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51 शक्ति पीठों में से एक है सिद्ध शक्तिपीठ मां महामाया, दर्शन मात्र से होते हैं सारे काम

Updated: IST mahamaya temple ratanpur
ऐतिहासिक मंदिरों व तालाबों से परिपूर्ण इस पावन धरा में आदि शक्ति मां महामाया सैकड़ों वर्षों से विराजमान है

रतनपुर की पावन माटी में वह सब चीज विद्यमान है, जो एक पवित्र जगह में होती है। ऐतिहासिक मंदिरों व तालाबों से परिपूर्ण इस पावन धरा में आदि शक्ति मां महामाया सैकड़ों वर्षों से विराजमान है। अनेक देवी-देवताओं के बीच मां महामाया मंदिर की खास विशेषता है। सालभर भक्तों का आना-जाना लगा रहता है। लेकिन नवरात्रि में देवी भक्तों की लालसा होती है कि वे एक बार जरूर माता के दरबार में मत्था टेकें। यही लालसा उन्हें माता के दरबार ले आती है।

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इस मंदिर को विश्व के 52 शक्ति पीठों में से एक माना जाता है। बिलासपुर से 25 किलो मीटर की दूरी पर स्थित रतनपुर नगरी में मां महामाया मंदिर है। इस मंदिर की प्रसिद्धि सिर्फ देश में ही नही विदेशों में भी है। मंदिर की मूर्ति भी दुर्लभ मानी जाती है। रेवाराम समिति के सदस्य शुकदेव कश्यप ने बताया कि यहां की प्रतिमा जैसी प्रतिमा दूसरी नहीं है। इसमें श्री महालक्ष्मी और श्री सरस्वती विराजमान है। इस मंदिर की निर्माण शैली प्राचीन वास्तु के अनुसार है।

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शारदीय नवरात्रि व चैत्र नवरात्रि में यहां भक्तों का रेला अपनी मनोकामनाओं को पूरा करने माता के दरबार में अर्जी लगाने पहुंचता है। इसके साथ ही यहां विदेशी पर्यटक खासतौर पर आते है। इस बार 29 हजार से अधिक मनोकामना ज्योतिकलश प्रज्ज्वलित किए जांएगे। मंदिर की प्रसिद्धि इतनी अधिक है कि यहां विदेशों से भी भक्त ऑनलाइन ज्योतिकलश के लिए बुकिंग कर रहे है।

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मंदिर का इतिहास

मंदिर का निर्माण रतनपुर राज्य के प्रथम कल्चुरि राजा रत्नदेव प्रथम ने 11वीं शताब्दी में वास्तुकला को ध्यान में रखते हुए कराया था। मंदिर 18 इंच मोटी परिधि की दीवार से घिरा हुआ है। मूर्तियों और रूपांकनों का प्रयोग किया गया। है। यह मंदिर मुख्य रूप से नागर शैली में बना है। राजा पृथ्वीदेव ने मंदिर का निर्माण कराया और राजा बहारसाय ने चार स्तंभों का निर्माण कराया। इस मंदिर के निर्माण के पीछे कई किवदंतियां है। माना जाता है कि मां सती की देह खंडित होने के बाद धरती के अलग-अलग हिस्सों में गिरी थी। उनका दाया स्कंद जहां गिरा वह महामाया मंदिर स्थल माना जाता है।

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