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निकले ठोस समाधान

Updated: IST opinion news
पश्चिम बंगाल के सभी स्कूलों में बांग्ला भाषा की अनिवार्य रूप से पढ़ाई के फैसले ने प्रसिद्ध पर्यटन स्थल दार्जिलिंग में टकराव के हालात पैदा कर दिए हैं

कश्मीर घाटी में अशांति की आग बुझने से पहले दार्जिलिंग के पहाड़ों का सुलगना देश के लिए शुभ संकेत नहीं है। पश्चिम बंगाल सरकार के एक फैसले ने पिछले एक सप्ताह से अधिक समय से पर्यटन के लिए प्रसिद्ध दार्जिलिंग को युद्ध के मैदान में तब्दील कर दिया है।

राज्य के सभी स्कूलों में बांग्ला भाषा की अनिवार्य रूप से पढ़ाई के फैसले ने वहां टकराव के हालात पैदा कर दिए हैं। गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (जीजेएम) की अगुवाई में इलाके के सभी राजनीतिक दल राज्य सरकार के खिलाफ हिंसक विरोध पर उतर आए हैं। बांग्ला भाषा के विरोध के साथ-साथ मोर्चा ने पृथक गोरखालैंड की अपनी पुरानी मांग को भी आंदोलन से जोड़ दिया है। लगभग तीन दशक पहले सुभाष घीसिंग के नेतृत्व में अलग गोरखालैंड की मांग को लेकर बड़ा आंदोलन चलाया गया था।

उस उग्र आंदोलन के बाद स्थानीय लोगों को अलग राज्य तो नहीं मिला लेकिन दार्जिलिंग पर्वतीय परिषद का गठन करके उन्हें आंशिक स्वायत्तता देने का प्रयास किया गया। परिषद के बाद गोरखालैंड क्षेत्रीय प्रशासन की स्थापना हुई। प्रत्यक्ष चुनाव के माध्यम से इसके प्रतिनिधियों का चुनाव होता है और स्थानीय शासन में उनकी अहम भूमिका रहती है। एक भाषा की पढ़ाई से शुरू हुए ताजा आंदोलन ने पर्यटन स्थल दार्जिलिंग का जनजीवन अस्त-व्यस्त करके रख दिया है।

इस मुद्दे पर तृणमूल कांग्रेस प्रमुख एवं राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की केन्द्र सरकार से ठनी हुई है। ममता आंदोलन को गहरी साजिश करार देकर भाजपा को कठघरे में खड़ा कर रही हैं। एक दौर में पृथक् गोरखालैंड मांग का समर्थन करने वाली भारतीय जनता पार्टी इस मुद्दे पर असमंजस में है। उसके लिए बड़ा संकट यह है कि यदि आंदोलन का समर्थन करती है तो बंगाली मतदाताओं के विरोध की आशंका बनती है।

बीते दो-तीन साल में पश्चिम बंगाल में भाजपा धीरे-धीरे अपनी जड़ें जमा रही हैं। ऐसे में पृथक गोरखालैंड आंदोलन के साथ खड़ी होकर दिखने में उसे नुकसान होता नजर आ रहा है।

आंदोलन के समाधान का रास्ता न ममता बनर्जी तलाश पा रही हैं और न ही केन्द्र सरकार। ममता ने तो केन्द्र सरकार की तरफ से मांगी जा रही रिपोर्ट भेजने से भी इनकार कर दिया है। आंदोलन और हिंसक हो उससे पहले पश्चिम बंगाल सरकार और केन्द्र सरकार को मिलकर आंदोलन कर रहे नेताओं से बातचीत कर समाधान के रास्ते तलाशने चाहिए।

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