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पेट्रोल-डीजल: क्या सही है रोज दाम परिवर्तन ?

Updated: IST Petrol-diesel
देश की सरकारी पेट्रोलियम कंपनियों ने पहले पांच शहरों में प्रयोगात्मक तौर पर पेट्रोल-डीजल के दामों को अंतरराष्ट्रीय बाजार के मुताबिक रोजाना बदलने का फैसला लिया है

देश की सरकारी पेट्रोलियम कंपनियों ने पहले पांच शहरों में प्रयोगात्मक तौर पर पेट्रोल-डीजल के दामों को अंतरराष्ट्रीय बाजार के मुताबिक रोजाना बदलने का फैसला लिया है। और फिर, 1 मई 2017 से पूरे देश में इसी तरह बदलाव किए जा सकेंगे। क्या अब कीमतें राजनीतिक दबाव से मुक्त रहेंगी? क्या इस बदलाव से कंपनियों और आम उपभोक्ता को लाभ मिलने वाला है? हर पखवाड़े में समीक्षा के आधार पर क्या वर्तमान व्यवस्था ठीक नहीं थी? ऐसे ही सवालों पर बड़ी बहस...

आम उपभोक्ता के लिए लाभकारी है यह फैसला (ज्ञान रंजन पांडा)

लंबे समय से इंतजार था कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रचलित कीमतों के आधार पर दैनिक स्तर पर पेट्रोल-डीजल के दाम निर्धारित किए जाएं। शुरुआती स्तर पर पहली अप्रेल से उदयपुर, विशाखापत्तनम, पुड्डुचेरी, जमशेदपुर और चंडीगढ़। इन पांच शहरों में पेट्रोल-डीजल के दाम दैनिक आधार पर 1 मई 2017 से बदले जाएंगे। इसकी सफलता के बाद धीरे-धीरेे पूरे देश में कीमतों में अंतरराष्ट्रीय बाजार के अनुरूप दैनिक आधार पर यह व्यवस्था लागू की जाएगी।

उल्लेखनीय है कि जून 2010 में सरकार ने पेट्रोल और फिर अक्टूबर 2014 में डीजल को विनियंत्रित किया। इसके बाद से देश की पेट्रोलियम कंपनियों ने हर पखवाड़े में एक बार अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम और अन्य लागतों की समीक्षा के आधार पर पेट्रोल व डीजल के दामों में परिवर्तन करना शुरू कर दिया। भले ही कीमतों पर सरकार का नियंत्रण न रहा हो लेकिन परोक्ष रूप से वह दामों को प्रभावित करती थी।

देश में 58 हजार पेट्रोल-डीजल पंप स्टेशन हैं जिनमें से 95 फीसदी पंप स्टेशन तीन सरकारी कंपनियों इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन, भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड, हिंदुस्तान पेट्रोलियन कॉर्पोरेशन लिमिटेड के ही हैं। इस बात को ऐसे भी समझा जा सकता है कि पंजाब और उत्तर प्रदेश सहित पांच राज्यों के चुनावों को ध्यान में रखते हुए ढाई महीने तक पेट्रोल-डीजल के दामों में बदलाव नहीं किया गया था।

दाम में परिवर्तन इसी महीने की पहली तारीख को हुआ। भले ही दाम में कमी का लाभ उपभोक्ताओं को देर से मिला लेकिन इसके कारण राजनीतिक ही थे। अब जबकि दैनिक रूप से दामों में परिवर्तन होगा तो यह राजनीतिक लाभ-हानि की गणित नहीं लगाई जा सकेगी।

अब तक दाम में जो परिवर्तन होते थे, उसमें यह समझ नहीं आता था कि ये राजनीतिक लाभ के लिए हैं या वृहद स्तर पर आम जनता के हित में हैं? लेकिन, अब दैनिक बदलावों का सीधे तौर पर आम उपभोक्ता को लाभ मिलने वाला है। इसके अलावा पेट्रोलियम कंपनियां अपने लाभ-हानि की गणित लगाकर भविष्य के मद्देनजर फैसले कर पाएंगी।

याद होगा कि 2014-15 में कच्चे तेल के दाम 17 फीसदी घटे, फिर 2015-16 में ये दाम 35 फीसदी घटे लेकिन पेट्रोलियम कंपनियों ने दाम घटने का लाभ लंबे समय तक उपभोक्ताओं को नहीं दिया लेकिन दैनिक आधार पर कीमत करने के लिए समीक्षा होगी तो उपभोक्ताओँ को लाभ देने का दबाव कंपनियों पर होगा। कई बार पेट्रोल-डीजल पंप मालिक दाम परिवर्तन का लाभ उपभोक्ताओं को देने से बचते रहे हैं लेकिन अब पुराने स्टॉक को समाप्त करने जैसा बहाना नहीं रहने वाला है। चूंकि दाम परिवर्तन पैसों में ही रहेगा, इससे उपभोक्ता को विशेष परेशानी नहीं होगी।

कीमत अस्थिरता ग्राहकों पर लादना ठीक नहीं (डॉ. अश्विनी महाजन)

जून 2010 से पहले जब पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतें सरकारी नियंत्रण में थीं, तब भी पेट्रोलियम कंपनियां खासा लाभ कमाती थी। वर्ष 2009-10 में भी सरकारी पेट्रोलियम कंपनियों ने केंद्रीय राजस्व में करों और लाभांशों के रूप में 1.84 लाख करोड़ रुपए दिए थे। हालांकि नियंत्रित कीमत प्रणाली में भी कंपनियों को खूब लाभ होता ही था, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों के बढऩे के कारण होने वाले नुकसानों की भरपाई 'ऑयल बांड' जारी करके की जाती थी और जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें कम होती थीं तो ऑयल बांड वापिस खरीद लिये जाते थे।

समय-समय पर पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बदलाव आम बात हो गई है। इसके बावजूद पेट्रोलियम कंपनियों के लाभ बढ़ नहीं पाए हंै, तेल की कीमतों में अस्थिरता जरूर बढ़ गई है। अब सरकार क्या नए फैसले से इस अस्थिरता को और बढ़ाना चाहती है? ध्यान रहे पेट्रोल कीमतों को पूरी तरह से बाजार पर छोड़ते हुए और डीजल की कीमतों में उत्तरोत्तर वृद्धि करने के साथ सरकार तेजी से अपने पेट्रोलियम अनुदान कम करती रही है। हम जानते हैं कि कीमत नियंत्रित रखने की व्यवस्था में पेट्रोल-डीजल कीमतों में स्थिरता अंतिम उपभोक्ताओं, उद्योग व कृषि के लिए बेहतर थी। किसान हो या उद्यमी ईंधन की कीमतों में स्थिरता का लाभ उठाते हुए काम कर सकता था।

अंतिम उपभोक्ताओं के लिए भी कीमत स्थिरता घरेलू बजट बनाने में मददगार होती थी। कंपनियों द्वारा कीमतों में बदलाव की वर्तमान व्यवस्था उत्तम तो नहीं लेकिन कंपनियों के लिए अलाभकारी भी नहीं है। लेकिन, रोजाना कीमतों में बदलाव उद्योग, कृषि और आम उपभोक्ता के बजट के लिए अस्थिरता का कारण जरूर बन सकता है।

अंतरराष्ट्रीय तेल की कीमतों में रोज बदलाव के तर्क के आधार पर पेट्रोल-डीजल के दाम बदलने की बात है तो ध्यान दिला दूं कि बड़ी-बड़ी कंपनियों द्वारा तेल खरीद के सौदे अग्रिम तौर पर ही करती हैं इसलिए कीमतों में बदलाव उन्हें प्रभावित नहीं करता। विकसित देशों में भी ऐसा होता है, तो भी यह सही नहीं होगा क्योंकि वहां तेल की कीमतें प्रतियोगिता के आधार पर कंपनियां अलग-अलग तय करती हंै, जबकि हमारे यहां सभी तेल कंपनियों द्वारा इकट्ठा मिलकर कीमत तय की जाती है। यानी ये कंपनियां कार्टेल बनाकर कीमतों को ऊंचा रख सकती है।

यह तर्क दिया जाता है कि पेट्रोल पंप वाले गड़बड़ करते हैं तो इसके लिए उपभोक्ताओं को कष्ट क्यों दिया जाए? जिस अस्थिरता को कंपनियों के स्तर पर ही आसानी से रोका जा सकता है, उस अस्थिरता को उद्योग, किसान, उपभोक्ता तक लेकर जाना गलत होगा। सरकार का दायित्व आर्थिक अस्थिरताओं को कम करना होता है और सरकारी नीति की उपयुक्तता का भी यही निष्कर्ष होता है।

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