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भगवान शिव के पसीने से हुई थी वास्तुदेव की उत्पत्ति, बन गए गृह के राजा

Updated: IST Vastu Dev, Vastusastra
हमारे देश के ऋषि-मुनियों व विद्वानों ने पाया कि वास्तु अनुरूप भवन में रहने से कई लाभ है तब जन-सामान्य के लिए वास्तु देवता की कल्पना की गई ताकि वास्तुशास्त्र के नियमों का पालन कर मानव सुखद एवं सरल जीवन व्यतीत करें।

रायपुर. हमारे देश के ऋषि-मुनियों व विद्वानों ने पाया कि वास्तु अनुरूप भवन में रहने से कई लाभ है तब जन-सामान्य के लिए वास्तु देवता की कल्पना की गई ताकि वास्तुशास्त्र के नियमों का पालन कर मानव सुखद एवं सरल जीवन व्यतीत करें। वास्तु देवता जो कि, एक भूखंड पर निर्मित भवन का अधिष्ठाता होते हंै। वास्तुशास्त्र के प्राचीन ग्रन्थों में वास्तुपुरुष की उत्पत्ति के सन्दर्भ में कईं कथाएं प्रचलित हैं। इनमें सबसे ज्यादा प्रचलित कथा विश्वकर्मा द्वारा कही गई है, जो इस प्रकार है।

विश्वकर्मा ने कहा संसार के कल्याण की इच्छा से वास्तुशास्त्र को कहता हूं । त्रेतायुग में एक महाभूत जन्मा था, जिसने अपने सुप्त शरीर से समस्त भुवन को आच्छादित कर दिया था। उसे देखकर इंद्र सहित सभी देवता विस्मित और भयभीत होकर ब्रह्माजी की शरण में गए और बोले-'हे भूतभावन! हे भूतेश, लोकपितामह ! महाभय उपस्थित हुआ है, हम लोग कहां जाए क्या करें?

ब्रह्माजी बोले-'हे देवगण ! भय मत करो । इस महाबली को पकड़कर भूमि पर अधोमुख गिराकर तुम लोग निर्भय हो जाओगे। इसके बाद देवगण क्रोध से संतप्त होकर उस महाबली भूत को पकड़कर धरती पर अधोमुखी गिराया तो वह वहीं स्थित हो गया। इसे समर्थ बह्माजी ने वास्तुपुरुष की संज्ञा दी है।

इस तरह तीन-चार प्रकार की भिन्न-भिन्न कथाएं वास्तु पुरुष के उत्पत्ति के सन्दर्भ में वास्तु ग्रन्थों में वर्णित हैं। कुछ का कहना है भगवान शिव के पसीने से वास्तुदेव की उत्पत्ति हुई थी। सभी कथाओं का सार यह है कि प्रत्येक भू-खण्ड में जीवन शक्ति होती है, अत: उसके सभी भाग (अंगों) को पूर्णत: रखने और भू-खण्ड को स्वच्छ, साफ व व्यवस्थित रखने से 'वास्तु पुरुषÓ नाम की यह प्राण ऊर्जा उसमें हमेशा व्याप्त रहेगी। भू-खण्ड में वास्तु सिद्धान्तों अनुकूल भवन निर्माण से उसमें रहने वाले सुखद एवं सरल जीवन व्यत्तीत कर सकेंगे।

अंग अधिष्ठाता बने

मत्स्यपुराण के अनुसार वास्तु पुरुष के 45 अंगों को 45 देवताओं ने दबा के रखा था और प्रत्येक अंग पर एक-एक देवता बैठ गए और उसी अंग अधिष्ठाता बन गए। किसी भी भूखण्ड पर चारदीवारी बन जाती है तब वह एक वास्तु कहलाता है। किसी भी भू-खण्ड के छोटे-से टुकड़े को यदि चारदीवारी बनाकर अलग किया जाता है तो उसमें वह सभी तत्व व ऊर्जा पाई जाती है जो एक बड़े भू-खण्ड में होती है। यानी एक चारदीवारी के भीतर स्थित छोट से छोटा भू-खण्ड भी सम्पूर्ण पृथ्वी का एक छोटा-सा रूप ही है। वास्तुपुरुष उस भूखण्ड पर निर्मित भवन का अधिष्ठाता होता है, जिसका

मुंह उत्तर-पूर्व के मध्य ईशान कोण में स्थित रहता है। यदि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखे यही दिशाएं सूर्य की प्रात:कालीन जीवनदायी ऊर्जा होती है, जिसे वह अपने आंख, नाक, मुंह के माध्यम से प्राप्त करता है।

इसीलिए उत्तर-पूर्व का भाग ईशान कोण को अधिक खुला रखा जाता है ताकि इसके शुभ परिणाम मिल सके। वायव्य कोण में वास्तु पुरुष का बांया हाथ होता है। बांया हाथ के पास ही हृदय होता है। इस वायव्य कोण से हृदय को क्रियाशील रखने के लिए आक्सीजन मिलती रहती है। आग्नेय कोण तरफ वास्तु पुरुष का दांया हाथ होता है, जहां से वह उर्जा प्राप्त करता है और दक्षिण नैऋत्य कोण में इसके पैर होते हैं, उसे बंद रखा जाता है ताकि विभिन्न कोणों से मिलने वाली ऊर्जा संग्रहित हो सके।

- पं देवनारायण शर्मा

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