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गरजना-बरसना

Updated: IST opinion news
बडकों ने कहावत रची थी- जो गरजते हैं वो बरसते नहीं और जो बरसते हैं वो गरजते नहीं। और अब तो मौसम विज्ञानियों ने पिछले पचास साल के आंकड़ों का हवाला देकर सिद्ध कर दिया कि भारत भूमि पर पानी देने वाले बादलों में कमी हो रही है

व्यंग्य राही की कलम से

बडकों ने कहावत रची थी- जो गरजते हैं वो बरसते नहीं और जो बरसते हैं वो गरजते नहीं। और अब तो मौसम विज्ञानियों ने पिछले पचास साल के आंकड़ों का हवाला देकर सिद्ध कर दिया कि भारत भूमि पर पानी देने वाले बादलों में कमी हो रही है। सही है। तभी तो हम अम्मा-दादी के मुंह से अक्सर एक वाक्य सुनते रहते हैं- लाला!

आजकल तो वैसी बारिश ही नहीं होती जो हमारे जमाने में होती थी। तब तो सात-सात दिन की झड़ लग जाती और सूरजनारायण के दर्शन दुर्लभ हो जाते। बात में दम है। पर थोड़ी थावस से सोचते हैं तो लगता है कि इस देश में गरजने वाले बादलों और बड़बोले नेताओं का मिजाज एक-सा हो गया है। पिछले पचास सालों में तो हद हो गई। एक से एक घोटाले करते हैं, घोटालों में जेल तक हो आते हैं।

उद्योगपतियों की डायरी के पन्नों में लिखे नाम और उनके आगे अंकित की गई रिश्वत तक उजागर हो जाती है, आय से अधिक सम्पत्ति मिल जाती है। इन सबके बावजूद वे महानकटों की तरह सार्वजनिक जीवन में नैतिकता और सेवा का उपदेश देते रहते हैं। कई बार जब छत पर कपड़े सूख रहे होते हैं तो अचानक घुमड़े बादलों और उनकी कड़कड़ाहट सुनने के बावजूद श्रीमतीजी सूखे कपड़े उतारने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाती।

हमारे उद्विग्न होने पर कहती है- कसमसाओ मत। ये बरसने वाले बादल नहीं। और दस-बीस बार महागर्जना करने के बावजूद ये बादल हवा के झोंकों के साथ इधर-उधर उड़ जाते हैं। मजे की बात यह कि हमारे घर की स्त्रियां बादलों का स्वभाव समझ गईं लेकिन हमारे देश का मततदाता नेताओं की फितरत नहीं समझ पाया।

आज भी वह लफ्फाज, बड़बोले, तर्कहीन बातें करने वालों और दूसरों की योजनाओं पर अपना नाम लिख देने वालों को ही परिवर्तन का पहरुआ मानता है। सच्चे बादलों की बरबादी का कारण प्रदूषण है तो राजनीति में गिरावट का कारण बड़बोले नेता हैं। पता नहीं इन्हें हम कब पहचानेंगे।

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