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यहां संक्रांति पर हुई थी आजादी की लड़ाई, वीर सपूतों ने दी थी कुर्बानी

Updated: IST raisen makar sankranti
अंग्रेजों से देश को आजाद कराने के लिए क्रांतिकारियों ने लंबी लड़ाई लड़ी और सैकड़ों ने अपनी जान देश के नाम कुर्बान की। 1947 में देश आजाद हुआ। लेकिन इसके बाद भी कहीं आजादी की जंग जारी रही।

प्रवीण श्रीवास्तव.भोपाल/रायसेन
अंग्रेजों से देश को आजाद कराने के लिए क्रांतिकारियों ने लंबी लड़ाई लड़ी और सैकड़ों ने अपनी जान देश के नाम कुर्बान की। 1947 में देश आजाद हुआ। लेकिन इसके बाद भी कहीं आजादी की जंग जारी रही। यह जंग अंग्रेजों से नहीं बल्कि अपने ही लोगों से थी। अंग्रेजों से आजादी मिलने के बाद देश की विभिन्न रियासतों के विलय का दौर शुरू हुआ। जिसमें भोपाल रियासत के विलय के लिए एक और क्रांति हुई। जिसमें 14 जनवरी 1949 को मकर संक्रांति के पर्व पर बौरास के नर्मटा तट पर पांच वीर सपूतों ने अपनी कुर्बानी दी।

आज 14 जनवरी को फिर इसकी यादें ताजा होती हैं। बोरास तट पर आज फिर मेला लगेगा जिसमें उक्त क्रांति और उस पर न्योछावर होने वाले वीरों को याद किया जाएगा। 14 जनवरी 1949 को बोरास तट पर विलीनीकरण आंदोलन से जुड़े लोगों ने एक सभा का आयोजन किया था। जिसमें बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए थे।
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बड़ी संख्या में जुटे लोगों को नबाब की पुलिस ने चारों ओर से घेर रखा था। तय कार्यक्रम के अनुसार नर्मदा तट पर झण्डा वंदन होना था और यह तय नहीं हो पा रहा था कि कौन झण्डा वंदन करे। उदयपुरा के सभी नेता बंदी बनाए जा चुके थे। तभी बैजनाथ गुप्ता अपनी दुकान से उठकर आए और उन्होंने झण्डा पहरा दिया। गीत प्रारंभ हो गया, झण्डा ऊंचा रहे हमारा विजयी विश्व तिरंगा प्यारा......। विलीनीकरण होकर रहेगा, के नारे पूरे नर्मदा तट पर गूंज उठे।

इसी के साथ नबावी शासन के थानेदार जाफर अली खां की चेतावनी भरी आवाज गूंजी। नारे नहीं लगेंगे, झण्डा नहीं फहराया जाएगा और किसी ने भी आवाज निकाली तो उसे गोली से भून दिया जाएगा। उसी समय 16 वर्ष का किशोर छोटेलाल आगे आया और हुंकार भरे शब्दों में बोला, मियां हमे क्या डर दिखाते हो विलीनीकरण तो होकर रहेगा। भारत माता जी जय...... और फिर से पूरा नर्मटा पुन: नारों से गूंज उठा।

बौखलाए हुए थानेदार ने वीर छोटेलाल पर गोली चला दी, जो उसके सिर को भेदती हुई निकल गई और इसके पहले कि शहीद छोटेलाल के हाथ से तिरंगा ध्वज गिरता, सुल्तानगंज (राख) के 25 वर्षीय वीर धनसिंह ने आगे बढ़कर ध्वज अपने हाथों में थाम लिया। थानेदार ने धनसिंह के सीने पर गोली मारी।

धनसिंह ने गोली लगने के बाद भी ध्वज नहीं छोड़ा, अगली गोली उसकी आंख के रास्ते सिर से पार हो गई। इससे पहले कि वह गिरता कि मंगलसिंह ने ध्वज थाम लिया। वीर मंगल सिंह बौरास का 30 वर्षीय युवक था। उसने भी गगन भेदी नारे लगाना प्रारंभ किया और थानेदार की गोली उसके भी सीने को पार करती हुई निकल गई।

मंगलसिंह के शहीद होते ही भंवरा के 25 वर्षीय विशाल सिंह ने आगे बढ़कर ध्वज को थाम लिया और भारत माता की जय के नारे लगाना प्रारंभ कर दिया। तभी लगातार दो गोलियां उसकी छाती के पार हो गईं। दो गोलियां छाती के पार हो चुकी थीं मगर फिर भी विशाल सिंह ने ध्वज को छाती से चिपकाए एक हाथ से थानेदार की बंदूक पकड़ ली। परंतु उसके सीने में संगीन घौंप दी गई और सिपाही उसे तब तक उमेठते रहे जब तक विशालसिंह निढाल होकर जमीन पर गिर नहीं गया।

गिरने के बाद भी वह होश में था और वह लुड़कता, घिसटता नर्मदा के जल तक आ गया, उसने तिरंगा छिनने नहीं दिया। लगभग दो सप्ताह बाद उसके प्राण निकले। इस तरह भोपाल रियासत के विलय के लिए भी एक क्रांति हुई, जिसमें वीरों ने अपनी जान की आहूति दी।

भोपाल नबाव यह खबर सुनकर हक्का-बक्का रह गया। इस पर क्या प्रतिक्रिया दे समझ में नहीं आ रहा था। इस घटना के तुरंत बाद सरदार वल्लभ भाई पटेल ने बीपी मैनन को नबाव से जबाव तलब करने भोपाल भेजा। अंतत: भोपाल रियासत का विलय हुआ।

ये हुए थे बोरास तट पर शहीद
1. छोटेलाल (16 वर्ष निवासी बौरास तह. उदयपुरा)
2. धनसिंह (25 वर्ष निवासी सुल्तानगंज तह. उदयपुरा)
3. मंगल सिंह (30 वर्ष निवासी बौरास तह. उदयपुरा)
4. विशाल सिंह (25 वर्ष निवासी भंवरा तह. उदयपुरा) भोपाल जेल से गंभीर अवस्था में मुक्ति के तुरंत बाद 7 फरवरी 1949 को निधन
5. कालूराम (45 वर्ष निवासी रेहटी तहसील नसरुल्लागंज)

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