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खोखली होती खेती-किसानी की जड़ें

Updated: IST Agriculture
देश में विगत कुछ वर्षों से प्रति हेक्टेयर कृषि उत्पादकता करीब-करीब स्थिर हो गई है। कुछ फसलों में तो

देश में विगत कुछ वर्षों से प्रति हेक्टेयर कृषि उत्पादकता करीब-करीब स्थिर हो गई है। कुछ फसलों में तो उत्पादकता में गिरावट भी देखने को मिली है। कृषि कार्यों में बढ़ती लागत तथा घटते उपज मूल्य किसानों की चिंता के बड़े कारण हैं। सरकारी तंत्र की संवेदनहीन कृषि नीतियों का ही नतीजा है कि कहीं किसान आत्महत्या करने को मजबूर हो रहे हैं तो कहीं कृषि कार्यों से पलायन करने को मजबूर हैं।

पलायन के इन कारणों में जलवायु परिवर्तन तथा गिरते मृदा स्वास्थ्य की समस्याओं के साथ-साथ अपर्याप्त बिजली, पानी, तथा महंगे खाद- बीज व डीजल शामिल हैं। ऐसे हालात में जरूरत इस बात की है कि कृषि भूमि का, गैर कृषि कार्यों में निरंतर बढ़ते जा रहे उपयोग को रोका जाए। कृषि भूमि का अधिग्रहण आवश्यक हो, वहां किसानों के हितों का पूरा संरक्षण किया जाना चाहिए।

देखा जाए तो कृषि एक ऐसा क्षेत्र है जहां उत्पादक अपने उत्पाद की कीमत तय नहीं करता। ऐसे में सरकारी नीतियां, किसानों के हितों की घोर अनदेखी करते हुए बिचोलियों तथा आढ़तियों के हितों का संरक्षण करती नजर आती है। ऐसे में कृषि उत्पादों, खास तौर पर सब्जियों एवं फलों पर लगने वाले शुल्क तुरंत समाप्त किया जाना चाहिए। यह समय की मांग है कि मौजूदा व्यवस्थाओं की समीक्षा कर किसान-हितों से जुड़ी, विज्ञान सम्मत कृषि विपणन व्यवस्था विकसित की जानी चाहिए।

अन्यथा सूचना प्रौद्योगिकी के इस युग में भी किसानों को ठगा जाने लगेगा। किसानों को सीधा मंडी से जोडऩे के लिए किसान बाजार स्थापित किए जाने चाहिए। कृषि आज के दौर में लाभ के बजाए नुकसान का कारोबार होता जा रहा है। इसका सबसे बड़ा कारण कृषि प्रक्रिया में लागत का लगातार बढऩा है। सरकारों को चाहिए कि कृषि में प्रयुक्त सभी मशीनों, खाद, बीज, दवाइयां, डीजल, पानी इत्यादि की कीमतें उसके उत्पाद की कीमतों के समरूप करें।

वैसे भी काश्तकार को सब्सिडी नहीं बल्कि उसकी उपज की सम्यक मूल्य प्रदान करने वाली नीतियां व उनका उचित क्रियान्वयन चाहिए। इसके लिए यह भी जरूरी है कि कृषि कार्य के लिए बिजली की आपूर्ति निर्बाध तो हो ही उनकी दरें न्यूनतम हो। ऐसा इसलिए भी जरूरी है क्योंकि कृषि एक जोखिम भरा कार्य है। मौसम पर इसकी पूर्ण निर्भरता इस जोखिम में घाव का काम करती रहती है।

हम यह भी देख रहे हैं कि प्रधानमंत्री बीमा योजना समेत दूसरी बीमा योजनाएं इस जोखिम के घावों को भरने में अक्षम साबित हुई हैं। सवाल यह है कि आखिर ये काश्तकारों का भरोसा क्यों नहीं जीत पाईं? इनके कारणों की गहराई से पड़ताल तो जरूरी है ही, इन बीमा योजनाओं को किसानों के हितों से जोडऩे वाली बनाना होगा। खेती-बाड़ी ही नहीं बल्कि इससे संबंधित सभी कार्यप्रणालियों को कृषि बीमा के दायरे में लाया जा सकता है।

एक बड़ी खामी यह भी है कि किसानों को बेहतर उपज की जानकारी देने के लिए प्रशिक्षण का अभाव है। जो प्रशिक्षण व्यवस्था है, वह भी काफी लचर एवं दोषपूर्ण है। कृषि विश्वविद्यालयों, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद तथा केंद्र व राज्य सरकारों को मिलकर इस बात की निगरानी करनी होगी कि कृषि क्षेत्र में शोध व नई तकनीक का फायदा किसानों तक पहुंच पा रहा है अथवा नहीं। और, सबसे ज्यादा जरूरत तो कृषि विस्तार सुविधाओं के आधुनिकीकरण की है।

देश भर में प्रत्येक ग्राम पंचायत में एक प्रशिक्षित कृषि सहायक को अवश्य नियुक्त किया जाना चाहिए। जब तक ग्राम पंचायत स्तर पर ये सेवाएं कायम नहीं होंगी कृषि शोध कागजों एवं भाषणों तक ही सीमित रह जाएगा। हम यह भी देख रहे हैं कि विज्ञापनों के जरिए कृषि प्रौद्योगिकी का प्रचार तो खूब हो रहा है, लेकिन अभी भी इसकी पहुंच आम काश्तकारों तक नहीं हो रही है।

टेलीविजन, जिला स्तरीय रेडियो, सामुदायिक रेडियो, स्थानीय प्रिंट मीडिया तथा अन्य व्यवस्थाओं के माध्यम से सम-सामयिक कृषि जानकारी काश्तकारों को देने की व्यवस्था होनी ही चाहिए। यह भी देखने में आ रहा है कि मजदूरों की कमी के कारण खेती का कामकाज समयसाध्य होने लगा है।

ऐसे में कम लागत वाले कृषि यंत्रों को विकसित करने की जरूरत है जिनसे छोटी जोत पर प्रभावी रूप से काम हो सके। छोटे व मंझोले किसानों का कृषि कार्य से पलायन रोकना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। राष्ट्रीय किसान विकास योजना तथा मनरेगा जैसी योजनाओं को भी खेती आधारित संरचनाओं की विकास योजनाओं से जोड़कर ही काश्तकारों को इसका फायदा पहुंचाया जा सकता है।

ऐसा तब ही संभव है जब सत्ता में बैठे लोग विकास योजनाएं तय करते समय खेती और किसानी का खास ध्यान रखें। कृषि हमारी अर्थव्यवस्था का मजबूत आधार है, यह हम बरसों से सुनते आ रहे हैं। लेकिन नीतियों के क्रियान्वयन में शिथिलता अर्थव्यवस्था के इस अहम केंद्र की जड़ें कमजोर ही करती जा रहीं हैं। इस दिशा में समुचित प्रयास नहीं किए गए तो खेती-बाड़ी से मोह कम होता ही जाएगा।

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