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'हिन्दू राष्ट्रवाद' की सोच,दूर की कौड़ (प्रो.प्रदीप के.माथुर)

Updated: IST opinion news
देश के भविष्य को लेकर हरेक व्यक्ति की अपनी राय हो सकती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनावों में भारतीय जनता पार्टी की जीत के बाद कहा, 'एक नए भारत का उदय हो रहा है

अगर मौजूदा केंद्र सरकार भारत को 'हिन्दू राष्ट्र' बनाना ही चाहती है तो उसे हिन्दू धर्म और अध्यात्म के उच्च मूल्यों व सिद्धान्तों को अपनाना होगा। इसका आशय इंसानियत, सार्वभौमिक प्रेम, परस्पर सम्मान और विश्व शांति की ओर अग्रसर होने की कोशिशों से है। इसके लिए हमें एक विशुद्ध बुद्धिजीवी समाज की जरूरत है ।

देश के भविष्य को लेकर हरेक व्यक्ति की अपनी राय हो सकती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनावों में भारतीय जनता पार्टी की जीत के बाद कहा, 'एक नए भारत का उदय हो रहा है। भाजपा और उसके विचारधारात्मक संगठन आरएसएस को भली-भांति अंदाजा है कि मोदी के 'नए राष्ट्र' का मतलब है- 'हिन्दू राष्ट्र'। पर सवाल यह है कि क्या वाकई ऐसा है? दरअसल गांधी-नेहरू काल से हिन्दू राष्ट्र का मुद्दा भारतीय समाज के लिए हाशिये पर रहा है। हिन्दू राष्ट्र के मतदाता विविधतापूर्ण उदारवादी विचारधारा का महत्व कमतर कैसे समझ सकते हैं, यही शोध का विषय है।

हमें यह स्वीकार करना होगा कि हम ऐसे समाज के साये में जी रहे हैं, जिसका उदारता से कोई सरोकार नहीं है। ऐसे में अगर हम मौजूदा सरकार द्वारा तय किए जा रहे नैतिक मूल्यों के पारम्परिक होने अथवा उनके औचित्य पर सवाल उठाएं तो यह ज्यादातर लोगों को नागवार गुजरेगा। सवाल यह भी उठता है कि 'हिन्दू राष्ट्र' की यह नई सोच कहां जा कर थमेगी? शायद ही किसी के पास इसका जवाब हो। फिर भी विरोधाभास से बचते हुए इस विषय पर रोशनी डालने वाली कुछ विचारधाराएं सामने लाई जा सकती हैं।

भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में यह पहली ऐसी सरकार है, जिसे 50 प्रतिशत से अधिक मतदाताओं का जनादेश मिला है। केंद्र में भाजपा की मोदी सरकार और 16 राज्यों में भाजपा सरकार, भारतीय राजनीतिक परिदृश्य को परिभाषित करने के लिए काफी हैं। इसे इस प्रकार भी समझा जा सकता है कि सरकार को मिले जनादेश के अनुसार देश की आधी से अधिक आबादी हिन्दू राष्ट्र को मान्यता नहीं देती।

अब इसे राजनीतिक मजबूरी कहें या अवसरवाद, कई पार्टियां भाजपा के साथ नजर आती हैं। लेकिन, वे आरएसएस से भाजपा को मिले हिन्दू राष्ट्रवाद के सिद्धान्त को पसंद नहीं करती। ज्यादा से ज्यादा वे यही कर सकती हैं कि वे इस 'नए भारत' के सिद्धान्त को सही मान रहीं हैं। भाजपा का यंू अचानक सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभर कर सामने आना केवल कांग्रेस के लिए ही परेशानी का सबब नहीं है बल्कि बहुत सी क्षेत्रीय और राष्ट्रीय पार्टियों के लिए चेतावनी है।

इन छोटी-मोटी पार्टियों को अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए एक मंच पर आना ही होगा और कम से कम 2019 के आम चुनावों से पहले। बहुत से विपक्षी नेता और बुद्धिजीवी अक्सर यह चिंता जताते हुए दिख जाएंगे कि भारत पर फासीवादी और नाजीवादी ताकतें हावी हो रही हैं। भाजपा-संघ को निशाना बनाने के लिए ऐसा कहना उन्हें ठीक लगता होगा लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हम भारत में रहते हैं, जर्मनी, इटली या जापान में नहीं।

भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में कोई भी एकल विचारधारा इतनी प्रभावी नहीं हो सकती कि पूरे उपमहाद्वीप पर ही उसका प्रभाव हो। ना ही यहां ऐसी सरकार चलाई जा सकती है जैसी आपातकाल घोषित कर इंदिरा गांधी ने चलाई थी और उन्हें इसका खमियाजा भुगतना पड़ा। जो लोग हिन्दू-मुस्लिम अलगाववाद की बातें करते हैं और भारत-पाक बंटवारे को इसका प्रतीक बताते हैं, उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि बंटवारा अंग्रेजों की वैश्विक रणनीति का नतीजा था।

राष्ट्रवाद की विचारधारा भी मात्र चुनावी माहौल में एक पार्टी विशेष के वोट बैक बढ़ाने का भावुक हथियार मात्र है। बहुत से लोग इस गलतफहमी में हैं कि पूरा हिन्दू वर्ग संघ-भाजपा के हिन्दूवाद का अनुसरण करता है। परन्तु यह सच नहीं है। विहिप-भाजपा-आरएसएस हिन्दू ब्रांड ही मात्र हिन्दुत्व नहीं है।

यह केवल 30 फीसदी उच्च जाति के हिन्दू या सवर्णों तक ही सीमित है। जब कभी कोई मजबूत ओबीसी या दलित नेता उभर कर सामने आता है, अधिकतर हिन्दू भाजपा का साथ छोड़ कर उस नेता के अनुयायी हो जाते हैं। इसलिए भारत जैसे बहु आयामी देश में हिन्दू राष्ट्रवाद फिलहाल दूर की कौड़ी है।

हालांकि यह भारत के विश्व आर्थिक शक्ति बनने की राह में रोड़ा ही अटकाएगा। जैसा कि इन दिनों गौ हत्या और अवैध बूचडख़ानों को बंद करने से हुआ है। हिन्दू राष्ट्र का सपना ऐसे साकार नहीं होगा। संघ का हिन्दू राष्ट्रवाद दरअसल मुस्लिम शासकों द्वारा हिन्दू समाज के दमन से उपजा विरोध है। परन्तु यह आज भी मतदाताओं का दिमाग बदलने के लिए काफी है। भारतीय संस्कृति, वास्तुकला, खान-पान, वेशभूषा, साहित्य, संगीत, नृत्य सब कुछ हिन्दू-मुस्लिम वर्गों में बंटा हुआ है।

पहले अंग्रेजी हुकूमत, फिर मुसलमानों के संगठन और हिन्दू महासभा ने इन दो वर्गों को बांटने की नाकाम कोशिश की। इस वजह से भारत व पाकिस्तान में दोनों वर्गों में गहरे मतभेद जरूर पनपे। अगर मौजूदा केंद्र सरकार भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाना ही चाहती है तो उसे हिन्दू धर्म और अध्यात्म के उच्च मूल्यों व सिद्धान्तों को अपनाना होगा।

इसका आशय इंसानियत, सार्वभौमिक प्रेम, परस्पर सम्मान और विश्व शांति की ओर अग्रसर होने की कोशिशों से है। इसके लिए हमें एक विशुद्ध बुद्धिजीवी समाज की जरूरत है ताकि स्वस्थ विचार-विमर्श व बहस की जा सके। अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का 'नया भारत' इन्हीं अवधारणाओं पर टिका होगा तो कोई विरोध करने वाला नहीं होगा।

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