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कश्मीरी युवाओं में जगाएं विश्वास

Updated: IST Kashmir
कश्मीर में हालात फिर खतरे के संकेत दे रहे हैं। सड़कों पर पत्थरबाजी और सुरक्षा बलों के साथ स्थानीय युवकों का

कश्मीर में हालात फिर खतरे के संकेत दे रहे हैं। सड़कों पर पत्थरबाजी और सुरक्षा बलों के साथ स्थानीय युवकों का हिंसक आमना-सामना हो रहा है। कुछ समय तक कश्मीर में 'शांतिÓ के दौर के बाद इस प्रकार की वारदातों का सामने आना निश्चय ही चिंताजनक है। भारतीय थल सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत ने बयान दिया है कि पाकिस्तानी अथवा आईएस के झंडे फहराने वाले और सेना की कार्रवाई में बाधा उत्पन्न करने वाले युवकों को कड़ाई से निपटा जाएगा।

बेशक, सैन्य प्रमुख का बयान भारतीय अखंडता और एकता का द्योतक है। लेकिन मैं इस बहस को थोड़ा और आगे ले जाना चाहता हूं। दूसरे शब्दों में कहें तो आखिरकार कश्मीर में ऐसे हालात क्यों बने कि युवकों को सड़कों पर पत्थरबाजी के लिए उतरना पड़ता है। आप इसकी दो प्रकार से व्याख्या कर सकते हैं पहली-पूर्वाग्रह से और दूसरी व्यावहारिक। पूर्वाग्रह वाली व्याख्या में मैं ज्यादा नहीं जाना चहता हूं। मेरा विश्वास है कि भारतीय होने के नाते हम व्यावहारिक व्याख्या की विवेचना करें।

ये हम सभी के लिए एक बेहतर समाधान होगा। कश्मीर में आज युवाओं के पास संचार के हर प्रकार से साधन उपलब्ध हैं, ये भटकाव भी पैदा करता है। इसका कारण है कि आज कश्मीर में युवा प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से विरोध प्रदर्शनों में शामिल हो जाता है। युवाओं के इस भटकाव को रोकने के लिए क्या उपाय किए गए हैं? जम्मू-कश्मीर में राज्य सरकार की ओर से युवाओं को रोजगार के अवसर जरूर मुहैया कराए जा रहे हैं, लेकिन अब भी बहुत कुछ किए जाने की जरूरत है। रोजगार के अवसर मुहैया कराने से युवाओं में भटकाव की स्थिति से बचा जा सकेगा। आज भी कई एम्पायमेंट सेंटरों में युवाओं का नामोनिशान नजर नहीं आता है। युवाओं में विश्वास जगाने की जरूरत है।

आज के हालात ऐसे हैं कि युवाओं में सैन्य बलों की गोली के सामने आने की परिपाटी बढ़ रही है। आखिरकार कौन अपनी जान जोखिम में डाल कर ऐसे प्रदर्शनों में शामिल होता है? निश्चय ही पत्थरबाजी और प्रदर्शनों में शामिल युवाओं का एक बड़ा तबका ऐसा है जो किसी न किसी तरह से सेना अथवा दूसरे शब्दों में कहें तो सुरक्षा बलों की ज्यादातियों का शिकार रहा है। मैं आपको बता सकता हूं कि प्रदर्शनों में शामिल कई युवा यतीम हैं। उनके परिजन मारे जा चुके हैं। ऐसे में उनमें सुरक्षा बलों के खिलाफ गुस्सा भरा हुआ है। जहां तक बात होती है कि कश्मीरी युवा 500-500 रुपए की दिहाड़ी पर पत्थरबाजी करता है तो मैं इसे सरासर ध्यान भटकाने वाली बात कहता हूं।

आप ही बताएं क्या कोई युवा इतना नासमझ हो सकता है कि मात्र 500 रुपए की खातिर अपनी जान को जोखिम में डाले। ये बात इसलिए कही जाती है कि कश्मीरी युवाओं के इस भटकाव के असल कारण नहीं खोजे जाते हैं। मैं आपको दावे से कह सकता हूं कि कश्मीर के युवा देश के किसी भी अन्य हिस्से से कम प्रतिभावान नहीं हैं। कश्मीरी युवा देश की सिविल सेवा परीक्षाओं में लगातार परचम फहरा रहे हैं। बॉलीवुड और स्पोट्र्स के क्षेत्र में भी कश्मीरी युवा पीछे नहीं हैं। ऐसे में हमें इस बात पर और भी ध्यान देना होगा कि युवाओं में और कैसे विश्वास कायम किया जाए। भारतीय सेना की ओर से सद्भावना कार्यक्रम संचालित किए जाते हैं, मेरा मानना है कि इससे भी सेना और युवाओं के बीच गलतफहमियां दूर होती हैं। लेकिन इस दिशा में और प्रयास करने की जरूरत है। क्योंकि गलतफहमियों के कारण आपसी विश्वास में कमी आती है।

बाहरी चुनौतियों का मुंहतोड़ जवाब दने में सेना की भूमिका से किसी को इनकार नहीं है लेकिन राज्य के प्रशासन में सेना की भूमिका को निश्चय ही कम किया जाना चाहिए। मेरे हिसाब से इस बात से किसी को आपत्ति भी नहीं होनी चाहिए। आखिरकार, राज्य में चुनी हुई सरकार को ही प्रशासन की बागडोर संभालनी चाहिए। हमें ये बात भी अच्छी तरह से समझ लेनी चाहिए कि हुर्रियत जैसे अलगाववादियों की कश्मीरी युवाओं में कोई पकड़ नहीं है। हुर्रियत के 'हड़ताल कलेंडरÓ को अब कश्मीर में कोई तवज्जो नहीं मिलती है। युवाओं में हुर्रियत जैसे अलगाववादी संगठनों के प्रति आ रही दूरियों का फायदा उठाना होगा। कश्मीर में साझा संस्कृति आज भी हम देख सकते हैं।

अमरनाथ यात्रा के दौरान स्थानीय कश्मीरियों की ओर से लंगर लगाए जाते हैं, लेकिन ये सब बातें हमारे राष्ट्रीय मीडिया में सुर्खियां नहीं बनती हैं। मीडिया केवल पत्थरबाजी की घटनाओं को ही मुखरता से दिखाता है। हम सभी को इस एकरसता को खत्म कर तस्वीर के दोनों पहलूओं को दिखाना होगा।

बहरहाल, हमें इस प्रकार के साझा प्रयास करने होंगे कि कश्मीरी युवाओं को अमन के रास्ते पर लाया जाए। उनकी समस्याएं चाहे वे राजनीतिक हों या फिर सुरक्षा बलों से जुड़ीं, सभी का मिल बैठकर समाधान करना होगा। कड़ाई की बातें करना सैन्य तरीका हो सकता है लेकिन इससे दूरियां बढऩे का खतरा रहता है। आखिरकार, जम्मू-कश्मीर देश का अभिन्न अंग है। सभी राज्य भारत की संतान के समान है। क्या कोई भी अभिभावक क्या किसी राज्य रूपी संतान से सौतेला व्यवहार करता है? निश्चय ही नहीं।

मलिक समीद वरिष्ठ पत्रकार

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