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नेपाल से मजबूत होने लगे हैं रिश्ते (प्रो. स्वर्ण सिंह)

Updated: IST Nepal
पिछले कुछ वर्षों के दौरान भारत के नेपाल के साथ संबंध कड़वाहट भरे रहे लेकिन अब उनमें सुधार हो रहा है। आज से नेपाल की राष्ट्रपति बिद्या देवी भंडारी भारत यात्रा पर आ रही हैं

पिछले कुछ वर्षों के दौरान भारत के नेपाल के साथ संबंध कड़वाहट भरे रहे लेकिन अब उनमें सुधार हो रहा है। आज से नेपाल की राष्ट्रपति बिद्या देवी भंडारी भारत यात्रा पर आ रही हैं। राष्ट्रपति पद का भार ग्रहण करने के बाद यह उनकी पहली विदेश यात्रा भी है। क्या उनकी इस यात्रा में कुछ संधियां होंगी? क्या दोनों देशों के बीच बेहतर संबंधों के प्रमाण मिलेंगे?

नेपाल की राष्ट्रपति बिद्या देवी भंडारी 5 दिन की राजकीय यात्रा पर भारत आ रही हैं। वे नेपाल की पहली महिला राष्ट्रपति हैं और अक्टूबर 2015 में पदभार संभालने के बाद, यह उनकी पहली विदेश यात्रा है। दिल्ली के अलावा वे वाराणसी, गुजरात व उड़ीसा भी जाएंगी। इस यात्रा का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि यह यात्रा मई, 2016 में होनी थी पर यह भारत-नेपाल संबंधों में अड़चनों और नेपाल में राजनीतिक अस्थिरता की वजह से अचानक रद्द कर दी गई थी। पिछले साल नेपाल के नए संविधान को अपनाने के बाद, वहां के मधेसी लोगों ने आंदोलन छेड़ दिया था।

उनकी मांगें थीं कि संविधान में संशोधन हो और संघीय सीमाओं को बदला जाए ताकि मधेसियों को सरकार में उचित प्रतिनिधित्व मिले। चूंकि ज्यादातर मधेसी भारतीय मूल के हैं इसलिए नेपाल की तत्कालीन सरकार को आंदोलन के पीछे भारत का हाथ होने का अंदेशा था। और, जब आंदोलन के चलते भारत-नेपाल व्यापार ठप हो गया तो ओली ने चीन से हाथ मिलाया और वहां से अन्य वस्तुओं के साथ पेट्रोलियम उत्पादों का भी आयात हुआ तो इस पर भारत की प्रतिक्रिया नाराजगी भरी थी। बाद में जब यूनाइटेड नेपालीज कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) ने ओली सरकार से समर्थन वापस लिया। और ओली को इस्तीफा देना पड़ा। उसके बाद से भारत-नेपाल संबंधों में बदलाव नजर आ रहा है।

जब अगस्त 2016 में पुष्प कमल दहल 'प्रचंड' ने प्रधानमंत्री का पदभार संभाला तो पहले छह सप्ताह में ही भारत की यात्रा की। तब कई संधियों पर हस्ताक्षर भी हुए। उल्लेखनीय है कि पूर्व में ओली की भारत व चीन यात्राओं को लेकर भारत में एक समय असमंजस खड़ा हो गया था पर पुष्प कमल दहल पदभार ग्रहण करने के छह सप्ताह में ही भारत आए जबकि उनकी पहली चीन यात्रा 8 महीने के बाद हुई। पिछले महीने अंतत: जब वे चीन गए तो वह उनकी राजकीय यात्रा भी नहीं थी। वे पोआओ फोरम में भाग लेने के लिए चीन गए थे।

उन्होंने बीजिंग में चीन के नेताओं से मुलाकात भी की लेकिन किसी भी संधि पर हस्ताक्षर नहीं हुए। यहां तक कि चीन अब प्रधानमंत्री प्रचंड को उनके भारतीय लगाव को देखते हुए उन्हें संदेह की नजर से देखता है। यही वजह है कि चीन के राष्ट्रपति ने उन्हें आपसी विश्वास बढ़ाने की सलाह दी तो वहां के कम्युनिस्ट पार्टी के मुखपत्र 'ग्लोबल टाइम्स' ने यहां तक कह दिया कि प्रचंड को भारत की ओर बढ़ते अपने रुझान को लेकर सफाई देने की जरूरत है। के.पी. शर्मा ओली के कार्यकाल के दौरान चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की नेपाल यात्रा अक्टूबर 2016 में होने का निर्णय हुआ था। लेकिन, बदले हुए माहौल में न तो चीन के राष्ट्रपति नेपाल गए और न ही आने के कोई संकेत नजर आते हैं। दूसरी ओर, नवंबर 2016 में प्रचंड सरकार ने भारत के राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की नेपाल यात्रा का आयोजन किया।

उल्लेखनीय है कि 2005-06 में मुखर्जी भारत के विदेश मंत्री थे और नेपाल में उन्होंने माओवादियों को मुख्यधारा में लाने में अहम भूमिका निभाई थी। बदलते परिप्रेक्ष्य में देखें तो अपने प्रधानमंत्रित्व कार्यकाल में के.पी. शर्मा ओली ने जहां चीन की वन बेल्ट वन रोड परियोजनाओं (ओबीओआर)से जुडऩे में बढ़-चढ़कर उत्साह दिखाया और संधि की थी। लेकिन, अब प्रचंड ने इस मामले पर चुप्पी साध ली है। चूंकि भारत ने ओबीओआर में शामिल होने पर विरोध जताया है इसलिए प्रचंड की इस चुप्पी में भी चीनी राजनेता, भारत का हाथ देखते हैं।

भारत की ओर बढ़ते रुझान का अर्थ यह नहीं कि नेपाल-चीन के संबंध कमजोर हो गए। आज भी नेपाल में चीन का सालाना निवेश और व्यापार सबसे बड़ा है। वह नेपाल की सेना को प्रशिक्षण तो देता ही है साथ ही युद्ध सामग्री भी मुहैया कराता है। चीन के राष्ट्रपति भले ही नेपाल नहीं गए हों लेकिन चीन में कम्युनिस्ट पार्टी की पोलिटब्यूरो के कई सदस्य नेपाल आ चुके हैं। इस संदर्भ में नेपाल की राष्ट्रपति बिद्या देवी भंडारी की यात्रा में संधियों पर हस्ताक्षर न भी हों पर भारत-नेपाल के बढ़ते तालमेल के कई प्रमाण दिखने की उम्मीद है।

पिछले ही सप्ताह ही, प्रचंड की भारत यात्रा के दौरान में दोनों देशों के लिए बने 'ओवरसाइट मैकेनिज्म' की तीसरी बैठक काठमांडू में हुई। इसमें भारत-नेपाल की विभिन्न परियोजनाओ जिसमें सीमावर्ती क्षेत्रों में सड़क-रेल परियोजनाएं, समन्वित चेकपोस्ट, विद्युत वितरण लाइन डालने, बहुआयामी जल विद्युत परियोजाएं आदि शामिल हैं, की समीक्षा की गई। इसके अलावा भारत की ओर से क्रेडिट लाइन देने और विमुद्रीकरण पर समीक्षा हुई।

नेपाली नागरिक 4500 रुपए तक पुराने भारतीय नोटों को बदल सकते हैं हालांकि उन्हें 25 हजार रुपए तक रखने का अधिकार है इसलिए नेपाल के वित्त मंत्रालय ने नेपाल राष्ट्र बैंक से भारतीय रिजर्व बैंक से बात करने और 25 हजार रुपए तक बदलने की सहूलियत देने के लिए कहा है। इन सभी विषयों पर नेपाल की राष्ट्रपति और उनके प्रतिनिधिमंडल के साथ बातचीत होगी। उम्मीद है कि उनकी इस यात्रा से दोनों देशों के बीच आपसी समझ बढ़ेगी।

प्रो. स्वर्ण सिंह अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार

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