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वीजा फैसले: नुकसान में नहीं हैं हम (डॉ. मनन द्विवेदी)

Updated: IST Donald Trump
अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने चुनाव प्रचार के दौरान कहा था कि वे एच-1 बी वीजा में बदलाव करेंगे और अब वे कौशलयुक्त विदेशी कामगारों के लिए इसमें बदलाव करने जा रहे

अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने चुनाव प्रचार के दौरान कहा था कि वे एच-1 बी वीजा में बदलाव करेंगे और अब वे कौशलयुक्त विदेशी कामगारों के लिए इसमें बदलाव करने जा रहे हैं। दूसरी ओर, ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री ने ऑस्ट्रेलियाई नागरिकों के हितों के लिए वीजा कार्यक्रम 457 को रद्द कर दिया है। क्या होंगे भारतीयों पर इसके प्रभाव?

अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने चुनाव प्रचार के दौरान कहा था कि वे 'अमरीका फस्र्ट' यानी पहले अमरीका की नीति पर चलेंगे। वे इसके तहत अप्रवासियों के लिए नीति में बदलाव करेंगे। इसके साथ ही उन्होंने स्थानीय अमरीकी लोगों के रोजगार पर विदेशियों के काबिज होने पर भी चिंताएं जताई थीं। उन्होंने सीधे तौर पर एच-1 बी वीजा में बदलाव की बात भी कही थी। इससे लगता था कि भारतीय लोगों को अमरीका में मिलने वाले रोजगार में कमी आएगी।

चुनाव प्रचार के दौरान वे अपने कामकाज और फैसलों को लेकर काफी कठोर भी लग रहे थे। ऐसा समझा जा रहा था कि वे अपने पूर्ववर्ती राष्ट्रपति बराक ओबामा की नीतियों के विपरीत जाएंगे। लेकिन, देखने में आ रहा है कि अप्रवासी नीति को लेकर वे चुनाव प्रचार के दौरान कही गई अपनी बातों में विनम्रता के साथ बदलाव कर रहे हैं। वे पूर्ण रूप से तो नहीं लेकिन धीरे-धीरे बराक ओबामा की नीतियों की ओर ही लौट रहे हैं, विशेषतौर पर एच-1बी वीजा के संदर्भ में तो ऐसा ही कहा जा सकता है। दरअसल, उन्हें एक बात समझ में आ गई है कि उनका बहुत बड़ा मतदाता वर्ग अमरीका में रहने वाले भारतीय मूल के लोग हैं। उन्हें नाराज करने का जोखिम वे लेना नहीं चाहते होंगे।

निस्संदेह स्थानीय अमरीकियों के लिए अमरीका फस्र्ट की नीति बहुत ही लुभावनी कही जा सकती है। लेकिन, अब शायद उन्हें यह बात समझ में आ रही होगी कि अकुशल लोगों को रोजगार में उतनी परेशानी नहीं है। साथ ही अमरीका को अपने ही देश में अब भी कौशलयुक्त कामगारों की आवश्यकता है। ये कौशलयुक्त कामगार उसे दक्षिण एशिया विशेषतौर पर भारत से मिलते रहे हैं। उल्लेखनीय है कि अमरीका विदेशी पेशेवरों को एच-1बी वीजा जारी करता रहा है।

हर साल वह लाखों लोगों को एच-1बी वीजा जारी करता है। यह वीजा उच्च शिक्षा प्राप्त लोग जैसे डॉक्टरों, इंजीनियरों, कंप्यूटर सॉफ्टवेयर तैयार करने वाले पेशेवरों आदि के लिए जारी किया जाता रहा है। जब-जब एच-1बी वीजा में परिवर्तन की बात होती थी तब-तब ऐसे ही कामगारों के रोजगार में कमी की आशंका बन जाती थी। लेकिन, अब बदलाव कौशलयुक्त विदेशी कामगारों के लिए किया जा रहा है। इससे तो भारतीयों को लाभ ही होगा।

स्थानीय अमरीकियों को इससे किसी किस्म के नुकसान की आशंका भी नहीं है। एक अन्य बात यह भी रही है कि विदेशों में डोनाल्ड ट्रम्प की निजी स्वीकार्यता बनने में कठिनाई हो रही थी। इस छवि के मद्देनजर भी यह फैसला लिया गया होगा। कुल मिलाकर एच-1बी वीजा में बदलाव का लाभ भारतीय कौशलयुक्त कामगारों को मिलने वाला है।

जहां तक दक्षिण एशिया मे एक विशेष समुदाय को ं अमरीका नहीं आने देने की बात थी, तो कौशलयुक्त कामगारों की बात को रखककर, पर्याप्त जांच भी वे कर सकेंगे। जहां तक ऑस्ट्रेलिया द्वारा वीजा कार्यक्रम 457 में बदलाव की बात है तो यह भी 'ऑस्ट्रेलिया फस्र्ट' यानी ऑस्ट्रेलिया पहले की नीति के तहत ही लिया गया है। चूंकि वहां के प्रधानमंत्री मैल्कम टर्नबुल कुछ दिनों पहले भारत आए थे और उन्होंने शिक्षा, सुरक्षा, आतंकवाद आदि पर समझौते भी किए थे।

ऐसे में उनसे यह उम्मीद नहीं की जा सकती थी कि वे अचानक वीजा कार्यक्रम 457 को रद्द कर देंगे और इसीलिए लग रहा है कि यह फैसला भारत के लिए ठीक नहीं है। लेकिन, ध्यान दें, उन्होंने इस वीजा कार्यक्रम को रद्द करने के साथ ही कहा कि ऑस्ट्रेलियाई नागरिकों को रोजगारों को प्राथमिकता देने के उद्देश्य से विदेशी कामगारों के लिए यह वीजा कार्यक्रम रद्द किया जा रहा है। उन्होंने इस वीजा कार्यक्रम के स्थान पर नया वीजा कार्यक्रम लाने की बात भी कही है।

समझा यह भी जाता है कि न्यूजीलैंड भी इसी तरह का कदम उठा सकता है। लेकिन, बहुत निराश होने की बात नहीं है। चार साल के लिए जारी होने वाले इस वीजा कार्यक्रम के तहत 30 सितंबर 2016 तक ऑस्ट्रेलिया में करीब 95 हजार लोग ही पहुंचे थे। सबसे अधिक भारतीयों को यह वीजा जारी किया जाता है।

भारतीयों के बाद ब्रिटेन और चीन के लोगों का नंबर आता है। यह वीजा कामकागारों के साथ पढ़ाई करने वालों खासतौर पर प्रबंधन, इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने वालों द्वारा इस्तेमाल किया जाता है। भारतीयों को इस वीजा के रद्द होने से नुकसान तो होगा लेकिन यह बहुत बड़ा नुकसान नहीं होगा। आमतौर पर वहां पढ़ाई करने जाने वालों में द्वितीय या तृतीय स्तर के विद्यार्थी ही होते हैं। प्रथम स्तर के विद्यार्थियों के लिए तो वहां के मुकाबले भारत ही शिक्षा के लिहाज से बेहतर स्थान माना जाता है।

जिन विद्यार्थियों को भारतीय शिक्षण संस्थानों में प्रवेश नहीं मिल पाता और जो विदेश में रहकर खर्च उठाने में सक्षम होते हैं, ऐसे विद्यार्थी वहां पढऩे और रहने के उद्देश्य इस वीजा का इस्तेमाल किया करते थे। बाद में वे वहीं पर नौकरी भी तलाशते थे। नया वीजा कार्यक्रम आने तक भारतीयों के लिए अन्य देशों में जाकर पढ़ाई और काम तलाशने का विकल्प तो खुला ही रहने वाला है। ज्यादातर भारतीय इस कार्यक्रम के तहत वीजा लेने की बजाय अन्य देश में जाने का विकल्प ही तलाशेंगे।

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