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बदले-बदले हैं किसानों के तेवर व मांग

Updated: IST opinion news
पिछले कुछ समय से देश के विभिन्न राज्यों में किसान अपनी मांगों को लेकर आंदोलनरत हैं। आजादी के 70 साल बाद भी देश का अन्नदाता शोषित और गरीब ही है। सरकारी घोषणाओं और चुनावी वादों से हर बार ठगा गया किसान क्या ..

योगेन्द्र यादव राजनीतिक विश्लेषक

पिछले कुछ समय से देश के विभिन्न राज्यों में किसान अपनी मांगों को लेकर आंदोलनरत हैं। आजादी के 70 साल बाद भी देश का अन्नदाता शोषित और गरीब ही है। सरकारी घोषणाओं और चुनावी वादों से हर बार ठगा गया किसान क्या आंदोलन द्वारा अपने व अपने परिवार के लिए सम्मानजनक जीवन सुरिक्षत कर पाएगा..?

देश का किसान आंदोलन एक नए युग में प्रवेश कर रहा है। पिछले दिनों देश के विभिन्न हिस्सों में हुए किसान आंदोलनों ने किसानों में नई ऊर्जा भरी है, नया नेतृत्व सामने आया है और नया संकल्प जुड़ा है। लेकिन उससे भी महत्वपूर्ण है किसान आंदोलन का बदलता स्वरूप। वर्तमान मेें किसान की परिभाषा बदल रही है, किसान नेतृत्व की पृष्ठभूमि बदल रही है, किसान आंदोलन के मुद्दे बदल रहे हैं और वैचारिक सरोकार भी बदल रहे हैं।

अभी यह बदलाव बारीक महसूस हो सकता है लेकिन भविष्य में किसान आंदोलन के चरित्र में यह बदलाव किसानों की दशा और दिशा बदलने वाला साबित हो सकता है। आज का किसान आंदोलन आजादी के पहले और अस्सी के दशक के आंदोलनों से बहुत अलग है। अंग्रेजीराज के दौरान हुए किसान विद्रोह मूलत: औपनिवेशिक राज द्वारा स्थापित शोषक कृषि व्यवस्था के विरुद्ध थे। मोपला विद्रोह, चम्पारण सत्याग्रह, बारदोली सत्याग्रह और तेभागा आंदोलन जैसे किसान आंदोलनों ने कृषि व्यवस्था के सबसे शोषित वर्ग के न्यूनतम अधिकार की आवाज उठाई।

अन्यायपूर्ण लगान, नील की बंधुआ किसानी और बटाईदार को फसल का कम से कम एक तिहाई हिस्सा देने की मांग पर चल रहे आंदोलनों ने किसान को एक राजनीतिक पहचान दी। आजादी के बाद पहले चालीस साल तक किसानों ने स्वराज में न्याय मिलने का इंतजार किया। उसके बाद कर्नाटक में ननजुन्दमस्वामी, महाराष्ट्र में शरद जोशी और उत्तर प्रदेश में महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में किसान आंदोलनों का एक नया दौर शुरू हुआ। यह मजबूत भूस्वामियों का आंदोलन था। इन आंदोलनों का मुख्य मुद्दा था किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी।

इस आंदोलन का नेतृत्व वह वर्ग कर रहा था जिसे राजनीतिक सत्ता में हिस्सा मिला लेकिन जो किसान होने के नाते आर्थिक समृद्धि से वंचित था। इक्कीसवीं सदी के किसान आंदोलनों में किसान की परिभाषा का विस्तार हो रहा है। इस नई परिभाषा में किसान का अर्थ सिर्फ बड़ा भूस्वामी ही नहीं बल्कि मंझोला और छोटा किसान भी है, ठेके पर किसानी करने वाला बटाईदार और खेतिहर मजदूर भी है।

जमीन जोतने वाले के साथ पशुपालन, मुर्गीपालन और मछली पालन करने वाले को भी किसान के दायरे में शामिल किया गया है। यह पहली बार है जब देश आदिवासी और दलित को किसान के रूप में स्वीकार करने को तैयार है। किसान की परिभाषा का यह विस्तार जरूरी था। हैरत की बात है कि खेती में दो तिहाई मेहनत करने वाली औरतों को अब तक किसान की परिभाषा से बाहर रखा गया है।

जैसे-जैसे किसानी सिकुड़ रही है वैसे-वैसे किसानी के किसी एक हिस्से को लेकर आंदोलन चलाना असम्भव होता जा रहा है। हर स्तर के किसान को जोड़कर ही नया किसान आंदोलन ऊर्जा प्राप्त कर सकता है। नए युग के नए किसान आंदोलनों के वैचारिक सरोकार और मुद्दे भी पुन:परिभाषित हो रहे हैं। मेरा मानना है कि आजादी के बाद के किसान आंदोलन द्वैतवादी थे-एक तरफ भारत बनाम इंडिया का जुमला था तो दूसरी तरफ जमींदार बनाम खेतिहर मजदूर का संघर्ष था। नया किसान आंदोलन अद्वैतवादी है। किसानों के भीतर ऊंच-नीच का वर्ग संघर्ष जगाने की बजाय सभी किसानों को जोडऩे का आग्रह इस दौर की विशेषता है। साथ ही किसान बनाम गैर किसान की लड़ाई से बचने की समझ भी विकसित हो रही है। खेती-किसानी को बचाने की लड़ाई प्रकृति को बचाने की लड़ाई है जिसमें किसान और गैर किसान को एकजुट होना होगा। बीसवीं सदी की वैचारिक जकडऩ से मुक्त होकर किसान स्वराज के नए विचार की ओर बढ़ रहे हैं।

यह वैचारिक परिवर्तन इस आन्दोलन की मांग में भी दिखाई देता है। पहली नजर में कर्जमुक्ति और फसलों के पूरे दाम की मांग में कुछ भी नया नहीं लगेगा। लेकिन आज इन पुरानी मांगों को नए तरीके से निरूपित किया जा रहा है। फसल के पूरे दाम का मतलब अब केवल सरकारी न्यूनतम समर्थन मूल्य में बढ़ोतरी से ही नहीं है।

किसान आंदोलनों ने सीख लिया है कि यह मांग बहुत सीमित है और इसका फायदा दस प्रतिशत किसानों को भी नहीं मिलता इसलिए किसान चाहते हैं कि फसल की लागत का हिसाब बेहतर पद्धति से किया जाय, इस लागत पर कम से कम पचास प्रतिशत बचत सुनिश्चित की जाए। साथ ही किसानों ने यह भी समझ लिया है कि असली मामला सिर्फ सरकारी घोषणा का नहीं है, असली चुनौती तो यह है कि सरकारी समर्थन मूल्य सभी किसानों को कैसे मिले।

इसीलिए नए किसान आंदोलनों की मांग है कि सरकारी खरीद के अलावा भी नए तरीके खोजें जाएं जिससे सभी किसानों को घोषित मूल्य हासिल हो सके। ठीक इसी तरह कर्जमाफी की पुरानी मांग का विस्तार कर उसे कर्जमुक्ति की मांग में बदल दिया गया है। सिर्फ राष्ट्रीयकृत बैंक, सहकारी और ग्रामीण बैंकों के कर्ज से ही नहीं साहूकार के कर्ज से मुक्ति की मांग भी अब इसमें जुड़ गई है। अब किसान आंदोलन याचक की तरह कर्जमाफी की प्रार्थना नहीं कर रहा। आज का किसान आंदोलन देश को पिछले सत्तर साल से दिए अनुदान के बदले कर्जमुक्ति के अधिकार की बात कर रहा है।

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