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भोले बाबा का घर है कैलास मानसरोवर, इन तीर्थस्थलों के भी होते हैं दर्शन, ऐसे करें यात्रा

Updated: IST Kailash Mansarovar
कैलास-दर्शन में भक्त से भगवान के साक्षात्कार के भावात्मक मौन तार प्रत्यक्ष जुड़ जाते हैं

भोले बाबा का संसार निराला है- जहां प्रेम भक्ति की गाढ़ी धूप-छाया है। भारत की आध्यात्मिक-सांस्कृतिक धरोहर के साथ दैविक ऊर्जा के अमृत-कलश का अद्वितीय स्रोत है कैलास। उसी से शाश्वत चरित्र के मानक बनते हैं। मां पार्वती के आह्लादनी शक्ति की छाया है वहां। हमारे अंतर्मन के अन्तर्चक्षुओं में बसा है यह दिव्य लोक। ऐसे दिव्य लोक में भला कौन नहीं जाना चाहेगा।

यात्रा मन-मन की उड़ान जो ठहरी। शिव यदि हैं, तभी उनका आमंत्रण है। भला बिन बुलाए गया है कोई देवताओं के समीप? वे बुलाते हैं, तभी हम जाते हैं या पूर्व जन्म के कर्मफल ले जाते हैं। कैलास-मानसरोवर भौगोलिक दृष्टि से तिब्बत में स्थित है। इस भू-भाग पर अभी चीन का कब्जा है।

कैलास-मानसरोवर यात्रा बहुत विकट एवं चुनौती पूर्ण है। भोले के संसार के निरखने का स्वर्णिम अवसर होता है, इसलिए हर क्षण मार्ग के अनुरूप जो चाहिए, वह रखना पड़ता है। जैसे ऊनी मोजे, गर्म कपड़े, टोपी, टार्च, कैमरा, आवश्यक दवाइयां, सूखे मेवे, नेपाल, चीन, तिब्बत की मुद्रा। आजकल प्राइवेट कंपनियां टूर आयोजित करती हैं। उत्तराखण्ड का मार्ग भी अनुमोदित है पर यह काठमाण्डू वाला मार्ग है। दिल्ली से काठमाण्डू जहाज से जाना पड़ता है।

प्राइवेट कंपनियां काठमाण्डू दर्शन के बाद चीन सीमा तक डीलक्स बस तथा चीन से माइग्रेशन चैक के बाद अनुमोदित वाहन में ले जाती हैं। पासपोर्ट वीसा की अवधि निर्धारित होती है। वे धूलीखेड़ी, नगरकोट, कोदारी नायलम, सागा, प्रयांग चुम्बुक, जग्मू (चीन-तिब्बत सीमाओं) से होते हुए आस्था के द्वार के प्रथम चरण मानसरोवर झील के तट पहुंचते हैं। यहां तक की यात्रा तीन-चार दिन की है। 15000 फीट की ऊंचाई पर स्थित मानसरोवर झील 54 मी तक विस्तार लिए हुए शिव के चरणों को आज भी प्रक्षालित कर स्वयं को धन्य मान रही है। झील के समीप नन्हे राजहंस कतार में जलक्रीड़ा करते रहते हैं, ऐसा प्रतीत होता है शिव ने सरोवर की स्वच्छता का दायित्व नन्हें सिपाहियों पर सौंपा है।

श्रद्धालु मानस की परिक्रमा के बाद स्नान कर तन-मन की मलिनता को नष्ट कर यज्ञ-हवन कर असीम सत्ता से जुड़ व्यष्टिपरकता से विलग हो समष्टिपरक भाव लिए कुछ समय के लिए परमचेतना से जुड़ जाते हैं। शायद वही अवस्था उनके लिए शून्य से शिखर तक पहुंचने वाली अवस्था है। परमात्मा से एकाकार होता है। उस दिव्य क्षण में अन्तर्मन की मलिनता नष्ट हो जाती है। मानसरोवर झील में तीन दिन रुकने के बाद सभी दारचीन बैसकैम्प पहुंचते हैं। दारचीन से 45 किलोमीटर की दूरी पर 'अष्टापद' नाम महातीर्थ है, जहां जैनधर्म के प्रवर्तक आदिनाथ कैवल्य स्थान है। चारों ओर अमृतमयी जलधारा कैलास को निहारते आदिनाथ!

अद्भुत प्रेम-वैराग्य का संगम स्थल है अष्टापद। दारचीन से 15 किलोमीटर की दूरी पर 'यमद्वार' स्थित है। कहते हैं कि कैलास की पैदल परिक्रमा के दौरान यहां से निकलो तो मृत्यु का भय नहीं रहता। यहां से दस पद्रंह किलोमीटर दूरी पर से कैलास पर्वत की परिक्रमा प्रारम्भ होती है। पहले दिन का पड़ाव 'देरापुक' तक होता है। यहां से कैलास को अत्यन्त समीप से निहार पाते हैं। गगन तले स्वत: निर्मित उत्तुंग शैल-शिखर पर एक शिवलिंग आकृति, शीर्ष पर शोभायमान है- श्वेत कमल सदृश तुषार किरीट। उत्तर दिशा की ओर उन्मत्त भाल किए कैलास के चूड़ा स्वरूप दीर्घ शैल अत्यन्त आकर्षक है। अकस्मात उठती हुई विशाल गुम्बदाकार शिव जटा सदृश कैलास के शरीर से निकलती जलधाराएं भक्ति रस में सराबोर करती हैं।

दूसरे दिन 'डोलमाला दर्रा' से गुजरना होता है। सागर तल से लगभग 17500 फीट ऊंची-नीची पर्वत श्रेणियों घाटियों से होते हुए 'झुटुलपुक' पहुंचना होता है। ऑक्सीजन की अत्यन्त कमी एवं खतरनाक उतराई-चढ़ाई के कारण सभी श्रद्धालु नहीं जा पाते। कैलास-दर्शन का सबसे निकटस्थ स्थान है यह। जहां भक्त से भगवान के साक्षात्कार के भावात्मक मौन तार प्रत्यक्ष जुड़ जाते हैं। भोले की कृपा दृष्टि जिस पर पड़ जाए, वह साक्षात् शिवालय, देवलोक में अपना स्थान पा लेता है। 15 किलोमीटर की उतराई पर गौरी कुण्ड स्थित है। किंवदन्ती है कि प्रतिदिन प्रात: मां पार्वती यहां स्नान करने आती हैं। यहां का जल नीला एवं अत्यन्त पवित्र है।

तीसरे दिन की यात्रा 'झुटुलपुक' से दारचीन लौटने की है। कैलास मानसरोवर की कुल यात्रा लगभग 12-15 दिन की होती है। लौटते में पुन: उन्हीं चीन-तिब्बत के शहरों-वादियों से काठमाण्डू तक लौटना और फिर दिल्ली। कैलास-दर्शन मानव जीवन के आस्था के द्वार खोल समष्टिपरक भावना, उदात्त चेतना प्रदान करता है। सत्यं, शिवं, सुन्दरम का दीप प्रज्ज्वलित कर देश-समाज-राष्ट्रकल्याण की ओर उन्मुख करता है। आओ! शिवरात्रि पर कैलासनगरी न पहुंच पाए तो क्या हुआ, अपने अन्दर के शिवत्व को जगाकर देवलोक के आधार शिखर को स्पर्श का भावात्मक मौका क्यों छोड़ें। शिव का द्वार हमारे लिए सदैव खुला है। उस अमृत तत्व को प्रयास कर देश के कल्याण की बातें सोचें।

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