बीजेपी को नब्बे सीटों के दावे जरूर करें लेकिन कई ऐसे मुद्दे हैं जिसकी वजह से बीजेपी को इस रेस में अब पीछे माना जाने लगा है. पहली बात तो मोदी के पक्ष में आज की तारीख में वह आकर्षण नहीं बचा है जो कभी हुआ करता था. इसके आलावा केंद्र सरकार की कुछ नीतियों को विपक्ष यह बताने में सफल रहा है कि यह मोदी के कारण हुआ है और अगर ऐसा नहीं होता तो जनता को तकलीफ नहीं होती.

नोटबन्दी इसी तरह का फैसला है. इसके अलावा बीजेपी के टिकट बांटने में मूल कार्यकर्ताओं की उपेक्षा और बाहर से आये लोगों को मिली तरजीह से भाजपा की छवि बहुत खराब हुई है. माना जा रहा है कि टिकट न पाने वाले कार्यकर्ता पार्टी के खिलाफ मतदान करा सकते हैं. इसके अलावा पार्टी की सबसे बड़ी कमी चेहरे की रही है. अखिलेश और मायावती की तुलना में उसके पास यूपी में कोई चेहरा नहीं है. जाहिर है कि इससे बीजेपी को नुक्सान होता हुआ दिख रहा है.

इस चुनाव में सबसे अलग बसपा नजर आ रही है. सिर्फ मायावती के नाम पर अपना सबकुछ दांव पर लगाने वाला जाटव समाज आज भी उनके साथ पूरी मजबूती के साथ खड़ा है. वहीं 99 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट देकर उन्होंने अपने दलित-मुस्लिम समीकरण का आजमाया हुआ दांव चला है. मायावती का यह तुरुप का पत्ता अब भी काम करेगा या नहीं, यह अवश्य देखने वाली बात होगी. अभी तक मुस्लिम वोटों के बारे में जो बात देखने में आयी है वह यही है कि मुस्लिम मतदाता सपा और बसपा के बीच बंटे हुए हैं. अगर ऐसा हुआ है तो जाहिर है कि बसपा को भी तेज मतदान का एकतरफा फायदा नहीं मिलने जा रहा है.

वहीं मायावती के साथ एक और बात है जो उन्हें नुकसान पहुंचा सकती है वह ये है कि गैर जाटव समाज में बीजेपी की सेंध लगाने की मुहीम कुछ हद तक ही सही कामयाब हुई है. प्रजापति, खटीक, कुम्हार और सैनी जैसी अनेक जातियों ने बसपा के बाहर अपना विकल्प देखने की कोशिश की है. भाजपा ने इसके लिए पहले तो इन समाजों से नेताओं को नेतृत्व की मुख्यधारा में लाया, बाद में उन्हें चुनाव भी लड़वाया. बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य को पिछड़ों के कोटे से इसी सोच के तहत सामने लाया गया है. अगर भाजपा की यह नीति कामयाब हुई है तो इसका नुक्सान सपा-बसपा दोनों को होने वाला है. फिलहाल इन आंकलनों पर जनता की अंतिम मुहर 11 मार्च को ही लगेगी जब मतगणना होगी.

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