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अनंत इच्छाधारी

Updated: IST opinion news
जिस दुनिया में भिखारी अपने को मालिक समझते हो, उस दुनिया में मालिकों को अपने को भिखारी समझना ही उचित है। वोटों के भिखारी नेता अपने को देश का मालिक समझते हैं और असल मालिक जनता भीख मांगती डोल रही है

व्यंग्य राही की कलम से

हमारे ऋषि-मुनि कह गए कि मन, प्राण, इच्छा, सत्व और पुण्य पंच वर्ग हैं। इन पांच वर्गों के स्वभाव वाला बन कर जीवात्मा यानी हम और आप, बिना ज्ञान के इनसे मुक्ति नहीं पा सकते। सो हमने सोचा कि क्यों न इनमें से एक 'इच्छा' से ही आज मुक्त हो लें। ज्योंही इच्छा पर विचार करना शुरू किया तो सबसे पहले चचा गालिब का एक शेर याद आया- हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले।

यानी हरेक इच्छा ही आदमी की जान ले सकती है। इच्छा का अर्थ क्या है? यह कि जो है उसमें मुझे रस नहीं है और जो होना चाहिए उसमें मुझे रस है। और जब वो हो जाएगा तब उसमें मुझे रस नहीं रहेगा। याद किया कि जब पैदल थे तब साइकिल की तमन्ना। साइकिल आयी तो स्कूटर की ख्वाहिश। स्कूटर था तब कार की इच्छा। ये किस्सा किसी और का नहीं हमारा है। एक इच्छा एक भीख का पात्र। वह इच्छा पूरी नहीं होती कि मन में दूसरा भीख पात्र आ जाता।

एक मजेदार बात बताएं। विश्व में एक भारत देश ही ऐसा है जहां बड़े-बड़े सम्राटों ने सिंहासन को लात मार कर भिक्षा पात्र हाथ में ले लिया था। भर्तृहरि राज त्याग कर जोगी बन गया। राजकुमार सिद्धार्थ बुद्ध बने तो महावीर ने राजकाज छोड़ दिया। बुद्ध ने अपने संन्यासियों को भिक्षु कहा। एक बार बुद्ध एक गांव में भीख मांग रहे थे। एक नगरसेठ ने उन्हें देखा।

बोला- तुम्हारे जैसा सुन्दर, स्वस्थ व्यक्ति भिखारी? चलो मेरी इकलौती बेटी से ब्याह करो और मालिक हो जाओ। बुद्ध हंसे, बोले- काश सच होता कि मैं भिक्षु होता और तुम मालिक। तुम्हें अपने को मालिक समझता देख कर ही हमने भिक्षा पात्र हाथ में लिया है।

जिस दुनिया में भिखारी अपने को मालिक समझते हो, उस दुनिया में मालिकों को अपने को भिखारी समझना ही उचित है। वोटों के भिखारी नेता अपने को देश का मालिक समझते हैं और असल मालिक जनता भीख मांगती डोल रही है। इसीलिए 'इच्छा' अज्ञान की ग्रंथी है।

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