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...आखिर बस्तर पुलिस जनता के भरोसे के लिए ऐसा क्यों नहीं करती?

Updated: IST raipur police
11 साल की सानिया को एक दिन का इंस्पेक्टर बनाकर उसके सपनों में रंग भरने की पहल से छत्तीसगढ़ पुलिस का मानवीय चेहरा दिखा है।

जिनेश जैन/रायपुर. ग्यारह साल की सानिया को एक दिन का इंस्पेक्टर बनाकर उसके सपनों में रंग भरने की पहल से छत्तीसगढ़ पुलिस का मानवीय चेहरा दिखा है। महत्वपूर्ण इसलिए भी है, 11 साल की सानिया आँखों से देख नहीं सकती, दोनों किडनी खराब है। लेकिन, उसका सपना पुलिस में भर्ती होकर देश की सेवा करने का रहा। रायपुर आईजी प्रदीप गुप्ता ने इस सपने को, चाहे एक दिन ही सही, पूरा कर उसके मासूम चेहरे पर मुस्कराहट ला दी।

पुलिस की ऐसी कोई भी पहल उसके जनता से दोस्ताना और संवेदनशील संबंधों को मज़बूत करती है। जनता से संबंधों को लेकर पुलिस को जब लगातार कठघरे में खड़ा किया जाता रहा हो, तब पुलिस की यह पहल सभी को सुकून देती है। पुलिस का जनता के प्रति ऐसा मानवीय व्यवहार हमेशा कायम क्यों नहीं रह सकता? क्यों वह जनता में रक्षक के बजाय विलेन की भूमिका में दिखाई देती है? पुलिस का ध्येय वाक्य रहा है, जनता में विश्वास और अपराधियों में खौफ। लेकिन, उसके कार्य करने की शैली जनता से लगातार दूरी बना रही है। उसके प्रति अपराधियों से अधिक जनता में खौफ पैदा हो रहा है।

छत्तीसगढ़ में पुलिस की कार्यशैली को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। बस्तर में स्थिति ज्यादा भयावह है। नक्सल उन्मूलन के नाम पर भोले-भाले आदिवासियों को मुठभेड़ में मारने और महिलाओं से यौन प्रताडऩा की शिकायतें छत्तीसगढ़ पुलिस को कलंकित करती है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के हाल ही में बीजापुर में आदिवासी महिलाओं से जवानों की ज्यादतियों पर संज्ञान से तो राष्ट्रीय स्तर पर हमारा सिर शर्म से झुका है। इससे ज्यादा गंभीर क्या हो सकता है, जब खुद मुख्यमंत्री डॉ.रमन सिंह को कलक्टर-एसपी कॉन्फे्रंस में पुलिस अफसरों से कहना पड़ा, पुलिस कानून तोड़े, यह बर्दाश्त नहीं हो सकता। लेकिन, बस्तर से जिस तरह गंभीर शिकायतें आ रही हैं, उसमें सिर्फ कहनेभर से ही काम नहीं चलेगा।

जनता का भरोसा जीतने के लिए सरकार को उन अधिकारी-कर्मचारियों को पुलिस से बाहर का रास्ता दिखाना होगा, जिनकी वर्दी पर दाग लगे हैं। देर से ही सही, दागी आईजी राजकुमार देवांगन को अनिवार्य सेवानिवृत्ति देकर घर रवाना करने का कदम सराहनीय है। पुलिस के सभी अधिकारियों को भी यह समझना होगा, बेकसूर जनता को गोलियों से भून कर बस्तर में कभी हम नक्सल उन्मूलन का लक्ष्य प्राप्त नहीं कर सकते। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए जनता को भरोसे में लेना होगा। इसके लिए पुलिस का चेहरा जनता के प्रति दोस्ताना और संवेदनशील होना बेहद जरूरी है। रायपुर में जब पुलिस का चेहरा संवेदनशील दिख सकता है, तब बस्तर में क्यों नहीं?

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