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सुलगती कश्मीर घाटी, खामोश सियासत

Updated: IST opinion news
कश्मीर घाटी फिर सुलगने लगी है। सेना और पुलिस बल की तमाम सख्ती के बावजूद हिंसक घटनाएं थमने का नाम नहीं ले रहीं। खास तौर से अनंतनाग जिला सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ है जहां पिछले दो साल में आतंकी घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं

प्रो. नूर अहमद बाबा

कश्मीर में अमन की बहाली का सपना अधूरा ही जान पड़ रहा है। सुलगती घाटी में अलगाववादी वारदात सियासत के लिए चुनौती बनकर सामने आ रही है। युवाओं को मुख्यधारा में लाने के जुबानी जमा खर्च तो बहुत हुए, आखिर पहल कहां से और कैसे होगी। सरहद पार से घाटी में अशांति को कायम रखने की करतूतों का मुंहतोड़ जवाब देना ही होगा

कश्मीर घाटी फिर सुलगने लगी है। सेना और पुलिस बल की तमाम सख्ती के बावजूद हिंसक घटनाएं थमने का नाम नहीं ले रहीं। खास तौर से अनंतनाग जिला सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ है जहां पिछले दो साल में आतंकी घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। ताजा वारदात अनंतनाग जिले के अचबल में हुई जब नियमित गश्त पर गई पुलिस टोली पर आतंकवादियों ने घात लगा कर हमला किया। हमले में शहीद हुए छह पुलिसकर्मियों के शव क्षत-विक्षत कर उनके हथियार लेकर आतंकी फरार हो गए, इस तरह के समाचार भी आए हैं। माना जा रहा है कि आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा ने हमले को अंजाम दिया।

जब भी कश्मीर में ऐसी घटनाएं होती हैं खास तौर से राजनीतिक मंचों से यह आवाज उठने लगती है कि कश्मीर की समस्या का बातचीत के जरिए ही हल निकाला जा सकता है। खुद जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने भी इस बात को स्वीकार किया है कि कश्मीर मुद्दे के हल के लिए बातचीत के अलावा अन्य कोई रास्ता नहीं है।

पिछले दिनों पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा के नेतृत्व में एक दल कश्मीर आया था, उसकी रिपोर्ट में भी कहा गया है कि घाटी के हालात सुधारने के लिए युवाओंं के साथ बातचीत का सिलसिला शुरू किया जाए। लेकिन इसकी शुरुआत भी नहीं हो सकी है। यह नहीं है कि बातचीत किससे की जाए और कौन करे? बड़ी समस्या यह है कि जिस तरह का माहौल इन दिनों कश्मीर में बना हुआ है उससे दोनों देशों के सीमा से सटे इलाकों में बसे लोगों का संकट बढ़ गया है।

सब जानते हैं कि आतंकियों को शह कहां से मिल रही है? लेकिन इस बात पर ध्यान कोई नहीं देता कि आखिर अब तक शांति की राह पर चल रहे कश्मीर के युवा क्यों हथियार थामने को मजबूर हो रहे हैं? पिछले वर्षों के उदाहरण देखें तो लोग पहले सेना के खिलाफ खड़े नजर आते थे। लेकिन चिंता की बात अब यह है कि पुलिस के खिलाफ भी हथियार उठाए जाने लगे हैं। आतंकियों ने पुलिस पर हालिया हमला कर अपने मंसूबे एक बार फिर जाहिर कर दिए हैं।

घाटी में हिंसा को बरकरार रखने की ये आतंकियों की गहरी साजिश है। रही बात अलगाववादियों को बाहर से फंडिंग होने की, यह भी एक तथ्य है कि जब भी हमारे यहां आंतरिक स्थिति कमजोर दिखने लगी बाहरी मदद का सिलसिला बढ़ा और इसी वजह से आतंकी और अलगाववादी पुलिस तथा सेना को चुनौती देते नजर आए।

हम यह भी देख रहे हैं कि आए दिन सीमा पर दोनों तरफ से फायरिंग के दौर हो रहे हैं। किसी भी हमले का जवाब दिया जाना चाहिए लेकिन इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि हमारे नागरिकों को इस दौरान परेशानी न हो। जब भी कश्मीर के हालात पर चर्चा होती है यह बात जरूर सामने आती है कि कश्मीर मुद्दे का समाधान बल प्रयोग नहीं है बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्तिही इस समस्या का समाधान ज्यादा प्रभावी तरीके से कर पाएगी। लेकिन हम जिस इच्छाशक्ति की बात करते हैं वह अभी नजर नहीं आ रही।

न तो केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा सरकार में और न ही राज्य के पीडीपी-भाजपा गठबंधन सरकार में। दरअसल, जब से कश्मीर में दोनों दलों के गठबंधन की सरकार बनी है तब से यहां हिंसा का दौर भी बढ़ा है। स्थानीय राजनीति में इस गठबंधन को बेमेल माना जा रहा है जिसमें एक दल अलगाववादियों और आतंकियों के खिलाफ सख्ती का हिमायती है तो दूसरा थोड़ा इस संबंध में खुल कर कुछ कहने की स्थिति में नहीं है।

भाजपा जब सत्ता में नहीं थी तो कांग्रेस पर आरोप लगाती थी कि वह कश्मीर मसले पर ढिलाई बरत रही है। सत्ता में आने से पहले ही भाजपा ने कश्मीर में आतंकियों के खात्मे के लिए सख्ती की बातें कही। यहां दूसरी बात यह भी है कि घाटी में हर व्यक्ति तो आतंकी नहीं है। सेना और पुलिसबल के पास अपना तंत्र है।

जितना सुरक्षा बल घाटी में तैनात है उसके आगे आतंकी गिनती के हैं। पिछले सालों में कश्मीर में पत्थरबाजी की घटनाएं जिस तरह से हुईं उससे यह बात तो साफ है कि अलगाववाद फैलाने वाले अपने नापाक मंसूबों में कामयाब हो रहे हैं। अब भी समय है संकेतों को समझा जाए। आतंकी संगठनों में स्थानीय युवकों का भर्ती होना ज्यादा चिंताजनक है क्योंकि इन्हें स्थानीय सहयोग आसानी से मिल जाता है। लेकिन बात फिर वहीं आ जाती है कि आखिर लगभग सत्तर साल पुराने कश्मीर के मसले का हल क्यों नहीं निकल पा रहा?

कश्मीर आखिर कब तक हिंसा की आग में सुलगता रहेगा? जवाब भी यही आता है कि बातचीत का रास्ता अपनाना चाहिए। भटके हुए लोगों को विश्वास में लेने की जिम्मेदारी हुक्मरानों की है। अब तक बातचीत के जो प्रयास हुए वे वैसे नहीं किए गए जैसे तत्कालीन प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी के समय में हुए थे।

सबने देखा कि उस समय कश्मीर में हालात काफी सुधर गए थे। यह सही भी है कि जब भी हमारे यहां बातचीत का माहौल बनता है सीमा पार से हमारे यहां अशांति फैलाने का दौर शुरू हो जाता है। फिर भी मेरा यह मानना है कि बातचीत के दरवाजे सदैव खुले रखने चाहिए। लेकिन ये प्रयास वास्तविक हों दिखावे के तौर पर न हों।

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