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मतभेद भुलाकर लड़ें आतंक के विरुद्ध

Updated: IST  BRICS countries
ब्रिक्स देशों के विदेश मंत्रियों का सम्मेलन चीन में हो रहा है तो भारत के लिए यह जरूरी भी था कि वह आतंकवाद को लेकर चीन के दोहरे मापदण्डों को जगजाहिर करे

डॉ. मनन द्विवेदी विदेश मामलों के जानकार

ब्रिक्स देशों के विदेश मंत्रियों का सम्मेलन चीन में हो रहा है तो भारत के लिए यह जरूरी भी था कि वह आतंकवाद को लेकर चीन के दोहरे मापदण्डों को जगजाहिर करे। भले की ब्रिक्स का गठन आर्थिक मंच के रूप में हुआ लेकिन मौजूदा माहौल में यह जरूरी हो गया है कि आतंंकवाद के खिलाफ लड़ाई में भी सदस्य देश एकजुट हों।

चीन में ब्रिक्स देशों के विदेश मंत्रियों के दो दिवसीय शिखर सम्मेलन में आतंक के खिलाफ साझा लड़ाई करने का मसला खुलकर सामने आया है। पड़ोसी देशों के आतंकवाद पर दोहरा रवैया अपनाने पर भारत का रवैया हमेशा यही रहा है कि आतंकवाद कभी अच्छा या बुरा नहीं होता। जो लोग निर्दोषों की हत्या कर रहे हैं, उन सभी के साथ वैश्विक शांति के लिए खतरा बने अपराधियों की तरह बर्ताव होना चाहिए। यह सम्मेलन चीन में हो रहा है इसलिए भारत के सामने यह अच्छा मौका था कि वह आतंकवाद को प्रश्रय देने के चीन के प्रयासों की भी निंदा करे।

हमारे विदेश राज्य मंत्री ने जैश-ए-मुहम्मद सरगना मसूद अजहर को संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंध से बचाने के चीन के प्रयासों पर सम्मेलन के दौरान खुल कर प्रहार किया। चीन, पाक आतंकी मौलाना मसूद अजहर को भारत के संयुक्त राष्ट्र द्वारा आतंकी घोषित किए जाने के प्रयासों का विरोध करता रहा है। आर्थिक सहयोग बढ़ाने के साथ-साथ आतंकवाद के मुद्दे पर भी ब्रिक्स देशों को एकजुट होने की जरूरत महसूस की गई।

उल्लेखनीय है कि ब्रिक्स के सदस्य देशों में ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका शामिल हैं। विश्व की उभरती शक्तियों को सुरक्षा और आतंकवाद निरोधी मुद्दों पर भी अपनी प्रभावी उपस्थिति दर्ज करानी चाहिए यह बात भारत हमेशा कहता आया है। आए दिन हो रही आतंकी घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में विश्व के सभी देश आतंकवाद को मानव जाति के लिए सबसे बड़ा खतरा मान रहे हैं।

ऐसे में सबसे ज्यादा जरूरत इस बात की है कि समस्या की गंभीरता को देखते हुए सभी देश आतंकवाद के समूल नाश के लिए संयुक्त राष्ट्र में लंबित संकल्प प्रस्ताव को पारित कराने के लिए साथ आएं। यह बात सही है कि वैश्विक समस्या बन चुके आतंकवाद के खात्मे में ब्रिक्स जैसे क्षेत्रीय संगठनों की प्रासंगिकता बढ़ गई है। ब्रिक्स की तो स्थापना की पृष्ठभूमि में ही 'रिजीम सिद्धांत' की अवधारणा पूर्णत: लागू होती है।

इस सिद्धांत के अनुसार विभिन्न देश वैचारिक मतभेदों के बावजूद एक-दूसरे का सहयोग करने को बाध्य होते हैं। ब्रिक्स का जब गठन हुआ तब सदस्य देशों की यही सोच थी कि ब्रिक्स को एक मजबूत आर्थिक संगठन के रूप में खड़ा किया जाए। प्रयास तो इसे क्षेत्रीय स्तर पर विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) का विकल्प बनाने का भी रहा।

सीमित आर्थिक संसाधनों और सिर्फ पांच सदस्य देशों के चलते ब्रिक्स का डब्ल्यूटीओ को चुनौती देना आसान नहीं है। फिर भी ब्रिक्स जैसे मजबूत क्षेत्रीय संगठनों के कारण ही विकासशील देश, पश्चिमी देशों की प्रतिकूल शर्तों और अनुबंधों को मानने से इंकार करने की ताकत रखते हैं। आज जो हालात हैं उनमें ब्रिक्स संगठन में भारत की भूमिका अहम हो जाती है।

बदलते क्षेत्रीय समीकरण और वैश्विक जरूरतों की वजह से आज हमारे प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु के समय की समाजवादी विदेश नीति इतनी कामयाब नहीं हो सकती। इसके इतर हमें यथार्थवादी विदेश नीति को अपनाना होगा। भारत को यह भी चाहिए कि वह चीन को पछाड़कर विकासशील देशों का नेतृत्व करने का स्वप्न न पाले।

अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय राजनीति की अपनी जरूरतें होती हैं। इनको समझते हुए ही संतुलित विदेश नीति कारगर हो सकती है। हालांकि पिछले कुछ वर्षों में विदेश नीति में एक बड़े परिवर्तन के रूप में यह देखने में आया है कि भारत का पश्चिमी देशों, खासतौर से अमरीका के साथ सम्बंधों में प्रगाढ़ता आई है। भारत का पश्चिमी देशों से विभिन्न स्तरों पर आपसी सहयोग लगातार बढ़ता जा रहा है। फिर चाहे वह रक्षा के क्षेत्र में हो, तकनीक के क्षेत्र में या फिर व्यापार के क्षेत्र में।

भारतीय हितों को देखते हुए हमारे नीति नियंताओं को तय करना है कि हमें अतंरराष्ट्रीय सम्बंधों में पश्चिमी देशों और विकासशील देशों में से किसे वरीयता देनी चाहिए। यह महसूस किया जा रहा है कि हमारे जिन पड़ोसी देशों से हम आतंकवाद के खिलाफ साझे मुकाबले की उम्मीद करते हैं वे खुद क्षेत्रीय सामरिक हितों और अंदरूनी राजनीति के चलते आतंकवाद के प्रति नरम नीति अपनाते रहे हैं। ऐसे माहौल में वैश्विक मंच पर यह जरूरी हो जाता है कि अमरीका अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद के खिलाफ भारत की मुहिम में खुल कर साथ दे।

जिस खतरनाक तरीके से एशिया से लेकर यूरोप तक आतंकवाद पैर पसार रहा है, उससे ऐसा लगता है कि आने वाले वर्षों में दुनिया के तमाम देशों के सम्मुख सबसे बड़ी चुनौती आतंकवाद से लडऩे की रहने वाली है। जिस तरह से आर्थिक प्रगति प्राप्त करने के लिए विश्व के विभिन्न देश सीमा विवादों को दरकिनार कर आर्थिक समझौते करते हैं उसी प्रकार आतंकवाद पर काबू पाने के लिए भी इन देशों को मतभेदों को भुलाकर एक-दूसरे का सहयोग करना होगा।

ऐसे हालात में ब्रिक्स जैसे क्षेत्रीय संगठन भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। उल्लेखनीय है कि ब्रिक्स के सदस्य देश विश्व व्यापार संगठन और पश्चिमी देशों की सरंक्षणवादी आर्थिक नीतियों का जिस तरह से एकजुट विरोध करते रहे हैं वैसी ही एकजुटता आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई में भी दिखानी होगी।

भारत ने कहा है कि ब्रिक्स देश उसके साथ आकर आतंकवाद को लेकर दुनिया की एकराय बनाने में मदद करें। संयुक्त राष्ट्र में वह व्यवस्था स्थापित करने में सहयोग दें जिसमें अच्छे और बुरे आतंकियों के बीच अंतर न हो। ब्रिक्स (ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका) के पहले विदेश मंत्री सम्मेलन के मौके पर यह बात भारतीय दल का नेतृत्व कर रहे विदेश राज्य मंत्री जनरल (रिटायर्ड) वीके सिंह ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कही। जनरल वीके सिंह ने कहा, उन्होंने कहा कि हर कोई आतंकवाद को मानव जाति के लिए ब?ा खतरा मान रहा है। सभी में उसको लेकर चिंता है।

ऐसे में सभी को आतंकवाद के समूल नाश के लिए संयुक्त राष्ट्र में लंबित संकल्प के प्रस्ताव को पारित कराने में साथ आने की जरूरत है। भारत में सीमा पार आतंकवाद की समस्या पर जनरल सिंह ने कहा, जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद की समस्या पूरी दुनिया के लिए बहुत ब?ा खतरा है। यह वैश्विक शांति के लिए खतरा न बने, इसके लिए हम हर संभव कोशिश कर रहे हैं। आतंकियों को अच्छा बताकर उनका बचाव नहीं किया जाना चाहिए। जनरल सिंह ने ऐसा कहकर जैश-ए-मुहम्मद सरगना मसूद अजहर को संयुक्त राष्ट्र प्रतिबंध से बचाने के लिए चीन के प्रयास पर भी प्रहार किया।

अजहर पर पठानकोट हमले समेत कई आतंकी हमलों का मास्टरमाइंड होने का आरोप है। इससे पहले सम्मेलन को संबोधित करते हुए विदेश राज्य मंत्री ने कहा, आर्थिक तौर पर ताकत दिखाने के साथ ही दुनिया की इन उभरती शक्तियों को सुरक्षा और आतंकवाद निरोधी मुद्दों पर भी अपनी प्रभावी एकजुटता प्रदर्शित करनी चाहिए।

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