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पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री सुरजीत सिंह बरनाला का निधन

Updated: IST Surjeet Singh Barnala
बरनाला को अस्वस्थ होने पर हाल ही में चंडीगढ़ के पोस्ट गै्रजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल रिसर्च (पीजीआईएमईआर) में भर्ती कराया गया था

चंडीगढ़। पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री और तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश व उत्तराखंड के राज्यपाल रह चुके सुरजीत सिंह बरनाला का शनिवार को निधन हो गया। वह 91 वर्ष के थे। सन् 1985-1987 के बीच पंजाब के मुख्यमंत्री रह चुके बरनाला को अस्वस्थ होने पर हाल ही में चंडीगढ़ के पोस्ट गै्रजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल रिसर्च (पीजीआईएमईआर) में भर्ती कराया गया था, जहां शनिवार को उन्होंने अंतिम सांस ली। साल 2001 और 2011 के बीच बरनाला तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश तथा उत्तराखंड के राज्यपाल रहे।

दफनाने से रिश्तेदार नाराज, हिंदू रीति से फिर अम्मा का अंतिम संस्कार

मंद्या। तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता को मोक्ष दिलाने के लिए उनके रिश्तेदारों ने 10 दिनों के अंदर ही उनका दोबारा अंतिम संस्कार किया। दिवंगत जयललिता का अंतिम संस्कार इस बार हिंदू रीति-रिवाजों से किया गया। रिश्तेदारों का मानना है कि जयललिता को मोक्ष नहीं मिलेगा क्योंकि उनके पार्थिव शरीर को जलाने की जगह दफनाया गया।

हिंदू रीति रिवाज से जयललिता के रिश्तेदारों ने किया अंतिम संस्कार

मोक्ष दिलाने के लिए ही हिंदू रीति-रिवाजों से कावेरी नदी के तट पर अंतिम संस्कार किया गया। जयललिता के निधन के बाद दूसरी बार उनका दाहसंस्कार किया गया। मुख्य पुजारी रंगनाथ लंगर ने दाह संस्कार की रस्में पूरी करवाईं। दाह संस्कार में जया के शव की जगह एक गुडिया को उनकी जगह रखा गया। पुजारी रंगनाथ ने कहा कि इस संस्कार से जया को मोक्ष की प्राप्ति होगी। संस्कार से जुड़े कुछ और कर्म अभी बाकी हैं, जो अगले पांच दिन तक पूरे किए जाएंगे।

मेरी बहन हिंदू थी, पार्टी ने उन्हे दफनाया क्यों?

जयललिता के सौतेले भाई वरदराजू ने दोबारा अपनी बहन का हिंदू रीति रिवाजों से अंतिम संस्कार किया। वरदराजू ने सारी रस्में निभाई। वरदराजू ने कहा कि पार्टी को जयललिता की मान्यताओं का सम्मान करना चाहिए था। क्या मेरी बहन नास्तिक थीं? क्या वह हिंदू त्योहारों और मान्यताओं को नहीं मानती थीं? क्यों उनकी पार्टी ने उन्हें दफनाने का फैसला किया? वरदराजू ने पार्टी पर आरोप लगाते हुए ये भी कहा कि उनके अंतिम संस्कार से हम लोगों को दूर क्यों रखा गया। जयललिता के मैसूर और मेलूकोटे वाले भतीजों ने भी रस्मों में हिस्सा लेकर दुख व्यक्त किया। वे वरदराजू के साथ दाह संस्कार में शामिल रहे। बता दें कि जयललिता की करीबी दोस्त शशिकला ने ही उनकी सारी आखिरी रस्मों को पूरा किया। इसमें किसी रिश्तेदार को शामिल नहीं किया गया। शशिकला ने यह संदेश देने का प्रयास किया था कि जयललिता की राजनीतिक विरासत पर उनका अधिकार है।

जयललिता को दफनाने के पीछे थी ये वजह

जयललिता के करीबी लोगों के अनुसार अम्मा किसी जाति और धार्मिक पहचान से परे थीं, इसलिए पेरियार, अन्‍ना दुरई और एमजीआर जैसे ज्‍यादातर बड़े द्रविड़ नेताओं की तरह उनके पार्थिव शरीर को भी दफनाए जाने का फैसला किया गया। इसी के साथ बड़े द्रविड़ नेताओं को दफनाए जाने की एक वजह यह भी थी कि वे घोषित तौर पर नास्तिक थे। नास्तिकता द्रविड़ आंदोलन की एक अहम पहचान थी, जिसने ब्राह्मणवाद को खारिज किया। द्रविड़ नेता सैद्धांतिक रूप से ईश्‍वर और अन्य प्रतीकों में यकीन नहीं रखते। इस तरह द्रविड़ आंदोलन के बड़े नेताओं को दफनाए जाने की परंपरा को जयललिता ने आगे बढ़ाया। ऐसी मान्यताएं भी हैं कि दफनाए जाने के बाद नेता अपने समर्थकों के बीच एक स्मारक के तौर पर हमेशा मौजूद रहते हैं। जयललिता की समाधि एक राजनीतिक प्रतीक बन जाएगी। उनके जन्मदिवस, पुण्यतिथि और पार्टी की स्थापना दिवस के मौके पर समर्थक उनके समाधि स्थल पर जा सकेंगे।

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