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फिर घिरा ब्रिक्स में पाकिस्तान (सलमान हैदर)

Updated: IST opinion news
गोवा में ब्रिक्स व बिम्सटेक देशों के सम्मेलनों के जरिए पाकिस्तान को आतंकी देश करार देने में हम भले ही कामयाब नहीं हो पाए हों लेकिन अंतरराष्ट्रीय मंचों पर किसी देश के खिलाफ बना माहौल भारत की बड़ी कूटनीतिक सफलता माना जाना चाहिए

गोवा में 15-16 अक्टूबर को हुए ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की सबसे बड़ी सफलता यही मानी जानी चाहिए कि हमने आतंकवाद के मसले पर दुनिया का ध्यान खींचने में कामयाबी हासिल की है। आलोचकों का यह मत हो सकता है कि हम इस सम्मेलन के माध्यम से पाकिस्तान को आतंकी देश करार देने में कामयाबी हासिल नहीं कर पाए। लेकिन इस सम्बन्ध में मेरा मानना है कि ब्रिक्स जैसे संगठन किसी एक देश के नहीं होते हैं।

ऐसे संगठनों में सदस्य देशों के सामूहिक हित का ध्यान रखना होता है। ब्रिक्स में हमारा पड़ोसी देश चीन भी शामिल था और उससे यह उम्मीद नहीं की जा सकती थी कि वह पाकिस्तान को लेकर भारत का साथ देगा। ब्रिक्स सम्मेलन हमारे देश में हुआ था और सदस्य देश हमारे मेहमान थे। ऐसे में यह उम्मीद भी नहीं की जानी चाहिए कि हम दबाव डालकर उनसे कोई बात कहला सकते थे। हां, ब्रिक्स के अहम सदस्य रूस को लेकर हम जरूर शंकित थे।

इसका बड़ा कारण रूस व पाकिस्तान का संयुक्त रक्षा अभ्यास माना जा रहा था। लेकिन हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने रूसी राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन के साथ ब्रिक्स सम्मेलन से पहले जिन अहम समझौतों पर दस्तखत किए उसने इस शंका को एक हद तक दूर कर दिया है। सबसे बड़ी बात यह है कि एनएसजी की सदस्यता हासिल करने में जुटे भारत की कोशिशों को इस सम्मेलन से बल मिला है।

ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान भारत ने सार्क के बजाय बिम्सटेक देशों के राष्ट्राध्यक्षों को न्योता देकर एक बार फिर पकिस्तान को अलग थलग करने की कोशिश की। उरी हमले के बाद भारत ने इस्लामाबाद में अगले माह होने वाले सार्क सम्मलेन का बहिष्कार किया तो कई अन्य सदस्य देशों ने भी इसमें हिस्सा न लेने का ऐलान किया।

नतीजा यह रहा कि सार्क की यह बैठक स्थगित हो गई। यह पहले से ही उम्मीद की जा रही थी कि भारत बिम्सटेक को इसलिए महत्व देगा क्योंकि पाकिस्तान इसमें शामिल नहीं है। हमने यह भी जताने का प्रयास किया कि बिम्सटेक के सदस्य उसके पड़ोसी देशों से हमारे बेहतर सम्बन्ध है। श्रीलंका व बांग्लादेश जैसे राष्ट्रों से हमें बहुत ज्यादा उम्मीद भी नहीं करनी चाहिए कि वे आतंकवाद के मसले पर पाकिस्तान को सीधे तौर पर आंख दिखाने की स्थिति में होंगे। लेकिन हमारी कूटनीतिक सफलता इसी बात में है कि ब्रिक्स व बिम्सटेक देशों को भी हमने आतंकवाद की समस्या पर चर्चा के लिए मजबूर कर दिया है।

इस कवायद से पाकिस्तान अलग-थलग होता जा रहा है। हमें यह भी समझ लेना चाहिए कि आतंकवाद के मामले में पाकिस्तान को जिम्मेदार ठहराने पर जब तक चीन चुप्पी साधे रहेगा तब तक इस मसले पर ब्रिक्स जैसे संगठनों का फायदा उठाने में मुश्किलें आती रहेंगी। हां हमने चीन को यह अहसास जरूर करा दिया है कि उसके दोस्त यानी पाकिस्तान का रवैया ठीक नहीं है। न केवल चीन बल्कि दुनिया के दूसरे देश भी धीरे-धीरे यह समझ रहे हैं कि आतंकवाद का पोषण जो भी करेगा अंतत: नुकसान भी खुद ही भुगतेगा।

आर्थिक शक्ति के रूप में चीन को भारत का महत्व भली-भांति पता है। वह जानता है कि भारत के साथ व्यापार संतुलन रखना उसके लिए बड़ी मजबूरी है। फिर हम चीन की तरफ ही क्यों देखते हैं? अमरीका भी तो है। वह क्यों पाकिस्तान को आतंकी देश घोषित कराने में हमारी मदद नहीं कर पा रहा? कारण साफ है, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर हर देश की अपनी मजबूरी व कूटनीति होती है।

अमरीका को पाािकस्तान में अपना बाजार चाहिए, साथ ही उसे चीन को भी बैलेंस करना है। ऐसे में चीन ही क्यों अमरीका भी खुल कर भारत के साथ आ पाएगा इसकी उम्मीद करना व्यर्थ है। चीन के साथ हमारे ताल्लुकात खराब हैं ऐसा नहीं मानना चाहिए। चीन से हमारी दोस्ती है लेकिन सीमित है।

दूसरी बात यह है कि पाकिस्तान को लेकर चीन से दुश्मनी करने में भी हमें फायदा कम, नुकसान ज्यादा है। हमारा सबसे बड़ा मकसद यही है कि आतंक और आतंकवाद को पोषण देने के मामले में पाकिस्तान को दुनिया के सामने बेनकाब किया जाए। इस मकसद में हम एक हद तक कामयाब होते भी जा रहे हैं।

अमरीका, चीन, रूस, ब्रिटेन व जर्मनी सारे बड़े देश पाकिस्तान कीे भूमिका से चिढऩे लगे हैं। आम तौर पर चुप रहने वाले हमारे पड़ोसी देश भूटान, अफगानिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश आदि भी आतंकवाद के खात्मे की दिशा में हमारी सोच के साथ है। ब्रिक्स सम्मेलन के साथ बिम्सटेक देशों को बुलाने का बड़ा मकसद भी यही दिखाना था कि हमारे पड़ोसी देशों में पाकिस्तान को छोड़कर अन्य सबके साथ हमारे बेहतर सम्बन्ध हैं।

हम एक दूसरे की मुसीबतों व खुशियों में शरीक होते आए हैं और आगे भी ऐसा करते रहेंगे। ब्रिक्स सम्मेलन की मेजबानी से भारत को अंतरराष्ट्रीय मंच पर बड़ी कामयाबी मिली है और इसे कम नहीं आंका जाना चाहिए। जलवायु परिवर्तन का मसला हो या विकास, शांति और सुधार के क्षेत्र में काम करने के साझा प्रयासों को गति देने की बात हो, ग्लोबल पटल पर भारत मजबूती से उभरा ही है।

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