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क्या राष्ट्रपति चुनाव 'सर्वसम्मति' से होने चाहिए?

Updated: IST presidential election
राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव प्रक्रिया शुरू हो गई है। राजनीतिक दलों ने इस पद पर उम्मीदवार के चयन के लिए सर्वसम्मति बनाने की कवायद शुरू कर दी है

राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव प्रक्रिया शुरू हो गई है। राजनीतिक दलों ने इस पद पर उम्मीदवार के चयन के लिए सर्वसम्मति बनाने की कवायद शुरू कर दी है। लेकिन, सवाल यह है कि भारतीय लोकतंत्र में इस पद के लिए सर्वसम्मति बनाना उचित है? आमतौर पर ऐसा हो तो नहीं पाता। सत्तारूढ़ दल अपनी पसंद के व्यक्ति को ही राष्ट्रपति बनाना चाहता है, तो फिर यह कवायद होती ही क्यों हैं? यदि होती है तो क्यों नहीं बन पाती आम सहमति? इसी मुद्दे पर आज बड़ी बहस

मतदान होने से गरिमा कम नहीं हो जाती इस पद की(शेखर दत्त )

राष्ट्रपति पद के लिए हमारे देश में मनोनयन की परंपरा नहीं है। इस पद के लिए चुनाव प्रक्रिया हमारे यहांं संविधान में ही तय की गई है। हर बार जब राष्ट्रपति का कार्यकाल पूरा होता है तो नए राष्ट्रपति के नामों की चर्चा शुरू हो जाती है। साथ ही यह भी कि इस प्रयास भी शुरू होते हैं कि इस पद के लिए चुनाव की नौबत नहीं आए।

किसी एक नाम पर सर्वसम्मति बन जाए। इस बार भी यही सब हो रहा है। राजनीतिक दलों के नेता आपस में मिलकर एकराय से उम्मीदवार तय करने की सोच भी रहे हैं। सत्तारूढ़ दल आगे बढ़कर विपक्ष से बात भी कर रहा है। खबर आई है कि गृहमंत्री राजनाथ सिंह और शहरी विकास मंत्री वैंकय्या नायडू कांग्रेस पार्टी की अध्यक्ष सोनिया गांधी से मिले हैं और उन्होंने राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के चयन पर विपक्ष का समर्थन मांगा है।

यदि ऐसा हो जाता है तो अच्छी बात हैं, अन्यथा इस बार भी इस पद के लिए मतदान की नौबत आ सकती है। हमें यह समझना चाहिए कि यह सवाल ज्यादा अहम नहीं हैं कि राष्ट्रपति का चुनाव सर्वसम्मति से होना ही चाहिए या नहीं होना चाहिए। ऐसा भी नहीं कि कभी हमारे देश में राष्ट्रपति के नाम पर सर्वसम्मति नहीं बनी हो।

ऐसा हुआ जरूर है पर सिर्फ एक बार, जब डॉ. नीलम संजीव रेड्डी राष्ट्रपति बने। इसके पूर्व और बाद में हमने देखा है कि राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवारों में मुकाबला हुआ ही है। भले ही किसी एक उम्मीदवार की एकतरफा जीत पहले से ही नजर आ रही हो। इस बात में कोई बुराई नहीं है कि राष्ट्रपति का चुनाव मतदान के जरिए ही हो क्योंकि ऐसा भी नहीं है कि मतदान के जरिए राष्ट्रपति का निर्वाचन होने से इस पद की गरिमा कम हो जाती हो।

राष्ट्रपति देश के प्रथम नागरिक होते हैं और हमारी तीनों सेनाओं के सर्वोच्च सेनानायक भी। दरअसल, किसी भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया में चुनाव एक अहम अंग है इसीलिए देश की सबसे छोटी से लेकर सबसे बड़ी पंचायत तक में चुनाव की व्यवस्था की गई है। लोकतांत्रिक व्यवस्था की यह खूबी ही है कि जब मतदान होता है तो एक पक्ष जीतता है और दूसरा हारता है।

यह हमारे लोकतंत्र की परिपक्वता ही कही जाएगी कि हमारे संविधान निर्माताओं ने देश के सर्वोच्च पद राष्ट्रपति के लिए भी चुनाव प्रक्रिया तय की है। लोकतांत्रिक तरीके से जो भी काम होता है उसका आदर होता है। राष्ट्रपति मतदान के जरिए चुने जाने के बाद भी किसी दल नहीं, देश के राष्ट्रपति होते हैं और इसीलिए जो प्रक्रिया हमारेयहां है उसके अनुरूप काम होने में कोई बुराई नहीं है। रही बात सर्वसम्मति की, तो प्रयास हर बार होते हैं लेकिन रास्ता मतदान का ही दिखाता है। लोकतांत्रिक प्रक्रिया से होने वाला चुनाव भी सर्वमान्य ही कहा जाना चाहिए क्योंकि बहुमत ऐसे निर्वाचन के पक्ष में ही होता है।

यह मात्र दिखावे भर की राजनीतिक प्रक्रिया है (राम बहादुर राय)

राष्ट्रपति पद के लिए चयन में उम्मीदवार के नाम पर सर्वसम्मति वास्तव में चेहरा बचाने की कोशिश होती है। आम सहमति बनाना वास्तव में केवल राजनीतिक प्रक्रिया भर है। सत्तारूढ़ दल की कभी भी इच्छा नहीं होती कि सर्वसम्मति से राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार का चयन हो लेकिन वह विपक्ष को यह कहने का मौका नहीं देना चाहता कि उससे बात नहीं की गई। इसलिए, वह सर्वसम्मति के लिए बात करने का पैंतरा चलता है।

उधर, विपक्षी खेमा भी सत्तारूढ़ दल को घेरने की फिराक में रहता है और कहने का मौका तलाशता है कि उससे राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के चयन के बारे में पूछा नहीं गया। हकीकत में आम सहमति ऐसी राजनीतिक प्रक्रिया है जिसके लिए लोकतंत्र बहुत जरूरी है और वर्तमान में ऐसा कोई भी दल दिखाई नहीं देता जिसमें आंतरिक लोकतंत्र हो। अधिकतर दल एक ही नेता या परिवार के इर्द-गिर्द घूमते नजर आते हैं।

राष्ट्रपति जैसे पद पर आम सहमति से उम्मीदवार चुनने के लिए उस उम्मीदवार के गुण-दोष पर चर्चा जरूरी होती है। ऐसा व्यक्त्तिव तलाशना पड़ता है जो राष्ट्रपति भवन में हो तो देश की मर्यादा बढ़े। लेकिन, इस पर कोई चर्चा किसी दल के अंदर और अन्य दलों के बीच होती दिखाई नहीं देती। दरअसल इस तरह की बातचीत के लिए जो वातावरण व संबंध होना चाहिए, वह सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच है ही नहीं। ऐसे परिस्थति में आमसहमति की केवल बातें ही होती हैं।

भारतीय राजनीति में राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के चयन में प्रधानमंत्री की भूमिका हमेशा से महत्वपूर्ण होती है। उसे लगता है कि अमुक व्यक्ति से उनकी पटरी ठीक बैठ सकती है, वह उन्हीं को राष्ट्रपति बनवाता है। भारत की स्वतंत्रता के बाद एक या दो बार के उदाहरणों को छोड़ दें तो ऐसा ही होता रहा है।

ज्यादातर राष्ट्रपति पद के चयन को देखें तो यही स्पष्ट होता है कि सत्तारूढ़ दल केवल दिखावे के लिए ही विपक्ष से बात करता है लेकिन राष्ट्रपति अपने ही उम्मीदवार को बनवाता है। जब सत्ता की चाबी गठबंघन सरकार के सहयोगी दलों के पास गई या कहें कि जब से पूर्ण बहुमत वाले एकल दल की सरकार बननी बंद हुई, तब घटक दलों की भूमिका इस मामले में बढ़ गई थी। अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार के दौरान उपराष्ट्रपति कृष्णकांत को राष्ट्रपति पद का स्वाभाविक उम्मीदवार माना जा रहा था लेकिन नया नाम एपीजे अब्दुल कलाम सामने आ गया और वे राष्ट्रपति बन गए।

इसके बाद राष्ट्रपति पद के लिए उपराष्ट्रपति भैरों सिंह शेखावत के नाम पर विपक्ष एकमत था तो सत्तापक्ष प्रतिभा पाटील का नाम ले आया। सर्वसम्मति से राष्ट्रपति का चयन हो, ऐसा मुश्किल ही लगता है। इस बार भी दो उम्मीदवार सामने आ ही जाएंगे।

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