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Updated: IST Red light cars
लाल बत्ती वाली गाडिय़ों पर रोक लगाना बहुत देर से उठाया गया अच्छा कदम माना जा सकता है। वीआईपी संस्कृति

लाल बत्ती वाली गाडिय़ों पर रोक लगाना बहुत देर से उठाया गया अच्छा कदम माना जा सकता है। वीआईपी संस्कृति पर रोक लगाने के इरादे से उठाए गए इस कदम का स्वागत किया जाना चाहिए। जनता और न्यायपालिका के दबाव के चलते आजादी के इतने वर्षों बाद राजनेता अगर वीआईपी संस्कृति खत्म करने की तरफ ध्यान देने लगे हैं तो इसे भविष्य के लिए अच्छी शुरुआत कह सकते हैं। बात सिर्फ लाल बत्ती तक ही सीमित नहीं रहनी चाहिए।

दिल्ली और राज्यों की राजधानियों मेंं मंत्रियों-अधिकारियों के बड़े-बड़े बंगले, सुविधाओं के नाम पर करोड़ों रुपए का खर्चा भी वीआईपी संस्कृति का ही हिस्सा है। सरकार वाकई वीआईपी संस्कृति समाप्त करना चाहती है तो उसे और कड़े फैसले लेने होंगे। बंगले तथा अन्य सुविधाओं पर रोक के साथ सरकारी बैठकों-सेमीनारों पर होने वाले खर्चों पर भी लगाम लगानी होगी। पांच सितारा होटलों में होने वाली सरकारी बैठकों पर होने वाला खर्च आखिर भुगतना तो आम जनता को ही पड़ता है।

संसद और विधानसभा की समितियों के दौरों पर खर्च होने वाली राशि जोड़ी जाए तो आंखें फटी की फटी रह जाएंगी। हर साल ऐसे अनगिनत दौरे होते हैं जिनमें सांसद-विधायक परिवार समेत दौरों के नाम पर भ्रमण करते हैं। पांच सितारा होटलों में ठहरने और घूमने-फिरने के नाम पर बड़ी राशि खर्च होती है।

संसदीय समितियों के ऐसे दौरों का कुछ नतीजा भी निकलता है या नहीं? यही हाल मंत्रियों, सांसदों और अधिकारियोंं के विदेश दौरों पर होने वाले खर्च को लेकर है। अधिकारी अध्ययन के नाम पर विदेश जाते हैं लेकिन देखा गया है कि अध्ययन के बाद आते ही उनके तबादले तक हो जाते हैं। मतलब साफ है कि अध्ययन के नाम पर हुआ खर्च देश के काम आता ही नहीं।

लाल बत्ती वाली गाडिय़ों पर रोक लगाई गई है तो यह सिर्फ दिखावे के लिए नहीं होनी चाहिए। पहले भी कुछ राज्यों में ऐसी घोषणाएं हो चुकी हैं लेकिन धीरे-धीरे स्थिति फिर पुरानी ही नजर आने लगी थी। केन्द्र ने जो कदम उठाया है, राज्य सरकारें भी उस पर अमल करें। यह राजनीतिक मुद्दा नहीं है।

जनप्रतिनिधि अपने आपको जनता का सेवक बताते नहीं थकते तो फिर उन्हें व्यवहार भी वैसा ही करना चाहिए। वीआईपी संस्कृति का खात्मा जनता का लोकतंत्र में विश्वास और बढ़ाने में सहायक साबित होगा।

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